उदन्त मार्तण्ड से डिजिटल युग तक: हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों पर कोलकाता में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी
कोलकाता में आयोजित द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा, उदन्त मार्तण्ड की विरासत, पत्रकारिता की चुनौतियों और भविष्य पर देश-विदेश के विद्वानों ने किया गंभीर मंथन।
कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज और भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में देश-विदेश के विद्वानों ने हिंदी पत्रकारिता की विरासत, चुनौतियों और भविष्य पर किया मंथन
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कोलकाता के कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज एवं भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य समापन हुआ। ‘हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान’ विषयक इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों तथा नेपाल सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लिया। संगोष्ठी में ‘उदन्त मार्तण्ड’ की ऐतिहासिक भूमिका, पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार, भाषा की शिष्टता, साहित्यिक संवेदना, डिजिटल युग की चुनौतियां और पत्रकारिता की निष्पक्षता जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए तथा अनेक विद्वानों को सम्मानित किया गया।
हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष पर कोलकाता बना राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र
कोलकाता, 30 मई। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने हिंदी पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा, उसके सामाजिक दायित्व और बदलते समय की चुनौतियों पर गंभीर चिंतन का मंच प्रदान किया। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता तथा भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय था- ‘हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान।‘ संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, सिक्किम के कुलपति प्रो. मोहन के ने कहा कि नवजागरण की भूमि बंगाल से ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के साथ आरंभ हुई हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय स्वतंत्रता चेतना को जागृत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का वाहक रही है।
पत्रकारिता के वर्तमान संकट पर चिंता
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर ने बशीर बद्र की चर्चित पंक्ति- “जी बहुत चाहता है सच बोले, हौसला नहीं होता” का उल्लेख करते हुए वर्तमान पत्रकारिता की चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश में पत्रकारिता किस प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का संवाहक बनी रह सकती है। भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि कलम की शक्ति तलवार से अधिक प्रभावशाली होती है। उन्होंने स्मरण कराया कि अंग्रेजी शासन पत्रकारिता की शक्ति से इतना भयभीत था कि अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लगाए गए तथा उनकी जमानतें जब्त कर ली गईं। वरिष्ठ पत्रकार राज मिठौलिया ने हिंदी पत्रकारिता के शुरुआती दौर की आर्थिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद तत्कालीन पत्रकारों ने समाज को दिशा देने का कार्य किया, जबकि आज का पत्रकार अनेक प्रकार के दबावों और विषम परिस्थितियों का सामना कर रहा है।
‘उदन्त मार्तण्ड’ की विरासत और भाषिक चेतना
कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या प्रो. सत्या उपाध्याय ने कहा कि यह आयोजन केवल एक अकादमिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय भाषिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय नवजागरण के इतिहास को स्मरण करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की पहली ज्योति इसी कोलकाता की धरती पर प्रज्ज्वलित हुई थी।
तकनीकी सत्रों में हुआ व्यापक विमर्श
संगोष्ठी के विभिन्न तकनीकी सत्रों में पत्रकारिता और साहित्य के अंतर्संबंध, लघु पत्रिकाओं की भूमिका, भाषाई अस्मिता, सांस्कृतिक संरक्षण, ई-पत्रकारिता, अज्ञेय की पत्रकारिता दृष्टि तथा राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने कहा कि पत्रकारिता का मूल तत्व वेदना और संवेदना है। उन्होंने यह भी कहा कि कलकत्ता ने भारतीय पत्रकारिता को नवीन दृष्टि और प्रयोगधर्मिता प्रदान की। कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने पत्रकारिता में निर्भीकता, मेधा और सामाजिक उत्तरदायित्व को आवश्यक बताया तथा कहा कि पत्रकारिता का दायित्व समाज को जोड़ना और जागरूक करना है।
लगभग 100 शोधपत्रों का वाचन
दूसरे दिन आयोजित पांच समानांतर तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए लगभग 100 शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इन शोधपत्रों में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, भाषा विकास, राष्ट्रनिर्माण, डिजिटल मीडिया, ई-पत्रकारिता और समकालीन चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय जनमानस को समय-समय पर जागृत करने का कार्य किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि पत्रकारिता में पूर्वाग्रह और राजनीतिक आग्रह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन सकते हैं। डिजिटल युग में पत्रकारिता की निष्पक्षता और तथ्यपरकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
सम्मान समारोह और समापन
‘उदन्त मार्तण्ड’ केंद्रित समापन सत्र में सार्क जर्नलिस्ट फोरम के सहयोग से सम्मान समारोह आयोजित किया गया। नेपाल सहित विभिन्न देशों और भारत के अनेक विद्वानों, पत्रकारों एवं शिक्षाविदों को ‘उदन्त मार्तण्ड शिखर सम्मान’ और अन्य सम्मान प्रदान किए गए।
समापन अवसर पर वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल इतिहास नहीं, बल्कि लोकतंत्र, भाषा, साहित्य और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की प्रेरणादायक कहानी है। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से आरंभ हुई यह यात्रा आज डिजिटल युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी दो सौ वर्ष पूर्व थी।
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