हिंदी विश्वविद्यालय में एक दिवसीय अनुवाद कार्यशाला का सफल आयोजन
कुलपति प्रो. डॉ. नंदिनी साहू की अध्यक्षता में आयोजित कार्यशाला में अनुवाद के सांस्कृतिक, तकनीकी और वैश्विक महत्व पर गहन चर्चा हुई। देश के प्रमुख विद्वानों ने ऑनलाइन सहभागिता की।
हिंदी विश्वविद्यालय में 26 फरवरी को एक दिवसीय अनुवाद कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. डॉ. नंदिनी साहू ने की। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यशाला में अनुवाद के बदलते स्वरूप, तकनीकी प्रभाव और सांस्कृतिक महत्व पर गंभीर विमर्श हुआ।
कुलपति का मार्गदर्शन
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. डॉ. नंदिनी साहू ने अनुवाद की जटिलता और उसके उभरते महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनुवाद केवल भाषाई रूपांतरण नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृतियों के बीच सेतु निर्माण की प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक अनुवादक को स्रोत और लक्ष्य भाषा का गहरा ज्ञान, विषय की समझ, व्याकरणिक शुद्धता, शब्दकोश एवं सांस्कृतिक संदर्भों की पहचान आवश्यक रूप से होनी चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल और वैश्वीकृत युग में अनुवादक को तकनीकी दक्षता, सोशल मीडिया शब्दावली और सांस्कृतिक विविधताओं की गहरी समझ भी रखनी चाहिए। उनके शब्दों में,“अनुवाद एक ऐसा क्षेत्र है जो न केवल लोगों को विचारों को समझने में सक्षम बनाता है, बल्कि भाषा और संस्कृतियों की समृद्धि को संरक्षण और बढ़ावा भी देता है तथा विभिन्न भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करता है।”
राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों की सहभागिता
कार्यक्रम का संचालन हिंदी एवं अनुवाद विभाग की प्राध्यापिका डॉ. मधुमिता ओझा ने कुशलतापूर्वक किया। ऑनलाइन माध्यम से इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के प्रो. एवं निर्देशक प्रो. हरीश कुमार सेठी ने सहभागिता की। उन्होंने कहा कि मशीन आधारित अनुवाद उपयोगी हो सकता है, किंतु भाषाओं की आत्मा को मशीनों में सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने शब्दानुवाद और भावानुवाद के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल शब्दों का अर्थ नहीं, बल्कि भावों की संवेदना भी अनुवाद का मूल तत्व है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अनुवादक को मूल पाठ को बार-बार पढ़कर उसकी आत्मा को समझना चाहिए, तभी सार्थक अनुवाद संभव है। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में वेस्ट बंगाल विमेंस यूनिवर्सिटी की प्रो. अपराजिता हाजरा ने ऑनलाइन सहभागिता की। उन्होंने प्राचीन काल से आधुनिक समय तक अनुवाद की प्रक्रिया के विकास पर प्रकाश डाला और एंथोनी बर्गेस की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा, “अनुवाद केवल शब्द का मामला नहीं है; यह एक संपूर्ण संस्कृति को बोधगम्य बनाने का मामला है।”
शिक्षकों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी
इस अवसर पर हिंदी, अनुवाद, इतिहास एवं राजनीतिक विज्ञान विभाग के अनेक प्राध्यापक एवं प्राध्यापिकाएँ उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. सुशील कुमार पांडे, डॉ. इंद्रजीत यादव, डॉ. अजीत कुमार दास, डॉ. के.एन. भारती, डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, डॉ. गुड्डी कुमारी, डॉ. पारोमिता दास, धीमान महतो, मधुवंती गांगुली, विश्वजीत हजाम एवं सुमित यादव शामिल थे। डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने कहा कि डिजिटल युग में अनुवाद ज्ञान, संस्कृति और व्यापार के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा यह भाषा की बाधाओं को तोड़ने का सशक्त माध्यम है। विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों अपर्णा तिवारी, दीक्षित साव, मानसी परीदा, मधुबाला कुमारी, कीर्ति सिंह, सुजल कुमार राउत, प्रियंका तिवारी, अंशु सिंह, विवेकानंद चौधरी, सुचंदा विश्वास, नसरीन परवीन, अंसूर्या राय, सुशील कुमार शाह, सिमरन साव, आफरीन प्रवीन, रंजन कुमारी साव, नंदनी वर्मा, मुकुल कुमार साव, अंकित साव, अमरजीत पंडित आदि ने सक्रिय सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया। कार्यशाला का समापन डॉ. अजीत कुमार दास के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
यह कार्यशाला केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के संवाद को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई। डिजिटल युग में अनुवाद की भूमिका और भी व्यापक हो रही है, ऐसे में इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों और शोधार्थियों को नई दृष्टि प्रदान करती हैं।
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