श्रावस्ती एनकाउंटर पर हाईकोर्ट सख्त, CBI जाँच के आदेश; पुलिस की कहानी पर सवाल

श्रावस्ती के इकौना में मई 2025 के छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के कथित एनकाउंटर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गंभीर सवाल उठाते हुए CBI जाँच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने पुलिस FIR में विसंगतियों, 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में किसी पुलिसकर्मी के घायल न होने और अंधेरे में 15 मीटर से दोनों पैरों पर गोली लगने के दावे पर सवाल उठाए हैं।

Sep 9, 2026 - 00:01
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श्रावस्ती एनकाउंटर पर हाईकोर्ट सख्त, CBI जाँच के आदेश; पुलिस की कहानी पर सवाल
हाईकोर्ट सख्त, CBI जाँच के आदेश

23 पुलिसकर्मियों से घिरे व्यक्ति ने चलाई गोली, कोई पुलिसकर्मी घायल नहीं; अंधेरे में 15 मीटर से दोनों पैरों में लगीं SHO की गोलियाँ -हाईकोर्ट ने माँगी स्वतंत्र जाँच

लखनऊ/श्रावस्ती, 8 सितंबर। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के इकौना क्षेत्र में मई 2025 में हुए छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के कथित पुलिस एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पुलिस की कहानी पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने प्रथमदृष्टया पुलिस की FIR में कई विसंगतियाँ पाईं और स्वतंत्र एजेंसी से पूरे घटनाक्रम की जाँच को आवश्यक माना।

अदालत ने CBI को इकौना थाने में दर्ज संबंधित FIR की सत्यता की जाँच करने के साथ-साथ तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी की क्षमता का भी परीक्षण करने को कहा है। विशेष रूप से यह जाँच होनी है कि क्या रात के अंधेरे में करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर 9 एमएम सर्विस पिस्टल से दो सटीक गोलियाँ चलाना संभव था और वे दोनों गोलियाँ आरोपी के दोनों पैरों में लग सकती थीं। CBI को अपनी रिपोर्ट यथासंभव तीन महीने के भीतर हाईकोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

क्या है पूरा मामला?

मामला मई 2025 का है। उपलब्ध न्यायिक एवं मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 9 मई 2025 को इकौना थाने में सात वर्षीय बच्ची को ले जाने के आरोप में FIR दर्ज की गई थी। प्रारंभिक FIR में शफीक और दो अज्ञात व्यक्तियों का उल्लेख था। पुलिस की जाँच के दौरान छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन का नाम सामने आया।  इसके तीन दिन बाद, 12 मई 2025 को तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे की ओर से दूसरी FIR दर्ज कराई गई। पुलिस के अनुसार अलाउद्दीन नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था। अंधरपुरवा पुल के पास पुलिस और SWAT टीम ने कथित रूप से उसकी घेराबंदी की। पुलिस का दावा था कि अलाउद्दीन ने पुलिस टीम पर फायरिंग की, जिसके जवाब में SHO ने अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्टल से दो गोलियाँ चलाईं। दोनों गोलियाँ अलाउद्दीन के पैरों में लगीं और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

23 पुलिसकर्मी मौजूद थे, फिर भी कोई घायल नहीं हुआ- कोर्ट का सवाल

हाईकोर्ट ने पुलिस के इस घटनाक्रम को कई स्तरों पर परखा। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नदीम मुर्तजा ने पुलिस की कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। अदालत के सामने एक प्रमुख सवाल यह था कि FIR के अनुसार शुरुआत में 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में थे और बाद में टीम तीन हिस्सों में बंटकर अलग-अलग रास्तों पर चली गई। इसके बाद घटनास्थल पर SWAT टीम समेत कुल 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी बताई गई, लेकिन FIR में दूसरे वाहन के संबंध में स्पष्ट विवरण नहीं था।  अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि 23 पुलिसकर्मियों ने एक व्यक्ति को घेर रखा था और उस व्यक्ति ने कथित रूप से पुलिस पर गोली चलाई, तो एक भी पुलिसकर्मी घायल क्यों नहीं हुआ? इसके विपरीत, पुलिस के अनुसार SHO ने रात के अंधेरे में लगभग 15 मीटर की दूरी से दो गोलियाँ चलाईं और दोनों ही आरोपी के पैरों में लगीं।

9 एमएम गोली और मेडिकल रिपोर्ट पर भी सवाल

अदालत ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटों को भी पुलिस के कथन के साथ मिलाकर देखा। रिपोर्ट में दर्ज घावों और 9 एमएम गोली से होने वाले घावों के संबंध में SHO से स्पष्टीकरण माँगा गया। SHO की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को अदालत ने संतोषजनक नहीं माना और इसीलिए उनकी वास्तविक शूटिंग क्षमता की स्वतंत्र जाँच की जरूरत बताई।  हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया यह भी माना कि SHO ने FIR में घटना का सही विवरण प्रस्तुत नहीं किया हो सकता है और अदालत के सामने भी घटनाक्रम को सही रूप में नहीं रखा गया प्रतीत होता है। इसी कारण मामले को केवल विभागीय जाँच तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं माना गया।

पुलिसकर्मियों को मिला था गुड वर्कका पुरस्कार

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित मुठभेड़ में शामिल 23 पुलिसकर्मियों को उनके गुड वर्कके लिए पुरस्कृत किया गया था। हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में तत्काल पुरस्कार दिए जाने की प्रक्रिया और उसकी निष्पक्षता के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का भी संदर्भ लिया। अदालत ने इस व्यापक प्रश्न की ओर भी संकेत किया कि किसी पुलिस कार्रवाई को बाद में एनकाउंटरका स्वरूप दिए जाने से पुलिसकर्मियों की जवाबदेही समाप्त नहीं हो सकती। न्यायालय ने कहा कि दंड देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं।

अलाउद्दीन का पुराना मामला भी जाँच के केंद्र में

इस मामले का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पक्ष भी है। अलाउद्दीन को वर्ष 2012 में छह वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड दिया गया था। हाईकोर्ट ने भी उसकी सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, 28 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में जाँच और अभियोजन की गंभीर कमियों पर टिप्पणी की थी। उपलब्ध हाईकोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को भी ध्यान में रखा था कि आरोपी आर्थिक रूप से कमजोर था और मुकदमे में उसे प्रभावी कानूनी सहायता मिलने में समस्या हुई थी। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने इस पुराने प्रकरण और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी संदर्भित किया तथा यह संभावना दर्ज की कि उन टिप्पणियों के कारण पुलिस में आरोपी के प्रति नाराजगी पैदा हुई हो सकती है। हालांकि, यह भी जाँच का विषय है और अदालत ने इसे अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं माना है।

CBI अब किन बिंदुओं की जाँच करेगी?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI के सामने मुख्य रूप से ये प्रश्न होंगे

  • पुलिस द्वारा दर्ज FIR में वर्णित घटनाक्रम कितना सही है?
  • घटनास्थल पर वास्तव में कितने पुलिसकर्मी मौजूद थे?
  • पुलिस टीमों के आवागमन और वाहनों का वास्तविक विवरण क्या था?
  • क्या अलाउद्दीन ने पुलिस पर गोली चलाई थी?
  • घटनास्थल से हथियार और कारतूस की बरामदगी का दावा कितना प्रमाणित है?
  • 9 एमएम सर्विस पिस्टल से 15 मीटर की दूरी और रात के अंधेरे में दोनों पैरों पर सटीक निशाना लगना परिस्थितियों के अनुरूप था या नहीं?
  • मेडिकल एवं फोरेंसिक साक्ष्य पुलिस की कहानी की पुष्टि करते हैं या नहीं?
  • कथित मुठभेड़ की जाँच में निर्धारित कानूनी एवं न्यायिक सुरक्षा-प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं?
  • मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को पुरस्कार देने की प्रक्रिया उचित थी या नहीं?

डिस्चार्ज आदेश पर भी रोक

हाईकोर्ट ने श्रावस्ती की सत्र अदालत द्वारा 2 जुलाई 2026 को अलाउद्दीन की डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने वाले आदेश के संचालन एवं क्रियान्वयन पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है, जिसके बाद याचिकाकर्ता को एक सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर मिलेगा। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

एनकाउंटर पर न्यायिक निगरानी का बढ़ता जोर

श्रावस्ती का यह मामला ऐसे समय आया है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों की प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। जनवरी 2026 के एक अन्य मामले में भी अदालत ने गंभीर रूप से घायल या मृत व्यक्ति से जुड़ी पुलिस मुठभेड़ की जाँच, स्वतंत्रता और तत्काल पुरस्कार जैसे मुद्दों पर दिशा-निर्देशों को रेखांकित किया था। श्रावस्ती मामले में अदालत का रुख इस बात को स्पष्ट करता है कि पुलिस की ओर से प्रस्तुत एनकाउंटरकी कहानी स्वतः अंतिम सत्य नहीं मानी जा सकती। जब घटनाक्रम, चिकित्सकीय साक्ष्य, हथियारों की स्थिति और पुलिस की कार्रवाई के बीच प्रथमदृष्टया असंगतियाँ दिखाई दें, तो स्वतंत्र जाँच के माध्यम से सत्य का परीक्षण किया जाना आवश्यक है। अब निगाहें CBI जाँच पर हैं। तीन महीने के भीतर प्रस्तावित जाँच रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि मई 2025 की कार्रवाई वास्तव में पुलिस द्वारा बताई गई मुठभेड़ थी या उसके पीछे कोई अलग घटनाक्रम था।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I