मेजा डॉक्टर लॉकअप मामला: इंस्पेक्टर नितेंद्र शुक्ला और विवेचक निलंबित
मेजा थाने में डॉक्टर को लॉकअप में रखने और विवेचना में कथित लापरवाही के मामले में थाना प्रभारी नितेंद्र कुमार शुक्ला तथा विवेचक कमलेश यादव निलंबित किए गए हैं। हाईकोर्ट में याचिका के बाद हुई एसीपी जाँच में दोनों प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए। इसी बीच नितेंद्र कुमार शुक्ला से संबंधित 29 मई 2025 की हंडिया घटना की पुरानी शिकायत में कथित सीसीटीवी साक्ष्यों के बावजूद दोषमुक्त किए जाने के आरोप ने पुलिस जाँच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।
हाईकोर्ट में याचिका के बाद एसीपी जाँच में प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए अधिकारी; 29 मई 2025 की एक अन्य शिकायत में भी नितेंद्र कुमार शुक्ला की भूमिका पर सवाल
प्रयागराज। मेजा थाने में एक डॉक्टर को मुकदमे की कार्रवाई के दौरान लॉकअप में रखे जाने और मामले की विवेचना में कथित लापरवाही के प्रकरण में पुलिस विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस कमिश्नर पीयूष मोर्डिया ने मेजा थाने के प्रभारी निरीक्षक नितेंद्र कुमार शुक्ला और मामले के विवेचक निरीक्षक कमलेश यादव को निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के बाद कराई गई विभागीय जाँच के आधार पर की गई है।
बताया गया है कि पुलिस अधिकारियों द्वारा कराई गई जाँच में दोनों पुलिसकर्मी प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए। इसके बाद जाँच रिपोर्ट के आधार पर निलंबन की कार्रवाई की गई। हालांकि, विभागीय निलंबन को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जाता; यह प्रशासनिक कार्रवाई है, जबकि आरोपों की अंतिम स्थिति आगे की विभागीय अथवा न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।
डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा और लॉकअप में रखे जाने का आरोप
प्रकरण मेजा थाना क्षेत्र के सोनार का तारा, ऊंचडीह में क्लीनिक चलाने वाले डॉ. कमलेश विश्वास उर्फ सुजल से संबंधित बताया जा रहा है। पुलिस ने उन्हें फर्जी एवं कूटरचित दस्तावेज तैयार करने सहित अन्य आरोपों में गिरफ्तार किया था। पुलिस की ओर से उनकी नागरिकता और कथित रूप से बांग्लादेशी नागरिक होने से जुड़े बिंदुओं की भी जाँच किए जाने की बात सामने आई थी।
मामले में आरोप लगाया गया कि पुलिस कार्रवाई के दौरान डॉक्टर को थाने के लॉकअप में रखा गया और उनके साथ कथित रूप से प्रताड़ना की गई। बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई, जिसमें राज्य सरकार और पुलिस से जवाब मांगा गया।
याचिका के बाद पुलिस अधिकारियों ने प्रकरण की जाँच कराई। एसीपी स्तर की जाँच में थाना प्रभारी नितेंद्र कुमार शुक्ला और विवेचक कमलेश यादव की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे और दोनों को प्रथम दृष्टया जिम्मेदार माना गया। इसके बाद पुलिस कमिश्नर ने दोनों को निलंबित कर दिया।
हाईकोर्ट की निगरानी में पुलिस कार्रवाई की जाँच
इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुलिस विभाग की आंतरिक कार्रवाई हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के बाद आगे बढ़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद पुलिस अधिकारियों को अपने ही अधीनस्थ अधिकारियों की कार्रवाई की समीक्षा करनी पड़ी। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी, थाने में निरुद्ध रखने, विवेचना की निष्पक्षता और आरोपित व्यक्ति के साथ पुलिस व्यवहार जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को कानूनन निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत लॉकअप में रखा गया हो या उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया हो, तो यह पुलिस जवाबदेही और मानवाधिकार से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
29 मई 2025 की घटना से जुड़ा एक अन्य शिकायत प्रकरण
निलंबित किए गए थाना प्रभारी नितेंद्र कुमार शुक्ला के पुलिस आचरण को लेकर एक अन्य शिकायत का संदर्भ भी सामने आता है। शिकायतकर्ता सुशील कुमार पांडेय के अनुसार, जब नितेंद्र कुमार शुक्ला हंडिया थाने के प्रभारी निरीक्षक के पद पर तैनात थे, तब 29 मई 2025 को वह कथित रूप से पुलिस बल के साथ शिकायतकर्ता के घर में बिना वैधानिक अनुमति अथवा उचित प्रक्रिया के प्रवेश कर गए थे।
शिकायतकर्ता का दावा है कि इस घटना का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध था और जाँच के दौरान उसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, घटना से संबंधित अन्य तथ्य और दस्तावेज भी जाँच अधिकारी के समक्ष रखे गए थे। इस मामले की जाँच तत्कालीन अपर पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) डॉ. अजय पाल द्वारा एक साल तक किए जाने की बात शिकायतकर्ता की ओर से कही गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य तथ्यों के बावजूद जाँच अधिकारी ने नितेंद्र कुमार शुक्ला को दोषमुक्त मानते हुए अपनी जाँच रिपोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल कर दी।
हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित हाईकोर्ट याचिका, जाँच रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज की प्रमाणित प्रति तथा पुलिस विभाग द्वारा दाखिल जवाब का अवलोकन आवश्यक होगा। इसलिए इस घटना को फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप और उसके द्वारा बताए गए दस्तावेजी साक्ष्यों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
दो मामलों के बीच उठता है पुलिस जवाबदेही का प्रश्न
एक ओर मेजा थाने में डॉक्टर को लॉकअप में रखे जाने और विवेचना में लापरवाही के मामले में पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया गया है, वहीं दूसरी ओर नितेंद्र कुमार शुक्ला से संबंधित पूर्व शिकायत में जाँच की निष्पक्षता और साक्ष्यों के मूल्यांकन को लेकर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाए हैं।
इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर पुलिस विभाग की आंतरिक जाँच प्रणाली, अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा और सीसीटीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के परीक्षण की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि किसी शिकायत में वीडियो साक्ष्य उपलब्ध हो और फिर भी जाँच में उसका समुचित परीक्षण न किया गया हो, तो ऐसी जाँच की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए मूल जाँच दस्तावेजों और न्यायालयीन अभिलेखों का परीक्षण जरूरी है।
निलंबन से आगे भी जरूरी है पारदर्शी जाँच
मेजा प्रकरण में निलंबन की कार्रवाई पुलिस विभाग की ओर से जवाबदेही तय करने की दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन मामले की वास्तविक स्थिति केवल निलंबन से स्पष्ट नहीं होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि डॉक्टर को गिरफ्तार करने और लॉकअप में रखने की वैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं; गिरफ्तारी के बाद मेडिकल परीक्षण और अन्य अनिवार्य प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं या नहीं; विवेचना में किन अधिकारियों की क्या भूमिका थी; हाईकोर्ट में पुलिस की ओर से क्या तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत किए गए; एसीपी जाँच में किन बिंदुओं पर दोनों अधिकारियों को प्रथम दृष्टया दोषी माना गया; तथा विभागीय जाँच के बाद अंतिम निर्णय क्या होता है।
इसी प्रकार 29 मई 2025 की हंडिया घटना से संबंधित शिकायत में भी यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि सीसीटीवी फुटेज का परीक्षण किस स्तर पर हुआ, जाँच अधिकारी ने किन तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाला और हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में क्या कहा गया।
निष्कर्ष
मेजा थाने में डॉक्टर को लॉकअप में रखे जाने से जुड़े मामले में थाना प्रभारी और विवेचक का निलंबन पुलिस व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई है। यह प्रकरण इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है कि पुलिस हिरासत, विवेचना और नागरिकों के साथ व्यवहार से जुड़े मामलों में केवल आंतरिक जाँच पर्याप्त नहीं हो सकती, बल्कि पारदर्शी, स्वतंत्र और साक्ष्य-आधारित जाँच आवश्यक है।
नितेंद्र कुमार शुक्ला से संबंधित 29 मई 2025 की हंडिया शिकायत का संदर्भ इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। यदि शिकायतकर्ता द्वारा बताए गए सीसीटीवी फुटेज और अन्य दस्तावेज वास्तव में जाँच के समक्ष उपलब्ध थे, तो उनकी जाँच और मूल्यांकन की प्रक्रिया सार्वजनिक scrutiny का विषय बन सकती है। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित न्यायालयीन अभिलेखों, जाँच रिपोर्ट और आधिकारिक दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
What's Your Reaction?

