जांबाज जेनजी का जलजला
श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल से लेकर भारत तक जेनजी के उभार ने सत्ता और नागरिक के रिश्ते को नई दिशा दी है। शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक से शुरू हुआ आंदोलन अब जवाबदेही, लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थागत आत्म-समीक्षा का व्यापक सवाल बन चुका है।
सत्ता की बुनियाद हिलाने वाला गुस्सा
श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद जेनजी का जलजला भारत में आया। आम तौर पर जलजले के साथ तबाही का रिश्ता रहा है। जहाँ-जहाँ यह जलजला आया, वहाँ उसने सत्ता की बुनियाद हिला दी और आखिरकार सत्ता के लिए तबाही का मंजर पैदा किया। श्रीलंका में गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़नी पड़ी, बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार चली गई और नेपाल में भी जेनजी के उभार ने सरकार गिरा दी।
भारत में भी कुछ ऐसा ही मंजर बनता दिखाई दिया। यहाँ जेनजी का गुस्सा सत्ता के शीर्ष तक तो पहुँचा, मगर उसने अभी सत्ता को नहीं पलटा है। भारत में उसने फिलहाल सत्ता को सिर्फ चेतावनी दी है। किसी भी आंदोलन की कामयाबी का पहला कदम सत्ता को चुनौती देना होता है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक के सवालों से शुरू हुआ जेनजी का आंदोलन देखते-देखते सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बन गया। आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
लेकिन इस आंदोलन की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि एक मंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा। इसका बड़ा मतलब यह है कि भारत में जेनजी ने पहली बार सत्ता को यह एहसास कराया है कि वह अपने गुस्से और असंतोष को राजनीतिक दबाव में बदल सकती है। जेनजी का आंदोलन पारंपरिक विश्वविद्यालय परिसरों तक ही सीमित नहीं रहा। यह छोटे शहरों, कस्बों और दूसरे शिक्षण संस्थानों तक पहुँचा। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसके पीछे कोई पारंपरिक राजनीतिक संगठन, कोई स्थापित वैचारिक नेतृत्व या कोई पुराना राजनीतिक दल नहीं था। सोशल मीडिया ने अलग-अलग जगहों के गुस्से और बेचैनी को जोड़ने, उसे रफ्तार देने और देखते-देखते एक बड़ी जनभावना में बदलने का काम किया।
सोशल मीडिया से सड़क तक
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के कई हिस्सों तक हुए विरोध प्रदर्शनों ने साफ कर दिया कि जेनजी सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जताने वाली पीढ़ी नहीं है। जरूरत पड़े तो वह सड़क पर भी उतर सकती है। जेनजी ने हताश और डरे हुए भारत को नया हौसला दिया है। प्रतिवाद और प्रतिरोध की नई ऊर्जा दी है। 20 जुलाई से 1 सितंबर तक की कई घटनाएँ इसकी गवाही देती हैं। सत्ता के लिए जेनजी का सबसे बड़ा खतरा उसकी संख्या नहीं, बल्कि उसका बेखौफ होना है। परीक्षा में धांधली या पेपर लीक एक तात्कालिक मुद्दा हो सकता है, लेकिन उसके पीछे की बेचैनी कहीं ज्यादा गहरी है। यह उस जेनजी की बेचैनी है, जो पढ़ी-लिखी है, तकनीक से जुड़ी है, दुनिया को देख रही है, लेकिन अपने ही देश में अपने भविष्य को लेकर यकीन में नहीं है।
नई पीढ़ी की नई राजनीतिक भाषा
जेनजी को सिर्फ उसके जन्म-वर्षों के आधार पर समझना काफी नहीं है। यह इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ बड़ी हो रही एक नई और ताकतवर पीढ़ी है। इसे जानकारी के लिए अखबार की अगली सुबह या टेलीविजन के शाम के बुलेटिन का इंतजार नहीं करना पड़ता। हर पल उसके सामने जानकारी मौजूद है। वह सत्ता की कही हुई बात को उसी वक्त दूसरे स्रोतों से जाँच सकती है, उसका मजाक बना सकती है और हजारों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकती है। व्यंग्य उसके लिए सिर्फ हँसी-मजाक नहीं है। वह सत्ता से बात करने और उसे चुनौती देने का एक हथियार भी है। ‘काकरोच जनता पार्टी’ जैसे व्यंग्यात्मक राजनीतिक नाम का उभरना इसी नई राजनीतिक संस्कृति की मिसाल है। किसी अपमानजनक प्रतीक को पलटकर उसे प्रतिरोध का प्रतीक बना देना जेनजी की राजनीतिक कल्पनाशीलता को दिखाता है।
दबाव कायम रखने की ताकत
जेनजी के आंदोलन का असर झारखंड और बिहार में भी दिखाई दिया। उसकी ऊर्जा अभी खत्म नहीं हुई है। जब उसने 5 सितंबर को फिर मार्च करने का ऐलान किया, तो सरकार को एक बार फिर नए दबाव का एहसास हुआ। इस बार 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने की व्यवस्था की गई। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। इसके पीछे वह राजनीतिक दबाव भी था, जिसे जेनजी ने अपने प्रस्तावित मार्च के जरिए फिर पैदा कर दिया था। सत्ता को लगातार जवाबदेह बनाए रखने की ताकत जेनजी में है। उसने दिखा दिया है कि जनदबाव सिर्फ पैदा ही नहीं किया जा सकता, उसे कायम भी रखा जा सकता है। जेनजी ने सत्ता नहीं बदली है, लेकिन सत्ता और नागरिक के बीच का रिश्ता जरूर बदल दिया है। उसने हताश और डरे हुए भारत को यह भरोसा दिया है कि सवाल पूछना अभी भी मुमकिन है, विरोध करना अभी भी मुमकिन है और लोकतंत्र में सड़क की आवाज सत्ता के दरवाजे तक पहुँच सकती है।
संस्थाओं के सामने आत्म-समीक्षा का सवाल
यहाँ एक और वाकया याद रखना जरूरी है। शासन-व्यवस्था के अहम हिस्से, न्याय-तंत्र के सर्वोच्च पद पर बैठे एक न्यायाधीश ने जेनजी को ‘कॉकरोच’ कहकर अपनी भड़ास निकाली थी। लेकिन विडंबना देखिए कि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान में दी गई विशेष व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए जंतर-मंतर पर जेनजी के प्रदर्शन और आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर दखल दिया तथा उनके लोकतांत्रिक हक के सवाल को अहमियत दी। इसे सिर्फ एक अदालती फैसले की तरह नहीं, बल्कि लोकतंत्र में संस्थाओं के अपने भीतर झाँकने और आत्म-समीक्षा करने के एक प्रसंग के तौर पर भी देखा जा सकता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि कानून के छात्रों ने उस न्यायाधीश के ‘कर कमलों’ से डिग्री लेना अपनी तौहीन समझा। यह सिर्फ किसी एक शख्स के खिलाफ नाराजगी नहीं थी। यह उस सोच के खिलाफ विरोध था, जिसमें न्याय के मंदिर में बैठे व्यक्ति से इज्जत और गरिमा की उम्मीद करने वाला समाज खुद को अपमानित महसूस करने लगे। छात्रों ने अपने तरीके से यह संदेश दिया कि इज्जत पद से नहीं, आचरण से मिलती है।
इससे भी ज्यादा दिलचस्प वाकया बार काउंसिल के अध्यक्ष का है, जिन्होंने काउंसिल को हिदायत देते हुए यह आदेश जारी किया था कि कानून के ऐसे छात्रों का रजिस्ट्रेशन न किया जाए। इस आदेश में प्रशासनिक अकड़ और असहमति को सजा देने की मानसिकता, दोनों साफ दिखाई देती थीं। लेकिन जेनजी के विरोध ने शायद उस आदेश के पीछे छिपे विवेक को ही जगा दिया। आखिरकार वह आदेश तत्काल वापस लेना पड़ा। यह वापसी अपने आप में कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन जेनजी पर पुलिस की ओर से किए गए हिंसक दमन को लेकर सरकार की चुप्पी अभी भी बनी हुई है।
वैश्विक स्तर पर नई पीढ़ी का उभार
जेनजी का यह जलजला सिर्फ श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल तक सीमित नहीं है। केन्या, इंडोनेशिया और फिलीपींस के अनुभव भी बताते हैं कि दुनिया के अलग-अलग देशों में नई पीढ़ी अपनी सरकारों से अपने हक और अपने सवालों का जवाब माँग रही है। केन्या में 2024 में जेनजी ने टैक्स बढ़ाने वाले फाइनेंस बिल के खिलाफ ऐसा बड़ा आंदोलन खड़ा किया कि प्रदर्शनकारी संसद तक पहुँच गए। आखिरकार राष्ट्रपति विलियम रूटो को बिल वापस लेने का ऐलान करना पड़ा। इंडोनेशिया में 2025 में सांसदों के भत्तों और खास सुविधाओं के खिलाफ युवा विरोध ने सरकार पर दबाव बनाया और उसे कुछ फैसलों से पीछे हटने तथा सांसदों के विशेषाधिकारों की समीक्षा करने के लिए मजबूर किया। फिलीपींस में भी युवाओं के आंदोलनों ने भ्रष्टाचार और सरकार की जवाबदेही के सवालों को सियासी बहस के बीच ला खड़ा किया।
इन तमाम घटनाओं को एक साथ देखें तो जेनजी की सियासी ताकत का एक नया चेहरा सामने आता है। जेनजी की सियासी ताकत का पहला पड़ाव सत्ता बदलना नहीं, सत्ता को जवाबदेह बनाना है। सरकार गिराना किसी आंदोलन की आखिरी कामयाबी नहीं होती। असली कामयाबी तब है, जब सत्ता को यह एहसास हो जाए कि वह मनमानी नहीं कर सकती; उसे जनता के सवालों का जवाब देना होगा, अपने फैसलों का हिसाब देना होगा और जरूरत पड़े तो पीछे भी हटना होगा। यही जेनजी के आंदोलन की शायद सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसने केवल सत्ता को नहीं, संस्थाओं को भी उनके लोकतांत्रिक दायित्व की याद दिलाई है।
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