हाईकोर्ट की जाँच के बाद पचपेड़वा SHO ओम प्रकाश चौहान निलंबित, हिरासत से लेकर पुलिस कार्रवाई तक उठे गंभीर सवाल

बलरामपुर के पचपेड़वा थाना प्रभारी ओम प्रकाश चौहान को हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में हुई जाँच के बाद निलंबित कर दिया गया। जाँच में लापरवाही और कर्तव्य के प्रति उदासीनता प्रथमदृष्टया पाए जाने की बात सामने आई है। मामला अबू हमजा और सलमान खान से जुड़ी पुलिस कार्रवाई, हिरासत की प्रक्रिया और दस्तावेजी साक्ष्यों की जाँच से संबंधित है।

Sep 14, 2026 - 10:01
Sep 14, 2026 - 10:09
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हाईकोर्ट की जाँच के बाद पचपेड़वा SHO ओम प्रकाश चौहान निलंबित, हिरासत से लेकर पुलिस कार्रवाई तक उठे गंभीर सवाल
पचपेड़वा थाने के निलंबित प्रभारी निरीक्षक ओम प्रकाश चौहान

हाईकोर्ट के आदेश पर हुई जाँच में प्रथमदृष्टया लापरवाही और कर्तव्य के प्रति उदासीनता सामने आने का दावा; 11 सितंबर को बलरामपुर SP ने किया निलंबित

बलरामपुर/पचपेड़वा। बलरामपुर जिले के पचपेड़वा थाने के प्रभारी निरीक्षक ओम प्रकाश चौहान के निलंबन ने पुलिस कार्यप्रणाली और थाने में हिरासत की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दायर एक रिट याचिका से जुड़े मामले में न्यायालय के आदेश के अनुपालन में अपर पुलिस अधीक्षक, बलरामपुर द्वारा जाँच कराई गई थी। जाँच में थाना प्रभारी की कार्रवाई में लापरवाही और कर्तव्य के प्रति उदासीनता के आरोप प्रथमदृष्टया प्रमाणित पाए गए। इसके बाद पुलिस अधीक्षक मार्तण्ड प्रकाश सिंह ने 11 सितंबर 2026 को ओम प्रकाश चौहान को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।  मामला केवल एक पुलिस अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि किसी व्यक्ति को थाने पर पूछताछ के नाम पर कितनी देर तक रखा जा सकता है, गिरफ्तारी की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया का पालन किस प्रकार होना चाहिए और पुलिस कार्रवाई की निगरानी के लिए CCTV, केस डायरी तथा मेडिकल अभिलेख कितने महत्वपूर्ण हैं।

अबू हमजा और सलमान खान से जुड़ा मामला

उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड आधारित रिपोर्टों के मुताबिक पचपेड़वा थाना क्षेत्र के औरहवा गांव निवासी सलमान खान पुत्र नूर आलम और अबू हमजा पुत्र अब्दुल मोबीन के विरुद्ध साइबर अपराध से संबंधित मामला दर्ज किया गया था। पुलिस के अनुसार, शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर लोगों से आधार और अन्य दस्तावेज लेकर बैंक खाते खुलवाए गए और उन खातों का इस्तेमाल साइबर अपराध से संबंधित धनराशि के लेनदेन में किया गया। इस मामले में पचपेड़वा थाने में मु00सं0 123/2026 दर्ज किया गया। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी भी दी।  पुलिस के आधिकारिक विवरण में यह भी कहा गया कि कार्रवाई प्रभारी निरीक्षक ओम प्रकाश चौहान के नेतृत्व में की गई थी। हालांकि, इसके समानांतर परिवार की ओर से यह आरोप लगाया गया कि दोनों युवकों को 14 अगस्त से कई दिनों तक थाने में रखा गया और उनके संबंध में समयबद्ध कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इस आरोप की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है। यही वह बिंदु है जिसकी जाँच हाईकोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण हो जाती है।

24       घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी का संवैधानिक संरक्षण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) स्पष्ट रूप से गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे के भीतर पेश किए जाने का संवैधानिक संरक्षण देता है, यात्रा में लगने वाला आवश्यक समय छोड़कर। इसके अतिरिक्त वर्तमान आपराधिक प्रक्रिया व्यवस्था में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है। इसलिए किसी भी मामले में यह जाँच का विषय बनता है कि संबंधित व्यक्ति को कब थाने लाया गया? क्या वह गिरफ्तार था या केवल पूछताछ के लिए बुलाया गया था? गिरफ्तारी मेमो कब तैयार हुआ? परिजनों को सूचना कब दी गई? GD/Case Diary में क्या प्रविष्टियाँ हैं? मेडिकल परीक्षण कब हुआ? मजिस्ट्रेट के सामने कब पेश किया गया? CCTV में क्या रिकॉर्ड हुआ? यही कारण है कि इस प्रकरण में थाने की CCTV फुटेज, GD/मेमो डायरी, गिरफ्तारी मेमो और मेडिकल दस्तावेज महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जाँच और फिर निलंबन

मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हाईकोर्ट की कार्यवाही से जुड़ी है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दायर रिट याचिका के संबंध में न्यायालय के आदेश के अनुपालन में मामले की जाँच अपर पुलिस अधीक्षक, बलरामपुर को सौंपी गई। जाँच में पचपेड़वा थाना प्रभारी ओम प्रकाश चौहान की भूमिका और उनके द्वारा की गई कार्रवाई की पड़ताल की गई। जाँच आख्या में लापरवाही और कर्तव्य के प्रति उदासीनता प्रथमदृष्टया प्रमाणित पाए जाने के बाद पुलिस अधीक्षक मार्तण्ड प्रकाश सिंह ने उन्हें निलंबित कर दिया। एसपी ने यह भी कहा कि पुलिस विभाग में लापरवाही, भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी तथा दोषी पाए जाने पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।  यानी निलंबन का तत्काल कारण क्या है?

क्या तस्करी के आरोप भी जाँच के घेरे में आएँगे?

ओम प्रकाश चौहान पर नेपाल सीमा से जुड़े कथित पशु तस्करी और अन्य प्रतिबंधित सामग्री की तस्करी में मिलीभगत तथा कथित मासिक धनराशि लेने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों से नहीं हुई है। हालांकि, यह तथ्य जरूर है कि पचपेड़वा नेपाल सीमा से सटा क्षेत्र है और इस इलाके में पशु तस्करी से संबंधित कार्रवाई की खबरें पूर्व में सामने आती रही हैं। एक पूर्व रिपोर्ट में पचपेड़वा पुलिस द्वारा नेपाल ले जाए जा रहे बैलों से जुड़े मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी का उल्लेख है। इसलिए यदि कथित तस्करी संबंधी आरोपों के समर्थन में बैंक लेनदेन, कॉल डिटेल, ऑडियो, वीडियो, गवाह, जब्ती अभिलेख, विभागीय शिकायत या किसी जाँच एजेंसी की रिपोर्ट उपलब्ध है, तो उन्हें अलग से जाँच के विषय के रूप में उठाया जा सकता है।

क्या धार्मिक पहचान देखकर कार्रवाई की गई?

परिजनों ने आरोप लगाया कि दोनों युवकों को कई दिनों तक थाने में रखा गया और उनकी गिरफ्तारी/हिरासत की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। परिवार ने यह भी आशंका जताई कि उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जाँच का विषय है।

खाकी की असली परीक्षा जवाबदेही से

पुलिस की वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं है, बल्कि संविधान और कानून के प्रति जवाबदेही का भी प्रतीक है। किसी भी थाना प्रभारी से यह अपेक्षा होती है कि वह जाति, धर्म, राजनीतिक प्रभाव या व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर कानून के अनुसार कार्रवाई करे। यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है, तो वह गंभीर संवैधानिक प्रश्न है। यदि पुलिस ने कानून के अनुसार कार्रवाई की है, तो CCTV, GD, केस डायरी, गिरफ्तारी मेमो और मेडिकल रिकॉर्ड उसी का सबसे मजबूत प्रमाण होंगे। इसीलिए पचपेड़वा प्रकरण में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि SHO निलंबित क्यों हुए?, बल्कि यह होना चाहिए

14 से 18 अगस्त के बीच थाने में वास्तव में क्या हुआ?

  • दोनों युवकों को थाने कब लाया गया?
  • किस आदेश अथवा शिकायत के आधार पर लाया गया?
  • उनकी गिरफ्तारी कब दिखाई गई?
  • CCTV में क्या रिकॉर्ड है?
  • GD में क्या दर्ज है?
  • परिवार से मुलाकात की अनुमति कब दी गई?
  • मेडिकल परीक्षण कब कराया गया?
  • मजिस्ट्रेट के समक्ष कब पेश किया गया?
  • हाईकोर्ट के समक्ष पुलिस ने क्या जवाब दिया?
  • अपर पुलिस अधीक्षक की जाँच रिपोर्ट में किन बिंदुओं को दोषपूर्ण पाया गया?

इन सवालों के जवाब ही इस पूरे प्रकरण की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।

निष्कर्ष

पचपेड़वा SHO ओम प्रकाश चौहान का निलंबन अब एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में सामने आया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार निलंबन का आधार हाईकोर्ट के आदेश के बाद हुई जाँच में प्रथमदृष्टया सामने आई लापरवाही और कर्तव्य के प्रति उदासीनता है। वहीं, हिरासत की अवधि, CCTV, गिरफ्तारी प्रक्रिया और परिवार द्वारा लगाए गए अन्य आरोप ऐसे मुद्दे हैं जिनकी दस्तावेजी और स्वतंत्र जाँच आवश्यक है। किसी पुलिस अधिकारी को केवल आरोपों के आधार पर दोषी घोषित करना न्यायसंगत नहीं होगा, लेकिन यदि जाँच में कानून का उल्लंघन सिद्ध होता है तो वर्दी चाहे कितनी भी ऊँची जिम्मेदारी पर क्यों न हो, जवाबदेही तय होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्यता है। क्योंकि संविधान की नजर में पुलिस की वर्दी कानून से ऊपर नहीं, बल्कि कानून की सेवा के लिए है।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I