क्या भरत भूषण तिवारी की मौत सिर्फ एक एनकाउंटर है या सड़ चुकी व्यवस्था का आईना?
भरत भूषण तिवारी की मौत ने बिहार के साथ ही साथ पूरे भारत की न्याय व्यवस्था, पुलिस जवाबदेही और एनकाउंटर संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पढ़िए विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट।
भरत भूषण तिवारी प्रकरण: एक मौत नहीं, सड़ी हुई व्यवस्था के चेहरे से उठा पर्दा
26 वर्षीय समाजसेवी भरत भूषण तिवारी की पुलिस कार्रवाई में हुई मृत्यु ने बिहार ही नहीं, पूरे देश में एनकाउंटर, पुलिस जवाबदेही, न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस छेड़ दी है। इस घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में कानून का शासन कमजोर पड़ रहा है और उसकी जगह पुलिसिया विवेक, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा भीड़ की भावनाएं लेती जा रही हैं? भरत तिवारी दोषी थे या निर्दोष, इसका फैसला अदालत को करना चाहिए, लेकिन उनकी मौत ने उस व्यवस्था की पोल खोल दी है जहाँ न्याय की जगह गोली और जवाबदेही की जगह बयानबाजी ने ले ली है।
जब एक मौत सवाल बन जाती है
भरत भूषण तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद पैदा हुए सवाल अभी जीवित हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि पुलिस की गोली कैसे चली। सवाल यह भी है कि एक 26 वर्षीय युवक, जिसे उसके समर्थक समाजसेवी बताते हैं और विरोधी अपराधी, आखिर उस स्थिति तक पहुँचा कैसे जहाँ उसकी कहानी का अंत पुलिस की गोली पर हुआ? किसी लोकतांत्रिक समाज में किसी नागरिक की मृत्यु के बाद सबसे पहले सत्य की खोज होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे समाज में सत्य की खोज से पहले पक्ष चुन लिए जाते हैं। कोई उसे शहीद घोषित कर देता है, कोई अपराधी। कोई जाति के आधार पर निर्णय देता है, कोई राजनीतिक विचारधारा के आधार पर। ऐसे माहौल में सबसे बड़ा नुकसान न्याय का होता है।
वायरल वीडियो और सरकारी कहानी के बीच फँसा सच
भरत तिवारी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य वह वायरल वीडियो है जिसकी चर्चा लगातार हो रही है। यदि वीडियो में दिखाई दे रही परिस्थितियाँ वास्तविक हैं और यदि उन्होंने हथियार छोड़ दिया था, तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके बाद क्या हुआ? यदि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह वैधानिक और परिस्थितिजन्य थी तो स्वतंत्र न्यायिक जांच से परहेज क्यों? लोकतंत्र में सरकार की बात अंतिम सत्य नहीं होती। लोकतंत्र में सत्य का निर्धारण निष्पक्ष जांच, न्यायिक परीक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही से होता है। यही कारण है कि इस मामले में केवल विभागीय जांच नहीं, बल्कि स्वतंत्र न्यायिक जांच की माँग उठ रही है।
एनकाउंटर: न्याय या व्यवस्था की विफलता?
एनकाउंटर को लेकर समाज दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। एक वर्ग इसे अपराध नियंत्रण का प्रभावी हथियार मानता है। दूसरा वर्ग इसे संविधान और कानून के शासन पर हमला मानता है। लेकिन दोनों पक्षों से अलग हटकर एक तीसरी सचाई भी है। हर एनकाउंटर इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था कहीं न कहीं विफल हुई है। यदि पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है, अदालत में पेश कर सकती है और उसके खिलाफ मुकदमा चला सकती है, तो फिर गोली अंतिम विकल्प क्यों बनती है? और यदि गोली ही सबसे आसान विकल्प बन जाए तो फिर अदालतों, संविधान और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता क्या रह जाती है?
जनता एनकाउंटर का समर्थन क्यों करती है?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में सरकारें वही करती हैं जिसके लिए उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिलती है। आज बड़ी संख्या में लोग एनकाउंटर का समर्थन करते दिखाई देते हैं। इसके पीछे कारण अपराधियों के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास है। जब किसी मुकदमे का फैसला दस-दस वर्षों तक नहीं आता। जब पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकता है। जब पैसे और प्रभाव के दम पर लोग बच निकलते हैं। जब गवाह टूट जाते हैं और फाइलें धूल खाती रहती हैं। तब जनता के एक हिस्से को गोली न्याय से तेज दिखाई देती है। यहीं से लोकतंत्र का सबसे खतरनाक दौर शुरू होता है। क्योंकि जिस दिन समाज न्यायालयों से उम्मीद छोड़ देता है, उसी दिन कानून का शासन कमजोर पड़ने लगता है।
क्या पुलिस को न्याय करने का अधिकार दिया जा सकता है?
भारत का संविधान इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है- नहीं। पुलिस का काम अपराध रोकना, अपराधी को गिरफ्तार करना और साक्ष्य जुटाना है। न्याय करना अदालत का काम है। यदि पुलिस ही अपराधी तय करने लगे, सजा तय करने लगे और सजा लागू भी करने लगे, तो न्यायपालिका का अस्तित्व अर्थहीन हो जाएगा। इतिहास बताता है कि ऐसी शक्तियाँ अंततः दुरुपयोग का शिकार होती हैं। आज अपराधी माने जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ गोली चलती है। कल किसी राजनीतिक विरोधी के खिलाफ। परसों किसी सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ। और फिर धीरे-धीरे पूरा समाज भय के वातावरण में जीने लगता है।
राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र
भरत तिवारी प्रकरण ने राजनीति के दोहरे चरित्र को भी उजागर किया है। जब किसी दूसरी जाति या समुदाय के व्यक्ति का एनकाउंटर होता है तो कई लोग उसका समर्थन करते हैं। जब वही घटना अपने समुदाय के व्यक्ति के साथ होती है तो अचानक मानवाधिकार याद आने लगते हैं। यह प्रवृत्ति केवल एक दल या एक विचारधारा तक सीमित नहीं है। लगभग सभी राजनीतिक दल अवसर के अनुसार अपने सिद्धांत बदल लेते हैं। इसलिए असली सवाल व्यक्ति नहीं, सिद्धांत का होना चाहिए। यदि एनकाउंटर गलत है तो हर स्थिति में गलत है। यदि सही है तो हर स्थिति में सही होना चाहिए। न्याय का आधार व्यक्ति नहीं, सिद्धांत होना चाहिए।
सड़ांध सिर्फ पुलिस में नहीं, पूरे सिस्टम में है
भरत तिवारी की मौत को केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित कर देना भी अधूरा विश्लेषण होगा। सचाई यह है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है। समस्या उस व्यवस्था में है जहाँ- युवा बेरोजगारी से जूझ रहा है। न्याय वर्षों तक लंबित रहता है। प्रशासन जनता से दूर होता जा रहा है। राजनीतिक दल समाज को जातियों में बाँट रहे हैं। पुलिस पर राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। गरीब और सामान्य नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। जब व्यवस्था का हर स्तंभ कमजोर पड़ता है तो परिणाम केवल एक एनकाउंटर नहीं होता। परिणाम सामाजिक अविश्वास, आक्रोश और अराजकता के रूप में सामने आता है।
क्या भरत तिवारी की मौत टाली जा सकती थी?
यह प्रश्न जांच का विषय है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति जीवित पकड़ा जा सकता था और फिर भी उसकी मृत्यु हुई, तो निश्चित रूप से यह एक गंभीर प्रश्न है। लोकतंत्र की ताकत अपराधी को मारने में नहीं, बल्कि उसे कानून के सामने खड़ा करने में होती है। एक सभ्य राज्य अपने विरोधियों, आरोपियों और अपराधियों तक के अधिकारों की रक्षा करता है। यही लोकतंत्र और जंगलराज के बीच का मूल अंतर है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
लोकतंत्र की परीक्षा तब नहीं होती जब सब सरकार के समर्थन में हों। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सरकार को कठिन सवालों का सामना करना पड़े। आज भरत भूषण तिवारी प्रकरण वही कठिन सवाल पूछ रहा है- क्या पुलिस कानून से ऊपर है? क्या न्यायालयों की भूमिका कमजोर हो रही है? क्या एनकाउंटर त्वरित न्याय का नया मॉडल बनता जा रहा है? क्या जनता का न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा खत्म हो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या एक नागरिक का जीवन राज्य की सुविधा से कम मूल्यवान हो गया है?
निष्कर्ष: गोली नहीं, न्याय चाहिए
भरत भूषण तिवारी की मृत्यु का अंतिम सच जांच और अदालत के सामने आएगा। लेकिन इस घटना ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि समाज का बड़ा वर्ग न्याय व्यवस्था से निराश है और सरकारें उस निराशा का समाधान संस्थागत सुधारों से नहीं, बल्कि त्वरित कार्रवाई के प्रतीकों से खोज रही हैं। एनकाउंटर कभी भी न्याय का विकल्प नहीं हो सकता। गोली अपराधी को समाप्त कर सकती है, लेकिन अपराध पैदा करने वाली परिस्थितियों को नहीं। लोकतंत्र में राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बंदूक नहीं, उसका संविधान होता है। और जिस दिन संविधान की जगह बंदूक निर्णय लेने लगे, उसी दिन लोकतंत्र का क्षरण शुरू हो जाता है। भरत भूषण तिवारी की मौत का सच चाहे जो निकले, लेकिन इस घटना ने देश को आईना दिखा दिया है। आईना यह कि समस्या केवल एक युवक की मौत नहीं है। समस्या यह है कि व्यवस्था इतनी बीमार हो चुकी है कि अब लोग न्याय और गोली के बीच का अंतर भूलते जा रहे हैं।
What's Your Reaction?

