भारतीय भाषा परिषद में प्रेमचंद जयंती: साहित्य संवाद एवं श्रुति नाटक
कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर भारतीय भाषा परिषद एवं सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त तत्वावधान में 'प्रेमचंद और उनके सपनों का भारत' विषय पर साहित्य संवाद, श्रुति नाटक एवं प्रेमचंद ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।
कोलकाता, 2 अगस्त। भारतीय भाषा परिषद एवं सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर भारतीय भाषा परिषद सभागार में ‘प्रेमचंद और उनके सपनों का भारत’ विषय पर साहित्य संवाद, श्रुति नाटक एवं प्रेमचंद ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं बड़ी संख्या में युवा साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद भारत की सबसे बड़ी साहित्यिक आवाज़ हैं। उनके अधूरे सपने आज भी देश के युवाओं की चेतना में जीवित हैं क्योंकि उनका कथा साहित्य भारत की बहुआयामी स्वाधीनता का जीवंत प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है।
मनींद्र कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुमिता चट्टोराज ने कहा कि प्रेमचंद बीसवीं शताब्दी के बदलते भारत और उसके सामाजिक यथार्थ के सबसे सशक्त साक्षी रहे हैं। उन्होंने साहित्य को मानवीय जीवन के व्यापक सत्य से जोड़ते हुए समाज की आशाओं, संघर्षों, विरोध-प्रतिरोध और विडंबनाओं को व्यापक फलक पर चित्रित किया।
चितरंजन कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योतिमय बाग ने कहा कि प्रेमचंद किसान और मजदूरों के अधिकारों के पक्षधर थे। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो तथा भ्रष्टाचार, सूदखोरी और आर्थिक शोषण से मुक्त समाज का निर्माण हो।
युवा आलोचक डॉ. श्रद्धांजलि सिंह ने कहा कि प्रेमचंद राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करते हुए औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की स्वार्थपरक प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि नैतिक विकास, रचनात्मकता और सामाजिक परिवर्तन होना चाहिए।
युवा कवि डॉ. संजय राय ने कहा कि 'ठाकुर का कुआँ' जैसी कहानियों के माध्यम से प्रेमचंद ने स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को एक साझा सामाजिक संघर्ष से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनके साहित्य में आज के प्रतिरोध और सामाजिक न्याय की वैचारिकी के बीज स्पष्ट दिखाई देते हैं।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि प्रेमचंद भारतीयता के लेखक हैं और उनकी रचनाओं में युवाओं के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है। गोबर, हामिद, जामिद, झुनिया, सोफिया, मिठुआ और वंशीधर जैसे पात्र आज भी सपनों के भारत की संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस अवसर पर शोधार्थी शुभस्वप्ना के निर्देशन में प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े घर की बेटी' का प्रभावशाली श्रुति नाटक प्रस्तुत किया गया, जिसमें आशुतोष राउत, अंजलि साव, अमित चौधरी, संजना जायसवाल और फरहान अज़ीज़ ने अभिनय किया।
प्रेमचंद ज्ञान प्रतियोगिता में आरबीसी वुमेन कॉलेज की सुमित्रा चौहान प्रथम, सोना कुमारी एवं नंदिनी सिंह द्वितीय तथा सुमन कुमारी राम एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय की कामिनी सिंह-नंदिनी सिंह की टीम तृतीय स्थान पर रही। विजेताओं को विभिन्न साहित्यकारों एवं शिक्षाविदों ने सम्मानित किया।
समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के सफल संचालन में राजेश साव, विशाल साव, सुषमा कुमारी, ज्योति चौरसिया, सूर्य देव रॉय एवं अदिति दूबे ने भूमिका निभाई, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सुशील कांति ने किया।
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