गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण विरासत: राष्ट्रीय संगोष्ठी में मंथन
कोलकाता में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में गुरुकुल पद्धति पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। वक्ताओं ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान परंपरा और नई शिक्षा नीति की प्रासंगिकता पर विचार रखे।
कोलकाता, 6 अगस्त। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का सदियों से गौरवपूर्ण स्थान रहा है। गुरु केवल ज्ञान प्रदान करने वाला नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व, चरित्र और जीवन-दृष्टि को गढ़ने वाला मार्गदर्शक रहा है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भी भारतीय गुरुकुल परंपरा के मूल्यों और उसकी प्रासंगिकता को समझने की आवश्यकता है। इन्हीं विषयों पर विचार-मंथन के लिए आईक्यूएसी, सरोजिनी नायडू कॉलेज फॉर विमेन और भारतीय शिक्षण मंडल (बीएसएम), दक्षिणबंग प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में गुरुकुल पद्धति’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। कॉलेज के सेमिनार हॉल में आयोजित कार्यक्रम में शिक्षकों और छात्राओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। संगोष्ठी में वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का गौरवपूर्ण स्थान : तापस गोरोई
मुख्य अतिथि तापस गोरोई ने कहा कि भारत सभ्यता के विकास की भूमि रही है और भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने भारतीय इतिहास और परंपरा के उदाहरण देते हुए कहा कि चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य, रामदास और छत्रपति शिवाजी तथा रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के संबंध गुरु-शिष्य परंपरा की शक्ति को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में गुरु का महत्व केवल लौकिक शिक्षा तक सीमित नहीं है। जीवन के उच्चतर उद्देश्यों और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में भी गुरु को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भगवान राम और लक्ष्मण के जीवन में भी गुरु की भूमिका का उल्लेख भारतीय परंपरा में मिलता है।
गुरु शिष्य की प्रतिभा को पहचानकर उसे गढ़ता है : ममता चावला सरकार
सम्मानित अतिथि ममता चावला सरकार ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन काल से ही शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार रही है। उन्होंने आधुनिक शिक्षा और गुरुकुल पद्धति के बीच अंतर की चर्चा करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा उद्देश्य विद्यार्थियों को रोजगार के लिए तैयार करना है, जबकि पारंपरिक गुरुकुल व्यवस्था में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर जीवन और ज्ञान दोनों की शिक्षा प्राप्त करता था। उन्होंने कहा कि गुरु शिष्य की वास्तविक प्रतिभा को पहचानता है और उसके व्यक्तित्व को उसी अनुरूप विकसित करने का प्रयास करता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ना जरूरी : अरिंदम भट्टाचार्यजी
अरिंदम भट्टाचार्यजी ने कहा कि वे राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर भारतीय ज्ञान परंपरा में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा कि देश में लागू नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक तत्वों को स्थान दिया गया है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन और उसके समकालीन संदर्भों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
सच्चा गुरु शिष्य को मानवीय विकारों से मुक्त करता है : श्लोक पांडेय
वक्ता श्लोक पांडेय ने कहा कि एक सच्चे गुरु का दायित्व केवल विषयगत ज्ञान देना नहीं, बल्कि अपने शिष्य को मानवीय विकारों से मुक्त कर बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास करना है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान और अधिकार की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरुकुल परंपरा में भी नारी के सम्मान को महत्व दिया गया है। उन्होंने वर्तमान समय में बदलते वैचारिक परिदृश्य पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज संघर्ष केवल भौतिक स्तर पर नहीं, बल्कि विचारों और आख्यानों के स्तर पर भी है। सोशल मीडिया के माध्यम से तेजी से आख्यान निर्मित किए जा रहे हैं। ऐसे समय में नई पीढ़ी को केवल तैयार आख्यानों का जवाब देने के लिए नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण और विचारों के आधार पर सकारात्मक आख्यान गढ़ने के लिए भी तैयार होना होगा।
शांतिनिकेतन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रमाण : प्राचार्य डॉ. स्वागता दास मोहंता
कॉलेज की प्राचार्य डॉ. स्वागता दास मोहंता ने कहा कि कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर का शांतिनिकेतन गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंत मिसाल है। उन्होंने कॉलेज की शैक्षणिक एवं आधारभूत सुविधाओं की जानकारी देते हुए कहा कि सरोजिनी नायडू कॉलेज फॉर विमेन में विश्वविद्यालय स्तर की आवश्यक ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कॉलेज में अनेक स्नातक पाठ्यक्रमों के साथ पांच विषयों में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई संचालित हो रही है।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना से
राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना, ध्यान श्लोक और ध्यान वाक्य के साथ हुआ। इस अवसर पर सम्मानित अतिथियों एवं शिक्षकों ने मां सरस्वती, भारत माता, महर्षि वेदव्यास और सरोजिनी नायडू के चित्रों पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में ‘धन धान्ये पुष्पे भरा’ गीत की प्रस्तुति भी हुई।
संगोष्ठी के आयोजन और इसे सफल बनाने में कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक साव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम के अंत में आईक्यूएसी संयोजक डॉ. तापती जाना ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में कॉलेज के शिक्षकों के साथ बड़ी संख्या में छात्राओं की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम में भारतीय शिक्षा परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका को लेकर सार्थक विमर्श हुआ।
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