नंगे पाँव चला चुनाव, सबसे ज्यादा वोट लाया: बस कंडक्टर के बेटे दीपांशु शौकीन की DUSU जीत की कहानी

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026-27 में निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट पाकर उपाध्यक्ष पद जीता। सत्य निकेतन PG हादसे के बाद नंगे पाँव चलाए गए उनके अभियान में छात्र सुरक्षा और हॉस्टल का मुद्दा प्रमुख रहा।

Sep 20, 2026 - 23:25
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नंगे पाँव चला चुनाव, सबसे ज्यादा वोट लाया: बस कंडक्टर के बेटे दीपांशु शौकीन की DUSU जीत की कहानी
दीपांशु शौकीन की DUSU जीत की कहानी

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU का चुनाव सिर्फ एक कैंपस चुनाव नहीं माना जाता। यहाँ छात्र राजनीति के बड़े संगठन, संसाधन, प्रचार और संगठनात्मक ताकत लंबे समय से चुनावी मुकाबले का हिस्सा रहे हैं। ऐसे माहौल में 2026-27 के चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार ने उपाध्यक्ष पद जीतकर अलग पहचान बनाई। नाम है दीपांशु शौकीन

19 सितंबर को घोषित परिणाम में शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर 30,615 वोट हासिल किए। उन्होंने ABVP के ईशु मौर्य को हराया, जिन्हें 16,910 वोट मिले। शौकीन की जीत का अंतर 13,705 वोट रहा। इससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह रही कि उपाध्यक्ष पद के उनके 30,615 वोट DUSU के चारों केंद्रीय पदों के विजेताओं में सबसे अधिक थे। अध्यक्ष पद पर निर्वाचित यश डबास को 24,576 वोट मिले। यानी जिस उम्मीदवार के पास किसी बड़े छात्र संगठन का चुनावी टिकट नहीं था, वही केंद्रीय पैनल में सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार बन गया।

शुरुआत हुई सत्य निकेतन हादसे के बाद

दीपांशु शौकीन के चुनाव अभियान को समझने के लिए 6 सितंबर को लौटना होगा। उस दिन दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में ‘Hostel Daze’ नाम से संचालित एक छात्र PG की बहुमंजिला इमारत अचानक ढह गई। इमारत में छात्र रहते थे और हादसे के समय बेसमेंट में निर्माण/मरम्मत का काम चल रहा था। रेस्क्यू अभियान के बाद मृतकों की संख्या सात पहुंची। इनमें पाँच दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे। हादसे ने दिल्ली में छात्र आवासों की सुरक्षा और निजी PG व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। बाद की जाँच में भवन के निर्माण, अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट में किए जा रहे काम और सुरक्षा मानकों को लेकर कई सवाल सामने आए। इसी हादसे के बाद दीपांशु शौकीन ने जूते-चप्पल पहनना छोड़ दिया। उनका कहना था कि जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिलता, वे जूते नहीं पहनेंगे। इसके बाद उन्होंने छात्र सुरक्षा, हॉस्टल और PG व्यवस्था को लेकर अभियान चलाया। उनके नंगे पाँव चलने की तस्वीरें और वीडियो चुनाव अभियान का हिस्सा बन गए।

तेरह दिन बाद आया चुनाव परिणाम

6 सितंबर को हादसा हुआ था। 18 सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय में मतदान हुआ और 19 सितंबर को मतगणना के बाद परिणाम सामने आया। इन तेरह दिनों में दीपांशु लगातार नंगे पाँव प्रचार करते रहे। उनका अभियान सिर्फ चुनावी पोस्टर और नारों तक सीमित नहीं था। छात्र आवास और सुरक्षा उनके प्रमुख मुद्दों में रहे। उनकी जीत के बाद सामने आई तस्वीरों में छात्र आवास का मुद्दा फिर दिखाई दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने हॉस्टल की माँग को प्रमुखता देने की बात कही।

डीयू में हॉस्टल की समस्या कितनी बड़ी है?

यही वह मुद्दा है जिसके कारण सत्य निकेतन जैसी निजी PG बस्तियां हजारों छात्रों के लिए जरूरी हो जाती हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के 91 कॉलेजों में से 71 कॉलेजों में कॉलेज-स्तरीय हॉस्टल सुविधा नहीं है। 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर DU में करीब 2.5 लाख छात्र हैं, जबकि विभिन्न रिपोर्टों में हॉस्टल क्षमता लगभग 7,000 सीटों के आसपास बताई गई है। यानी विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद बड़ी संख्या में छात्रों को कैंपस से बाहर रहना पड़ता है। सत्य निकेतन, विजयनगर और ऐसे ही दूसरे इलाकों में PG और किराए के मकान इसी जरूरत को पूरा करते हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब छात्र जिस इमारत को अपना घर समझकर किराए पर लेते हैं, उसकी संरचनात्मक सुरक्षा की जानकारी उनके पास नहीं होती।

सत्य निकेतन में यह पहली घटना नहीं थी

सत्य निकेतन में 2026 का हादसा पहली बार नहीं था जब किसी इमारत ने जान ली। अप्रैल 2022 में इसी इलाके में एक तीन मंजिला मकान, जिसमें मरम्मत का काम चल रहा था, गिर गया था। हादसे में दो मजदूरों की मौत हुई थी। उनके नाम बिलाल और नसीम बताए गए थे। चार साल बाद उसी इलाके में फिर एक इमारत गिरी। इस बार मलबे में मजदूरों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र भी थे। यही वह बिंदु है जहाँ छात्र आवास का सवाल केवल किराए या सुविधा का सवाल नहीं रह जाता। यह सीधे सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।

कौन हैं दीपांशु शौकीन?

दीपांशु शौकीन दिल्ली के पीरागढ़ी से आते हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उनके पिता बस कंडक्टर हैं और माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता। उन्होंने शहीद भगत सिंह कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग में अध्ययन कर रहे हैं। उनके पिता चाहते थे कि वे UPSC की तैयारी करें। लेकिन दीपांशु ने छात्र राजनीति को अपना रास्ता चुना। DUSU चुनाव से पहले वे NSUI से जुड़े थे और संगठन से टिकट की माँग की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने संगठन के समर्थन से नामाँकन भी दाखिल किया था, लेकिन बाद में उन्हें नामाँकन वापस लेने के लिए कहा गया। उन्होंने ऐसा नहीं किया और स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। इस घटनाक्रम के अलग-अलग राजनीतिक पक्षों की अपनी व्याख्याएँ रही हैं। इसलिए बिना स्वतंत्र पुष्टि के उसके कारणों पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। पुष्ट तथ्य यह है कि दीपांशु निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में रहे और जीत गए।

नंगे पाँव और बौद्ध अध्ययन का एक दिलचस्प संयोग

दीपांशु वर्तमान में बौद्ध अध्ययन के विद्यार्थी हैं। बौद्ध विनय साहित्य में सोण कोलिविस की एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। कथा के अनुसार सोण अत्यंत परिश्रम से चलकर ध्यान करते थे। लगातार चलने से उनके पैर घायल हो गए और उनका चलने का मार्ग रक्त से भर गया। बाद में बुद्ध ने उन्हें एक-परत वाले जूते पहनने की अनुमति दी। उपलब्ध विनय-साहित्य की व्याख्याओं के अनुसार सोण ने ऐसी सुविधा केवल अपने लिए लेने में संकोच किया और अंततः यह अनुमति सभी भिक्षुओं के लिए कर दी गई। यहाँ एक सावधानी जरूरी है। दीपांशु ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि उन्होंने बौद्ध ग्रंथ की इस कथा से प्रेरित होकर जूते उतारे थे। इसलिए दोनों घटनाओं को कारण-परिणाम के रूप में जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन संयोग जरूर उल्लेखनीय है एक ओर बौद्ध परंपरा की कथा में घायल पैरों से जुड़ा सामूहिक कल्याण का प्रसंग है और दूसरी ओर उसी विषय का विद्यार्थी दिल्ली की सड़कों पर नंगे पाँव छात्र आवास और सुरक्षा का मुद्दा उठा रहा था।

हादसे के बाद प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई

सत्य निकेतन हादसे के बाद जाँच और कार्रवाई का दायरा बढ़ा। MCD ने चार से अधिक मंजिल वाले अवैध निर्माणों को सील करने का आदेश दिया। भवन के निर्माण, मंजूर नक्शे, अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट में हुए काम और अग्नि सुरक्षा को लेकर भी जाँच हुई। पुलिस ने PG संचालकों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। मामले में भवन मालिक और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका की भी जाँच हुई। दिल्ली हाई कोर्ट और अन्य न्यायिक प्रक्रियाओं में छात्र आवासों की सुरक्षा का मुद्दा भी सामने आया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि PG में रहने वाले छात्र केवल किरायेदार नहीं हैं; वे ऐसी इमारतों में रह रहे होते हैं जिनकी संरचनात्मक और अग्नि सुरक्षा उनके जीवन से सीधे जुड़ी है।

अगले शहर में बच्चे को PG में छोड़ने से पहले चार सवाल

सत्य निकेतन की घटना के बाद अभिभावकों के लिए कुछ सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।

बच्चे को किसी दूसरे शहर में PG में भेजते समय केवल कमरा, खाना और किराया देखना पर्याप्त नहीं है। कम-से-कम यह पूछा जाना चाहिए इमारत का स्वीकृत नक्शा क्या है और वास्तव में कितनी मंजिलें बनी हैं? बेसमेंट में कोई अवैध या अतिरिक्त निर्माण तो नहीं किया गया है? इमारत की संरचनात्मक सुरक्षा और अग्नि सुरक्षा की स्थिति क्या है? आपातकालीन निकास और आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने की सुरक्षित व्यवस्था है या नहीं? क्योंकि छात्र के लिए PG केवल रहने की जगह नहीं है। वह उसके माता-पिता के भरोसे का दूसरा नाम है।

चुनाव जीता, लेकिन मुद्दा बाकी है

दीपांशु शौकीन की जीत को केवल एक निर्दलीय उम्मीदवार की चुनावी सफलता के रूप में देखना पूरी कहानी नहीं बताता। उनके अभियान के केंद्र में सत्य निकेतन हादसे के बाद उठा छात्र सुरक्षा और आवास का सवाल था। DUSU के परिणाम ने यह भी दिखाया कि छात्र राजनीति में संगठन महत्वपूर्ण होने के बावजूद मुद्दे और व्यक्तिगत अभियान भी मतदाताओं तक पहुंच सकते हैं। अब असली परीक्षा चुनाव परिणाम के बाद शुरू होगी। क्या छात्र हॉस्टल की माँग आगे बढ़ेगी? क्या निजी PG की सुरक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी होगी? क्या भवनों के निरीक्षण नियमित होंगे? और क्या सत्य निकेतन में जान गंवाने वाले छात्रों और मजदूरों की मौत के बाद उठे सवालों का स्थायी समाधान निकलेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में प्रशासन, विश्वविद्यालय और नए छात्रसंघ नेतृत्वतीनों से माँगे जाएँगे। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इस चुनाव में एक तस्वीर सबसे अलग रही एक उम्मीदवार के पैरों में जूते नहीं थे, लेकिन मतपेटी में उसके वोट सबसे ज्यादा थे।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I