8 दिन की अवैध हिरासत पर हाईकोर्ट सख्त, प्रयागराज पुलिस को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंसूर अहमद मामले में प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने 8 दिन की अवैध हिरासत के लिए ₹2 लाख मुआवजा और संबंधित एसीपी से वसूली का आदेश दिया।
प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट में ‘अवैध हिरासत उद्योग’ पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 8 दिन जेल में रखने पर ₹2 लाख मुआवजा, एसीपी पर गिरेगी जवाबदेही
प्रयागराज/इलाहाबाद, 8 जून 2026। भारतीय लोकतंत्र में नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान का सबसे पवित्र अधिकार माना जाता है। लेकिन जब वही स्वतंत्रता कानून के रक्षक माने जाने वाले अधिकारियों के हाथों कुचली जाने लगे, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को एक ऐसे ही मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने न केवल एक व्यक्ति की आठ दिन की अवैध हिरासत को असंवैधानिक करार दिया, बल्कि पूरे कमिश्नरेट सिस्टम में निवारक धाराओं के दुरुपयोग की आशंका पर भी कड़ी टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेट नागरिकों को कानून के संरक्षण के लिए हैं, न कि उनकी स्वतंत्रता छीनने के लिए।
क्या है पूरा मामला?
मामला प्रयागराज जिले के थाना खीरी क्षेत्र के निवासी मंसूर अहमद उर्फ लल्लू से जुड़ा है। याचिका के अनुसार 19 मार्च 2026 की रात लगभग 12:50 बजे थाना खीरी के एसएचओ कृष्ण मोहन सिंह, उपनिरीक्षक उमेश सिंह, कांस्टेबल अंकित सिंह तथा त्रिभुवन पांडेय उनके घर पहुंचे और उन्हें जबरन उठाकर थाने ले गए। परिजनों का आरोप था कि गिरफ्तारी का कोई कारण नहीं बताया गया। पत्नी को धक्का देकर अलग कर दिया गया। थाने में मारपीट की गई। कई दिनों तक हिरासत में रखा गया। परिवार को कानूनी स्थिति की जानकारी नहीं दी गई। परिवार ने मुख्यमंत्री पोर्टल सहित कई अधिकारियों को शिकायत भेजी। जब कोई राहत नहीं मिली तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई।
हाईकोर्ट की शुरुआती सुनवाई में सामने आया बड़ा सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मंसूर अहमद को बीएनएसएस की धाराओं 170, 126 और 135 के तहत कार्यवाही दिखाकर जेल भेजा गया था। यहीं से अदालत का ध्यान एक बड़े संस्थागत प्रश्न की ओर गया। 27 अप्रैल 2026 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रयागराज सहित कई पुलिस कमिश्नरेटों में पुलिस आयुक्तों द्वारा इन धाराओं का दुरुपयोग किया जा रहा है और बड़ी संख्या में लोगों को जेल भेजा जा रहा है। अदालत ने पुलिस आयुक्त प्रयागराज को आदेश दिया कि ऐसे सभी व्यक्तियों की सूची प्रस्तुत की जाए जिन्हें इन धाराओं के तहत हिरासत में रखा गया है।
जांच में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
जब अदालत ने विस्तृत विवरण तलब किया तो तस्वीर कहीं अधिक गंभीर निकली। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, प्रयागराज कमिश्नरेट वर्ष 2024 में 283, 2025 में 1321और 2026 में 721लोगों को हिरासत में रखा गया है, इनमें अनेक व्यक्तियों को एक दिन, एक सप्ताह, दो सप्ताह, यहाँ तक कि बीस दिनों तक जेल में रखा गया था। अदालत ने इसे “Shocking State of Affairs” अर्थात “चौंकाने वाली स्थिति” बताया। न्यायालय ने कहा कि शांति भंग की आशंका से संबंधित निवारक धाराओं का उद्देश्य लोगों को लंबे समय तक जेल में रखना नहीं है।
कहाँ हुई कानूनी चूक?
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी एसीपी बारा एवं विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश था। अदालत ने पाया कि 19 मार्च 2026 को मंसूर अहमद को एसीपी के समक्ष पेश किया गया। उसी दिन उन्हें जेल भेज दिया गया। अगली तारीख सीधे 27 मार्च 2026 निर्धारित कर दी गई। रिकॉर्ड में कहीं नहीं लिखा गया कि उन्होंने व्यक्तिगत मुचलका देने से इनकार किया था। उन्हें तत्काल रिहा करने या अगले दिन अवसर देने की बजाय सीधे आठ दिन जेल में रखा गया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने मुचलका नहीं दिया था तो अगले ही दिन उसे पुनः अवसर दिया जाना चाहिए था। आठ दिन बाद की तारीख देना कानून की मूल भावना के विरुद्ध था।
बीएनएसएस की धाराओं का उद्देश्य क्या है?
धारा 126, 135 और 170 BNSS का उद्देश्य किसी संभावित शांति भंग की स्थिति को रोकना है।
ये धाराएँ दंडात्मक नहीं, निवारक (Preventive) प्रकृति की हैं। अर्थात व्यक्ति को सजा देने के लिए नहीं बल्कि शांति बनाए रखने के लिए सीमित अधिकार प्रदान करती हैं। लेकिन अदालत ने पाया कि इन धाराओं का उपयोग कई मामलों में लोगों को जेल भेजने के औजार के रूप में किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “पुलिस आयुक्त को दी गई मजिस्ट्रेटीय शक्तियों का अत्यधिक और अनुचित उपयोग किया जा रहा है।” अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित है। निवारक कार्यवाही को दंडात्मक हिरासत में नहीं बदला जा सकता। नागरिकों को जेल भेजना अंतिम विकल्प होना चाहिए। व्यक्तिगत मुचलका (Personal Bond) ही पर्याप्त है। अनावश्यक जमानतदार मांगना भी उचित नहीं है।
प्रति दिन ₹25,000 मुआवजा: हाईकोर्ट का नया मानक
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मुआवजे से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी नागरिक को 24 घंटे से अधिक अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो उसे प्रति दिन ₹25,000 मुआवजा दिया जाना चाहिए। मंसूर अहमद को आठ दिन अवैध हिरासत में रखा गया। इस आधार पर अदालत ने ₹25,000 × 8 दिन = ₹2,00,000 मुआवजा देने का आदेश दिया।
सरकार पहले भुगतान करेगी, फिर अधिकारी से वसूलेगी
अदालत ने केवल मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया। निर्णय में कहा गया कि पहले राज्य सरकार पीड़ित को राशि दे। उसके बाद विभागीय जांच कराई जाए। जांच में दोषी पाए जाने पर पूरी राशि संबंधित एसीपी, बारा, प्रयागराज से वसूली जाए। यह निर्देश प्रशासनिक जवाबदेही के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था पर उठे सवाल
यह फैसला केवल मंसूर अहमद तक सीमित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रयागराज में यह एक अकेला मामला नहीं है। गाजियाबाद कमिश्नरेट के विरुद्ध भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई थीं। राज्य सरकार को नई नीति बनाने की आवश्यकता है। निवारक धाराओं के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।
नागरिक स्वतंत्रता के लिए ऐतिहासिक फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय करने वाला एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह फैसला बताता है कि पुलिस आयुक्त भी कानून से ऊपर नहीं हैं। मजिस्ट्रेटीय शक्तियों का दुरुपयोग न्यायिक जांच के दायरे में आएगा। नागरिकों की स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अवैध हिरासत की कीमत अब सरकारी खजाने और जिम्मेदार अधिकारियों दोनों को चुकानी पड़ेगी। लोकतांत्रिक शासन में यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि राज्य की शक्ति नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है, उसके दमन के लिए नहीं। और शायद यही इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश है।
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