सुप्रीम कोर्ट का हेट स्पीच पर 2026 का फैसला: FIR के लिए पहले से मंज़ूरी की जरूरत नहीं, दिल्ली हेट स्पीच केस खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने से पहले मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित हेट स्पीच में कोर्ट को कोई अपराध नहीं मिला।

May 1, 2026 - 08:54
May 1, 2026 - 08:54
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सुप्रीम कोर्ट का हेट स्पीच पर 2026 का फैसला: FIR के लिए पहले से मंज़ूरी की जरूरत नहीं, दिल्ली हेट स्पीच केस खारिज
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि Section 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज कराने के निर्देश के लिए Sections 196/197 CrPC के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति (sanction) आवश्यक नहीं है। हालांकि, मामले की मेरिट पर कोर्ट ने Delhi High Court के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि संबंधित भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने 29 अप्रैल 2026 को वृंदा करात बनाम दिल्ली एनसीटी राज्य और अन्य सहित घृणा भाषण से जुड़े मामलों पर अहम फैसला दिया।

मामला क्या था?

यह मामला मुख्यतः 2020 के दिल्ली दंगों से पहले दिए गए कुछ राजनीतिक भाषणों को लेकर था, जिनमें आरोप लगाया गया कि ये भाषण घृणा भाषण (hate speech) की श्रेणी में आते हैं और इनके आधार पर FIR दर्ज होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता, जिनमें प्रमुख रूप से Brinda Karat v. State of NCT of Delhi & Others शामिल है, ने मांग की थी कि संबंधित नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज की जाए और जांच हो।

मुख्य कानूनी प्रश्न

इस मामले में दो प्रमुख सवाल थे:

1.     क्या मजिस्ट्रेट Section 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज कराने का आदेश देने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति (sanction) जरूरी है?

2.     क्या संबंधित भाषण भारतीय दंड संहिता के तहत घृणा भाषण या संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निष्कर्ष (Sanction पर)

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया:

पूर्व स्वीकृति (sanction) केवल cognizance लेने के चरण पर आवश्यक है, न कि FIR दर्ज करने या जांच शुरू करने के चरण पर।

अदालत ने कहा:

  • Section 156(3) CrPC के तहत मजिस्ट्रेट केवल जांच का आदेश देता है
  • इस स्तर को pre-cognizance stage माना जाता है
  • Sections 196/197 CrPC की बाध्यता cognizance stage पर लागू होती है

इस प्रकार, कोर्ट ने Delhi High Court के उस अवलोकन को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि sanction पहले आवश्यक है। यह फैसला भविष्य के मामलों में FIR दर्ज कराने की प्रक्रिया को अधिक सरल और स्पष्ट बनाएगा।

मेरिट पर कोर्ट का फैसला

हालांकि कानून की व्याख्या में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से असहमति जताई, लेकिन मामले के तथ्य (merits) पर हाईकोर्ट के निष्कर्ष को सही माना।

अदालत ने पाया:

  • भाषणों में किसी विशेष धार्मिक या सामाजिक समुदाय को स्पष्ट रूप से लक्षित नहीं किया गया।
  • भाषणों और बाद में हुई हिंसा के बीच सीधा कारण-परिणाम (causal link) स्थापित नहीं हुआ।
  • सार्वजनिक अशांति या हिंसा को सीधे इन भाषणों से जोड़ने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, इसलिए कोर्ट ने कहा कि कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) नहीं बनता और इस आधार पर FIR दर्ज कराने की मांग को खारिज कर दिया गया।

घृणा भाषण की कसौटी पर कोर्ट का दृष्टिकोण

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्पष्ट किया कि:

  • केवल राजनीतिक या उत्तेजक भाषण को स्वतः घृणा भाषण नहीं माना जा सकता
  • घृणा भाषण साबित करने के लिए आवश्यक है:
    • किसी विशिष्ट समुदाय को लक्षित करना।
    • हिंसा या वैमनस्य को उकसाने का स्पष्ट तत्व।
    • भाषण और परिणाम (violence/disorder) के बीच ठोस संबंध।

फैसले का व्यापक प्रभाव

न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव

  • मजिस्ट्रेट अब बिना sanction के FIR का आदेश दे सकते हैं
  • जांच शुरू करने में प्रशासनिक बाधाएं कम होंगी

घृणा भाषण मामलों पर प्रभाव

  • केवल आरोप या राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं होंगे
  • अदालतें अब अधिक ठोस साक्ष्य और प्रभाव पर जोर देंगी

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम आपराधिक दायित्व

यह फैसला एक संतुलन स्थापित करता है:

  • एक ओर स्वतंत्र अभिव्यक्ति (free speech)
  • दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था

कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण अवधारणाएं

अवधारणा

अर्थ

Pre-cognizance

FIR और जांच का प्रारंभिक चरण

Cognizance

जब अदालत अपराध को औपचारिक रूप से स्वीकार करती है

Sanction (196/197 CrPC)

कुछ मामलों में अभियोजन के लिए सरकारी अनुमति

Section 156(3) CrPC

मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज कराने का आदेश

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