अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को ₹25,000 मुआवजा देने का आदेश
हंडिया, प्रयागराज में 24 घंटे की अवैध पुलिस हिरासत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 21 के उल्लंघन को मानते हुए ₹25,000 मुआवजा और ₹10,000 लागत देने का आदेश दिया।
हंडिया थाने के तत्कालीन चौकी प्रभारी सूर्य प्रकाश दुबे पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी; घरेलू विवाद में 24 घंटे की अवैध हिरासत को बताया अनुच्छेद 21 का खुला उल्लंघन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज के हंडिया क्षेत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए माना कि याचिकाकर्ता मतांबर मिश्र को नवंबर 2022 में बिना किसी वैधानिक अधिकार के लगभग 24 घंटे तक पुलिस हिरासत में रखा गया था। न्यायालय ने कहा कि घरेलू विवाद के आधार पर किसी व्यक्ति को थाने लाकर लॉकअप में बंद करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को याचिकाकर्ता को ₹25,000 मुआवजा और ₹10,000 वाद व्यय देने का आदेश दिया तथा यह राशि संबंधित पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे से वसूलने की स्वतंत्रता भी प्रदान की।
अवैध हिरासत पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार शामिल थे, ने 29 मई 2026 को दिए गए अपने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि राज्य की पुलिस किसी नागरिक की स्वतंत्रता से मनमाने ढंग से खिलवाड़ नहीं कर सकती। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी बिना कानूनी अधिकार के किसी व्यक्ति को हिरासत में लेता है, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का गंभीर अतिक्रमण है।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता मतांबर मिश्र का आरोप था कि 26 नवंबर 2022 को तत्कालीन चौकी प्रभारी बरौत, थाना हंडिया, प्रयागराज सूर्य प्रकाश दुबे उन्हें उनके घर से जबरन उठाकर ले गए। याचिका के अनुसार, उन्हें बिना किसी एफआईआर या वैधानिक कार्रवाई के हिरासत में लिया गया। पहले बरौत चौकी और फिर हंडिया थाने ले जाया गया। लगभग 24 घंटे तक लॉकअप में रखा गया। रिहाई के लिए ₹20,000 रिश्वत की मांग की गई। बाद में धारा 107/116 सीआरपीसी की कार्यवाही दिखाकर हिरासत को वैध ठहराने की कोशिश की गई।
अदालत ने क्यों माना कि हिरासत अवैध थी?
फैसले में अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे ने अपने जवाबी हलफनामे में याचिकाकर्ता की हिरासत का स्पष्ट खंडन नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि जब इतने गंभीर आरोप लगाए गए हों और उनका स्पष्ट प्रतिवाद न किया जाए, तो यह माना जाएगा कि तथ्य स्वीकार हैं। खंडपीठ ने टिप्पणी की: “अवैध हिरासत का तथ्य स्वीकार माना जाएगा।” अदालत ने माना कि घरेलू विवाद की शिकायत मिलने पर पुलिस को किसी व्यक्ति को पकड़कर लॉकअप में बंद करने का अधिकार नहीं था।
घरेलू विवाद में 107/116 CrPC की कार्यवाही पर भी सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि पुलिस ने बाद में याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 107/116 सीआरपीसी की कार्यवाही शुरू करवाई। हाईकोर्ट ने कहा, धारा 107/116 सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए है। घरेलू विवाद या पारिवारिक झगड़े पर इन धाराओं का प्रयोग नहीं किया जा सकता। यह कार्रवाई अवैध हिरासत को छिपाने के लिए की गई प्रतीत होती है। न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि तत्कालीन एसडीएम हंडिया ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि घरेलू विवाद के पहलू पर विचार नहीं किया गया था और इसके लिए उन्होंने बिना शर्त माफी भी माँगी।
अनुच्छेद 21 पर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
फैसले में न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान की मूल आत्मा है। खंडपीठ ने कहा, “पुलिस अधिकारी ने शिकायत के आधार पर, जिस पर उसे कार्रवाई का अधिकार नहीं था, याचिकाकर्ता को घर से उठाया और बिना विधिक अधिकार के 24 घंटे तक लॉकअप में रखा।” अदालत ने माना कि यह अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
“पुलिस स्वयं कानून नहीं बन सकती”
निर्णय में हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट सहित कई न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों को यह संदेश जाना चाहिए कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं। अदालत ने टिप्पणी की “पुलिस अधिकारियों को यह संदेश मिलना चाहिए कि वे स्वयं कानून नहीं हैं।” न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में केवल चेतावनी या विभागीय कार्रवाई की जाए तो यह पर्याप्त निवारक प्रभाव नहीं डालती।
मुआवजा और लागत का आदेश
मामले में हाईकोर्ट ने ₹25,000 अवैध हिरासत के लिए मुआवजा, ₹10,000 वाद व्यय का आदेश दिया। सरकार भुगतान के बाद पूरी राशि संबंधित पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे से वसूल सकती है। याचिकाकर्ता चाहे तो अलग से क्षतिपूर्ति का दीवानी वाद भी दायर कर सकता है।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय केवल एक व्यक्ति की अवैध हिरासत तक सीमित नहीं है। इस फैसले के प्रमुख संदेश हैं:
- घरेलू विवाद पुलिस हिरासत का आधार नहीं बन सकता।
- धारा 107/116 CrPC का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 21 के उल्लंघन पर संवैधानिक न्यायालय सीधे मुआवजा दे सकते हैं।
- अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से वसूली संभव है।
- पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करना न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है।
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