देश, बंगाल और विचारधाराओं के बीच : डॉ. विजय बहादुर सिंह का आत्मस्पष्टीकरण

डॉ. विजय बहादुर सिंह का यह महत्वपूर्ण लेख बंगाल, भारतीय संस्कृति, लोकतंत्र, वामपंथ, गांधीवाद और सांप्रदायिक राजनीति पर गहरी वैचारिक टिप्पणी प्रस्तुत करता है। पढ़िए एक लेखक की सांस्कृतिक और राजनीतिक आत्मस्वीकृति।

May 7, 2026 - 15:24
May 7, 2026 - 15:56
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देश, बंगाल और विचारधाराओं के बीच : डॉ. विजय बहादुर सिंह का आत्मस्पष्टीकरण
डॉ. विजय बहादुर सिंह

फेसबुक पर लेखक राजेश्वर वशिष्ठ ने मुझसे पूछा कि “ममता बनर्जी की हार से मैं उनसे अधिक दुखी क्यों दिखाई दे रहा हूँ?” साथ ही उन्होंने यह सलाह भी दी कि मुझे 'विलुप्त होते वामपंथ' पर चिंतन करना चाहिए।

उनकी भाषा इतनी विनम्र, आत्मीय और गंभीर थी कि उसमें मुझे किसी प्रकार का आरोप नहीं, बल्कि एक साहित्यिक सहचर की स्वाभाविक जिज्ञासा दिखाई दी। इसलिए मैंने इसे केवल राजनीतिक प्रश्न न मानकर, अपनी वैचारिक स्थिति स्पष्ट करने का अवसर समझा।

मेरे लिए ममता बनर्जी, नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव अथवा किसी भी अन्य नेता का महत्व उतना ही है, जितना किसी विशाल राष्ट्रीय परिस्थिति में एक आवश्यक राजनीतिक साधन का होता है। वे राष्ट्र नहीं हैं। वे लोकतंत्र की उस नाव के नाविक हैं, जिसे जनता पाँच वर्षों के लिए सत्ता संचालन हेतु चुनती है।

राष्ट्र इन व्यक्तियों से कहीं बड़ा है। वह करोड़ों मनुष्यों की साझा स्मृतियों, संस्कृतियों, भाषाओं, संघर्षों और सह-अस्तित्व से निर्मित होता है। कोई भी नेता उस विराट चेतना का पर्याय नहीं हो सकता।

यदि मैं बंगाल को लेकर दुख व्यक्त करता हूँ, तो वह किसी दलगत निष्ठा के कारण नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक बंगाल के कारण है जिसने मेरी ऐतिहासिक और बौद्धिक चेतना को निर्मित किया।

यह वही बंगाल है जहाँ राजा राममोहन राय ने आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण की नींव रखी; जहाँ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने राष्ट्रगीत रचा; जहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने मनुष्य की सार्वभौमिक आत्मा का गान किया; जहाँ स्वामी विवेकानंद ने विश्वमानवता का संदेश दिया; जहाँ काज़ी नजरूल इस्लाम ने सांप्रदायिक सीमाओं से परे मनुष्य की आवाज़ बुलंद की; और जहाँ ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने सामाजिक न्याय की मशाल जलाई।

मेरी संवेदना इसी सांस्कृतिक परंपरा से निर्मित हुई है। यही कारण है कि बंगाल मेरे लिए केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं, बल्कि भारतीय बहुलता और सहअस्तित्व की जीवित प्रयोगशाला है।

आज भारतीय राजनीति जिस दिशा में बढ़ती दिखाई देती है, वहाँ इतिहास, संस्कृति और बहुलतावादी जीवन-पद्धति के प्रति भरोसा लगातार क्षीण होता जा रहा है। समाज केवल हिंदू-मुसलमान के द्वंद्व तक सीमित नहीं रह गया; वह जातीय, सांप्रदायिक और वैचारिक खाँचों में विभाजित होता जा रहा है। सत्ता समूह अपने-अपने हिस्से का भारत गढ़ना चाहते हैं, मानो संपूर्ण भारत की अवधारणा अब अप्रासंगिक हो चली हो।

ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति अपने भीतर उस ‘देश’ को बचाए रखने की बेचैनी महसूस करता है, तो उसे सिरफिरा कहा जा सकता है, किंतु शायद वही बेचैनी लोकतंत्र और संस्कृति की अंतिम आशा भी है।

जहाँ तक ममता बनर्जी का प्रश्न है, वे बंगाल की मिट्टी से निकली हुई नेता हैं। उन्हें कम-से-कम इस प्रदेश की ऐतिहासिक आत्मा और सामाजिक संरचना का अनुभव है। इसके विपरीत यदि राजनीति केवल “डबल इंजन” या “ट्रिपल इंजन” की केंद्रीकृत सत्ता-कल्पना में बदल जाती है, तो वहाँ स्थानीय सांस्कृतिक स्वायत्तता और बहुलता पर संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

मुझे सबसे अधिक चिंता उस वातावरण की है जहाँ राजनीतिक शक्ति के साथ वैचारिक वर्चस्व भी स्थापित किया जा रहा है। जब सांस्कृतिक विविधता की जगह एकरूपता को राष्ट्रवाद का नाम दिया जाने लगे, तब लोकतंत्र केवल चुनावी आँकड़ों तक सीमित हो जाता है।

मेरे भीतर न तो किसी कठोर वामपंथ का अंधसमर्थन है, न दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षण। मेरा विश्वास जितना गौतम बुद्ध में है, उतना ही महात्मा गांधी में भी। कुछ आस्था वामपंथ की सामाजिक न्याय संबंधी दृष्टि में भी है, किंतु किसी विचारधारा को मैं भारत की अंतिम नियति नहीं मानता।

मैंने साहित्यिक जीवन में छायावादियों से लेकर नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी तक की परंपरा से संवाद किया है।

सन् 1982 से 1989 तक मैं जनवादी लेखक संघ, मध्यप्रदेश का प्रादेशिक अध्यक्ष रहा और राष्ट्रीय सचिवमंडल से भी जुड़ा, लेकिन तब भी किसी राजनीतिक दल का कैडर नहीं बना। क्योंकि मेरे लिए साहित्य किसी पार्टी की शाखा नहीं, मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का क्षेत्र है।

भारत गांधीवाद, मार्क्सवाद, हिंदुत्व या किसी एक विचारधारा से बड़ा है। जो भी विचार इस देश की बहुलता, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करेगा, वही मेरे लिए स्वीकार्य और वरणीय होगा।

शायद यही मेरी वैचारिक स्थिति है। और संभवतः यही मेरे दुख, मेरी चिंता और मेरी आशा तीनों का वास्तविक स्रोत भी।

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डॉ. विजय बहादुर सिंह विजय बहादुर सिंह हिंदी के प्रमुख आलोचक, कवि और संपादक हैं। आपने ‘आलोचक का स्वदेश’, ‘वृहत्त्रयी’, ‘कविता और संवेदना’, ‘नागार्जुन का रचना संसार’ जैसी कृतियों से आलोचना को नई दृष्टि दी। ‘मौसम की चिट्ठी’ और ‘भीमबैठका’ आपकी चर्चित काव्य कृतियाँ हैं। आपने भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यंत कुमार और नंददुलारे वाजपेयी की रचनावलियों का संपादन किया। आपको रामविलास शर्मा सम्मान, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार समेत कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हैं।