भारतीय भाषा परिषद में ‘प्रेम की परिभाषा’ पर सार्थक परिचर्चा
कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद में ‘प्रेम की परिभाषा’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में मृत्युंजय श्रीवास्तव ने प्रेम को मानवीय साहचर्य और प्रतिबद्धता का आधार बताया।
कोलकाता | 20 फरवरी | कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था भारतीय भाषा परिषद में ‘प्रेम की परिभाषा’ विषय पर एक सार्थक और विचारोत्तेजक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद की पदाधिकारी एवं ‘सांझी बैठक’ की संयोजिका विमला पोद्दार ने की।
मुख्य वक्ता लेखक-समीक्षक मृत्युंजय श्रीवास्तव ने प्रेम के विविध आयामों पर अपनी स्पष्ट और निर्भीक टिप्पणी रखते हुए कहा कि “प्रेम का संबंध हमारी समझ और साहचर्य से है। यह जीवन में एकाधिक बार हो सकता है और हर बार हमें नए अनुभवों से जोड़ता है। प्रेम हमें अधिक मानवीय और प्रतिबद्ध बनाता है।” उनके वक्तव्य ने उपस्थित श्रोताओं को प्रेम की पारंपरिक अवधारणाओं से आगे बढ़कर उसे अनुभव और चेतना के स्तर पर समझने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम की संयोजक सुधा झुनझुनावाला ने अपनी रचना का प्रभावशाली पाठ करते हुए प्रेम के संवेदनात्मक पक्ष को स्वर दिया।
काव्य पाठ और विचार-साझेदारी
इस अवसर पर कामिनी केजरीवाल, लक्खी चौधरी, शर्मिला चौधरी, रचना सरन, उर्मिला ध्यावाला, मंजू पोद्दार, पौलीरानी राउत, सुषमा कुमारी, सरिता छवछरिया, कंचन भगत, श्वेता गुप्ता, सत्यम पांडेय, राज्यवर्द्धन, सेराज खान बातिश, शुभोस्वप्ना, गीता दूबे, शिवम तिवारी, सुरेश शॉ और श्रद्धा उपाध्याय ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया तथा प्रेम के विविध अनुभवों को साझा किया।
कार्यक्रम में प्रियंकर पालीवाल, अल्पना नायक, पद्माकर व्यास, सुशील कांति, संजय राय, रमाशंकर सिंह, अनिल साह, प्रो. हाशमी, श्रीमंतो मुखर्जी, प्रो. मंटू दास एवं संस्कृति कर्मी संजय जायसवाल सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का सफल एवं संयत संचालन रेखा ड्रोलिया ने किया।
यह परिचर्चा केवल प्रेम की भावुक व्याख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रेम को सामाजिक, मानवीय और वैचारिक संदर्भों में देखने का एक प्रयास भी रही। वक्ताओं ने प्रेम को प्रतिबद्धता, संवाद और सह-अस्तित्व की आधारभूमि बताया।
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