इलाहाबाद हाईकोर्ट का तमाचा: डॉ. नूतन ठाकुर को राहत, यूपी सरकार की ‘तानाशाही राजनीति’ पर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ. नूतन ठाकुर को अग्रिम जमानत देकर बड़ी राहत दी। फैसले ने यूपी सरकार की कार्यशैली और कथित राजनीतिक प्रतिशोध पर गंभीर सवाल खड़े किए। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Mar 20, 2026 - 05:48
Mar 20, 2026 - 05:49
 0
इलाहाबाद हाईकोर्ट का तमाचा: डॉ. नूतन ठाकुर को राहत, यूपी सरकार की ‘तानाशाही राजनीति’ पर उठे सवाल
डॉ. नूतन ठाकुर

कोलकाता/लखनऊ, 19 मार्च 2026 जब सत्ता अपने विरोधियों को कानून के शिकंजे में कसने का औजार बना ले, तब न्यायालय ही अंतिम उम्मीद बनता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहाँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डॉ. नूतन ठाकुर को अग्रिम जमानत देकर न केवल उन्हें राहत दी, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष, लेकिन तीखा प्रश्नचिह्न भी लगा दिया। वर्ष 1999 से जुड़े एक पुराने प्रकरण में अचानक सक्रियता और कार्रवाई ने पहले ही राजनीतिक मंशा पर संदेह पैदा कर दिया था। इससे पहले इसी मामले में पूर्व आईपीएस और आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर को जेल भेजा जाना भी सवालों के घेरे में रहा। अब डॉ. नूतन ठाकुर को न्यायालय से मिली राहत यह संकेत देती है कि कानून का उपयोग यदि बदले की भावना से किया जाएगा, तो न्यायपालिका उस पर अंकुश लगाने में पीछे नहीं हटेगी।

न्याय बनाम सत्ता का टकराव

माननीय न्यायालय का यह निर्णय केवल एक व्यक्ति को राहत नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर प्रहार है जिसमें असहमति को अपराध में बदलने की कोशिश की जाती है। आजाद अधिकार सेना ने इस फैसले को "न्याय की जीत" बताया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है- क्या उत्तर प्रदेश में कानून अब न्याय के लिए है या सत्ता के संरक्षण के लिए?

राजनीतिक प्रतिशोध या प्रशासनिक कार्रवाई?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • पुराने मामलों को अचानक सक्रिय करना
  • विपक्षी या आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बनाना
  • पुलिस और प्रशासन का चयनात्मक उपयोग

ये सभी संकेत एक ‘soft authoritarianism’ यानी मुलायम तानाशाही मॉडल की ओर इशारा करते हैं।

बढ़ता असंतोष

डॉ. नूतन ठाकुर लंबे समय से महिला अधिकार, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं। ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई को कई लोग विरोध की आवाज दबानेकी कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला केवल कानूनी राहत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस आत्मा की रक्षा है जिसमें असहमति का सम्मान होता है।

लेकिन यह भी स्पष्ट है कि जब-जब सत्ता सीमाएँ लाँघेगी, तब-तब न्यायपालिका उसे आईना दिखाती रहेगी।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

पूजा अग्रहरि पूजा अग्रहरि ने 2020 में दैनिक विश्वमित्र से पत्रकारिता की शुरुआत की। युवा शक्ति और जागो देश यूट्यूब चैनलों से जुड़ने के बाद, वर्तमान में पिछले 1 वर्ष से ‘जागो टीवी’ वेब पोर्टल में कंटेंट राइटर हैं। ‘कोई और राकेश श्रीमाल’ पुस्तक की सह-संपादक रही हैं। आपने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है।