पिता-पुत्र को फर्जी केस में फँसाने का आरोप, 20 पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश

बहराइच के सुजौली में पिता-पुत्र को कथित फर्जी मुकदमे में जेल भेजने का आरोप। तत्कालीन थाना प्रभारी समेत 20 पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश; अनुपालन की स्थिति पर सवाल।

Oct 29, 2026 - 20:27
 0
पिता-पुत्र को फर्जी केस में फँसाने का आरोप, 20 पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश

न्यायालय के निर्देश के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं होने की खबर; पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक आदेश के अनुपालन पर उठे सवाल

बहराइच | जागो टीवी न्यूज़ डेस्क | उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। सुजौली थाना क्षेत्र में एक पिता और उसके बेटे को कथित तौर पर फर्जी आपराधिक मामले में फँसाकर जेल भेजने के आरोपों पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), बहराइच ने तत्कालीन थाना प्रभारी समेत 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, न्यायालय ने 13 अक्तूबर 2026 को यह आदेश दिया था। हालांकि, 27 से 29 अक्तूबर के बीच प्रकाशित खबरों में आदेश के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं होने की बात कही गई है। यह स्थिति न्यायालय के आदेश के अनुपालन और पुलिसकर्मियों के विरुद्ध शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

क्या है पूरा मामला?

प्रकाशित समाचारों के अनुसार, शिकायतकर्ता नंद गोपाल यादव बहराइच जिले के सुजौली थाना क्षेत्र के विजय नगर के निवासी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 23 अगस्त 2024 को तत्कालीन सुजौली थाना प्रभारी लगभग 20 पुलिसकर्मियों के साथ उनके घर पहुंचे। शिकायतकर्ता का दावा है कि पुलिसकर्मी जबरन घर में घुसे और परिवार के सदस्यों के साथ अभद्रता की।

नंद गोपाल यादव के मुताबिक, पुलिसकर्मी अगले दिन, 24 अगस्त 2024 को शाम लगभग 7 बजे दोबारा उनके घर पहुंचे और उन्हें तथा उनके छोटे बेटे सुजीत को जबरन थाने ले गए। उनका आरोप है कि बाद में दोनों को एक कथित फर्जी आपराधिक मामले में फँसाकर जेल भेज दिया गया।

शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप

नंद गोपाल यादव का कहना है कि जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने संबंधित पुलिस अधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष कई बार शिकायतें प्रस्तुत कीं। उनका आरोप है कि इन शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बहराइच ने तत्कालीन सुजौली थाना प्रभारी समेत 20 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध FIR दर्ज करने का आदेश दिया। समाचारों में आदेश की तारीख 13 अक्तूबर 2026 बताई गई है।

आदेश के बाद भी FIR दर्ज नहीं होने का सवाल

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, न्यायालय के निर्देश के बावजूद प्राथमिकी दर्ज किए जाने की पुष्टि नहीं हुई थी। समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, मोतीपुर के क्षेत्राधिकारी अमित कुमार सिंह ने न्यायालय के आदेश की जानकारी होने की बात कही थी। उन्होंने बताया कि वह उस समय जिले से बाहर थे और लौटने के बाद की जा रही कार्रवाई के संबंध में जानकारी देंगे। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में इसके बाद FIR दर्ज होने, प्राथमिकी संख्या जारी होने या विवेचना शुरू होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिलती।

क्या इस मामले में वसूली का आरोप भी प्रमाणित है?

पुलिस पर अवैध वसूली और फर्जी मुकदमों में फँसाने के व्यापक आरोपों के संदर्भ में इस घटना को लेकर चर्चा हो रही है। लेकिन उपलब्ध समाचारों में नंद गोपाल यादव और उनके बेटे के इस विशेष मामले में वसूली की किसी विशिष्ट घटना, मांगी गई रकम या भुगतान के प्रमाण का स्पष्ट विवरण नहीं मिलता।

पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों का प्रश्न

यदि किसी नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में लिया जाता है, आपराधिक मामले में जानबूझकर गलत तरीके से फँसाया जाता है या कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन होता है, तो यह गंभीर कानूनी प्रश्न पैदा करता है। दूसरी ओर, पुलिसकर्मियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जाँच और उनका पक्ष सुनना भी न्यायसंगत प्रक्रिया का हिस्सा है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और निरोध के मामलों में कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है। आपराधिक प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी, हिरासत और जाँच की वैधता का निर्धारण संबंधित तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए। बहराइच का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें शिकायतकर्ता ने पुलिस के आचरण को चुनौती देने के लिए न्यायालय का सहारा लिया और न्यायालय से FIR दर्ज करने का आदेश मिलने की खबर सामने आई। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी आदेश के अनुपालन में क्या कदम उठाते हैं और आरोपों की निष्पक्ष जाँच कैसे सुनिश्चित की जाती है।

अब किन सवालों के जवाब जरूरी हैं?

1.     क्या न्यायालय के 13 अक्तूबर 2026 के आदेश के अनुपालन में FIR दर्ज कर ली गई है?

2.     यदि प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है, तो इसका आधिकारिक कारण क्या है?

3.     पिता-पुत्र को जिस मूल आपराधिक मामले में जेल भेजे जाने का आरोप है, उसमें दर्ज FIR और गिरफ्तारी संबंधी अभिलेख क्या बताते हैं?

4.     क्या 23 और 24 अगस्त 2024 की घटनाओं से संबंधित कोई CCTV फुटेज, स्वतंत्र गवाह या अन्य दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध हैं?

5.     तत्कालीन थाना प्रभारी और अन्य संबंधित पुलिसकर्मियों का इस मामले में क्या पक्ष है?

6.     क्या सक्षम अधिकारी ने न्यायालय के आदेश के अनुपालन की समीक्षा की है?

इन सवालों के जवाब सामने आने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत पर आगे क्या कानूनी कार्रवाई हुई और न्यायालय के निर्देश का कितना अनुपालन किया गया।

 

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I