कविता गूँज उठी: विजय बहादुर सिंह की कविता में प्रतिरोध की आवाज
मृत्युंजय श्रीवास्तव का यह आलेख वरिष्ठ कवि विजय बहादुर सिंह की कविता में निहित जनचेतना, प्रतिरोध और सत्ता से सवाल पूछने के साहस को रेखांकित करता है। धर्मवीर भारती की ‘मुनादी’ के संदर्भ में यह लेख कविता की सामाजिक भूमिका और जनता की सामूहिक शक्ति पर विचार करता है।
कविता गूँज उठी
यह कौन है, जो याद दिला रहा था कि ‘तुम सचमुच भारत भाग्य विधाता हो/ तुम्हारे लाने से आजादी आ सकती है/ बड़ी-से-बड़ी सरकारें संसद से उठाकर/ पटकी जा सकती हैं सड़क पर।’ वह यह बताना भी नहीं भूलता कि ‘अगर तुम चाह लो, तो कुछ भी क्यों नहीं हो सकता/ किसी पल चाहकर देखना, पाओगे कि कोई न कोई चिनगारी/ तुम्हारी अपनी ही राख में दबी पड़ी है।’
आज यही चिनगारी लावा बन रही है। जिसे राख समझा जा रहा था, उसके भीतर प्रतिरोध की आग पल रही थी। मोर्चे पर डटे लोगों के अस्तित्व में दबी यह आग अब लपट बनकर बाहर आ रही है।
लेकिन मुख्य बात यह नहीं है कि याद कौन दिला रहा था या हौसला कौन बँधा रहा था। मुख्य बात यह है कि उसकी बात सुनी गई। कविता की एक आवाज लोगों के भीतर दबी चिनगारी को पहचानने का माध्यम बनी और वह चिनगारी प्रतिरोध की आग में बदलने लगी।
यह वही कवि है, जो इंद्र से सवाल पूछता है, ‘बोलो इन्द्र!/ बोलते क्यों नहीं/ देते क्यों नहीं तुम उत्तर/ पी तो नहीं गए तुम/ जरूरत से ज्यादा सोम/ कान बचे नहीं तो सुनने लायक तुम्हारे।’ वह यहीं नहीं रुकता। इंद्र के सामने एक और सवाल रखता है, ‘हे इन्द्र!/ तुम इतना खाते क्यों हो/ खाते हो/ तो अघाते क्यों नहीं कभी/ कितना बड़ा पेट है आखिर तुम्हारा।’
क्या इन सवालों का आज की परिस्थितियों से कोई संबंध नहीं बनता? सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा सनातन है। इससे भी बड़ी बात यह है कि सवाल पूछने वाला भयभीत नहीं होता, चाहे सामने कितना ही भयंकर राजराक्षस क्यों न हो। सत्ता की ताकत से आतंकित हुए बिना उससे जवाब माँगना ही प्रतिरोध की पहली शर्त है।
यह वही कवि है, जो सरकार के दर्प को भलीभाँति समझता है। वह लिखता है, ‘अब सरकार तो सरकार है/ इतना तो समझती ही है/ उसे क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए/ जैसे कि जनता से मदद लेना/ भला जनता का भी कोई भरोसा है?’
जनता पर भरोसा करना जब सत्ताधारी पार्टी के लिए मुमकिन नहीं, तो सरकार से इसकी उम्मीद कैसे की जाए? सल्तनत के पास संवेदना धेले भर नहीं होती, मगर सैनिक थैला भर-भरकर होते हैं। इसलिए उसके लिए सबसे आसान रास्ता यही है कि सैनिकों को जनता की हर पीठ और गर्दन पर सवार कर दिया जाए। ऐसे दृश्यों की बारंबारता ही कविता की आवाज को लगातार प्रतिध्वनित करती है।
कविता और सत्ता के इस टकराव की याद आते ही धर्मवीर भारती की ‘मुनादी’ की पंक्तियाँ भी स्मृति में कौंधती हैं—
‘ख़ल्क ख़ुदा का, मुलुक बाश्शा का हुकुम शहर कोतवाल का... हर खासो-आम को आगह किया जाता है कि खबरदार रहें और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से कुंडी चढ़ाकर बन्द कर लें गिरा लें खिड़कियों के परदे और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें क्योंकि एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!’
भारती की कविता में एक बूढ़े आदमी का सड़कों पर सच बोलने निकल पड़ना ही सत्ता के लिए खतरे की घंटी बन जाता है। आज भले ही कोई बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी सड़कों पर न निकला हो, लेकिन एक पचासी बरस के बुजुर्ग कवि की पंक्तियाँ दस्तक दे रही हैं। वह कवि हैं विजय बहादुर सिंह, एक ऐसे समाजचेता कवि, जिनकी कविता जनता को उसकी अपनी ताकत का एहसास कराती है और सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछने का साहस देती है।
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