कविता याचना नहीं, दावा करती है

उमेश पंकज की कविता अपने समय की नफरत, हिंसा, दमन और सामाजिक विषमता से मुठभेड़ करती है। मृत्युंजय श्रीवास्तव का यह आलोचनात्मक आलेख कविता में प्रतिरोध की चेतना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वंचितों के पक्ष में खड़े होने के साहस को रेखांकित करता है। पढ़ें...

Nov 5, 2026 - 20:17
Nov 5, 2026 - 21:21
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कविता याचना नहीं, दावा करती है
कवि उमेश पंकज

 

 

उमेश पंकज की कविता में प्रतिरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भविष्य के निर्माण का संघर्ष

कविता अपने समय से टकराती है। इस टकराहट से आग पैदा होती है, जो वर्तमान को आलोकित करने के साथ भविष्य के अंधेरे में भी मशाल बन जाती है। जब कविता कहती है—

‘हमारे हिस्से का सूरज छिपा लेते हो और गहराता हुआ अंधेरा हमें चारों ओर से छाप लेता है।’

तो वह अंधेरे की पहचान भर नहीं कराती, उसके स्रोतों को भी उजागर करती है। एक दूसरी कविता में समय का भयावह दृश्य देखिए—

‘चारों तरफ बिछे हैं/ नफरतों के कांच /ज्वालामुखी फटते हैं अक्सर आग का दरिया है/ वहां जो बहता रहता है निरंतर।’

नफरत, हिंसा और बर्बरता से घिरे इस समय में कविता की भूमिका केवल यथार्थ का बयान करना नहीं, उसके विरुद्ध प्रतिरोध की जमीन तैयार करना भी है।

उत्पीड़न की डफली और उत्सवधर्मिता का अंतर्विरोध

अपने समय की क्रूरताओं से टकराती हुई एक कविता की पंक्तियां हैं—

‘छीलकर चमड़ी हमारे पीठ की/ डफली बना लो /बजाओ नाचो गाओ। ... सुनो हमारे मुंह पर /ताले लगा दो/ चीख निकले भी तो कोई सुन न सके /बाजा बजा दो उत्सव मना लो।’

यहां व्यवस्था-प्रदत्त उत्पीड़न और उत्सवधर्मिता का भयावह अंतर्विरोध सामने आता है। नागरिकों की पीठ की चमड़ी से डफली बनाई जाती है, उनकी चीखों पर ताले जड़े जाते हैं और उनके लहूलुहान वजूद पर उत्सव मनाया जाता है। कविता सवाल करती है—ऐसी व्यवस्था को आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाए? क्या उसके सामने हमारी चुप्पी भी उसके अपराध में साझेदारी नहीं है?

जब रोजमर्रा का जीवन भी हिंसा की गिरफ्त में हो

समय की भयावहता एक दूसरी कविता में रोजमर्रा के जीवन की असुरक्षा बनकर सामने आती है—

‘आलू, प्याज और टमाटर खरीदते समय कोई गोली दनदनाते हुए आपके सीने को चीरकर निकल जाएगी।’

हिंसा अब जीवन की सामान्य गतिविधियों तक में दाखिल हो चुकी है। लेकिन कविता भय का चित्र खींचकर नहीं रुकती।

वह पाठक को प्रतिरोध के लिए ललकारती है—

‘आंखों में पानी यदि बचा हुआ है /धधकती आग न सही /बचा हुआ है धुआं/ सूत पर चलने का साहस है/ मुंह दबाए अंधेरा चीरकर यदि दौड़ लगा सकते हो/... हत्यारे तुमसे डरे हुए हैं और तुम्हारी तलाश कर रहे हैं।’

आंखों का पानी संवेदना का और बुझती आग का धुआं प्रतिरोध की बची हुई संभावना का प्रतीक है। सूत पर चलने का साहस जोखिम उठाने की तैयारी का संकेत देता है। कविता का विश्वास है कि दमन के सामने समर्पण ही एकमात्र विकल्प नहीं। प्रतिरोध की चेतना दमनकारी ताकतों को भी विचलित करती है। इस तरह कविता भयावह समय का दस्तावेज बनने के साथ उसके विरुद्ध खड़े होने का साहस भी देती है।

खामोशी के विरुद्ध बोलने के अधिकार का ऐलान

खामोशी तोड़ने की पुकार लगाती कविता दमनकारी व्यवस्था को सीधे चुनौती देती है। वह सुनने की विवशता को नकारते हुए बोलने के अधिकार का ऐलान करती है—

‘सुनने के लिए सिर्फ नहीं जन्मा हूं बोलूंगा भी/... आप होते कौन हैं यह तय करने वाले कि मेरे लिए कोई मंच नहीं होगा।’

यह महज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग नहीं, बल्कि उस सत्ता के वर्चस्व को चुनौती है, जो तय करना चाहती है कि कौन बोलेगा, किसे सुना जाएगा और किसकी आवाज दबा दी जाएगी। कविता मंच मांगती नहीं, बोलने के अपने अधिकार का दावा करती है। वह सत्ता से अपनी आवाज के लिए जगह देने की याचना नहीं करती, बल्कि उस अधिकार को नकारने वाली सत्ता से ही सवाल करती है।

वंचितों का आत्मीय पक्षकार और भविष्य के द्वार पर प्रहार

वर्तमान के गहराते संकट, दमन और विषमता के बीच उमेश पंकज वंचितों और उपेक्षितों के आत्मीय पक्षकार के रूप में खड़े हैं। उनका कवि-कर्म यथार्थ की करुण कथा सुनाने तक सीमित नहीं; वह उसकी जड़ताओं पर प्रहार करता है और भविष्य के बंद द्वार खोलने का आह्वान करता है। कवि अपनी भूमिका को इन शब्दों में व्यक्त करता है—

‘वर्तमान के गहराए संकट में डूबा हुआ वंचितों उपेक्षितों का आत्मीय पक्षकार संवेदनशील कवि! काले घोड़े पर बैठकर निराला के गुरु हथौड़े से कर रहा प्रहार बार-बार भविष्य के द्वार।’

काले घोड़े पर सवार कवि और निराला के गुरु हथौड़े का बिंब संघर्ष की गति और परिवर्तन की आकांक्षा को मूर्त करता है। हथौड़ा उस प्रतिरोधी काव्य-परंपरा की याद दिलाता है, जो अन्याय और जड़ता को नियति मानकर स्वीकार नहीं करती। भविष्य के द्वार पर बार-बार प्रहार करना उस व्यवस्था को चुनौती देना है, जो वंचितों के लिए संभावनाओं के रास्ते बंद करती है।

कविता का दावा : चुप्पी नहीं, संघर्ष है विकल्प

उमेश पंकज की कविता में प्रतिरोध केवल अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना नहीं, बल्कि उस यथास्थिति को तोड़ने का संकल्प है, जो अन्याय को नियति और चुप्पी को नागरिक का धर्म बनाना चाहती है। कविता का दावा इसी संकल्प में निहित है— बोलने का अधिकार किसी सत्ता की कृपा नहीं और भविष्य किसी व्यवस्था की बपौती नहीं।

 

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