हिंदी कविता में नई परंपरा की शुरुआत है ‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’

डॉ. सुनील कुमार शर्मा के काव्य-संग्रह ‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’ पर कोलकाता में पुस्तक परिचर्चा आयोजित। भारतीय भाषा परिषद एवं परिवेश के संयुक्त आयोजन में साहित्यकारों ने तकनीक, एआई, मनुष्यता और समकालीन हिंदी कविता पर विचार व्यक्त किए।

Nov 2, 2026 - 14:11
 0
हिंदी कविता में नई परंपरा की शुरुआत है ‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’
अपनी कविताओं का पाठ करते कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा

भारतीय भाषा परिषद एवं परिवेश के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. सुनील कुमार शर्मा के नवीन काव्य-संग्रह पर पुस्तक परिचर्चा आयोजित

कोलकाता, 1 नवंबर। हिंदी कविता में तकनीक, मनुष्यता और संवेदना के बदलते अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाले डॉ. सुनील कुमार शर्मा के नवीन काव्य-संग्रह ‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’ पर कोलकाता में पुस्तक परिचर्चा आयोजित की गई। सुप्रसिद्ध साहित्यिक संस्था भारतीय भाषा परिषद एवं परिवेश के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकारों और वक्ताओं ने संग्रह की कविताओं के विभिन्न पक्षों पर विचार व्यक्त किए। परिचर्चा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच मनुष्य की संवेदना, स्मृति और आत्मीयता को बचाए रखना आज की कविता के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

कार्यक्रम का आरंभ कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा द्वारा अपने नवीन काव्य-संग्रह से कविताओं के पाठ के साथ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए सुषमा कुमारी ने उपस्थित साहित्यकारों एवं अतिथियों का स्वागत किया और संग्रह के प्रकाशन के लिए कवि को बधाई दी।

परिचर्चा में डॉ. मधु सिंह ने कहा कि यह पुस्तक सिलिकॉन के समय में मनुष्यता की तलाश करती है। तकनीक से निर्मित होती दुनिया के बीच यह काव्य-संग्रह मनुष्य होने के अर्थ और उसकी संवेदनात्मक पहचान को रेखांकित करता है। डॉ. संजय राय ने कवि की रचनात्मक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सुनील कुमार शर्मा की कविताएँ ‘रिदम से एल्गोरिदम’ तक की यात्रा करती हैं। यह यात्रा समकालीन जीवन में तकनीक के बढ़ते हस्तक्षेप और उसके बीच मनुष्य की रचनात्मक चेतना को समझने का अवसर देती है।

डॉ. कमल कुमार ने संग्रह को मनुष्यता के अस्तित्व का जीवंत दस्तावेज़ बताया। उन्होंने कहा कि यह कृति तकनीक का विरोध नहीं करती, बल्कि मशीनों के बढ़ते प्रभाव के बीच मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं, स्मृतियों और आत्मीयता को बचाए रखने का आह्वान करती है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं ग़ज़लकार मुरलीधर शर्मा ‘तालिब’ ने कहा कि यह कविता-संग्रह हिंदी कविता में एक नई लीक का निर्माण करता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में अन्य कवि भी इस परंपरा का अनुसरण करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने अपने वक्तव्य में कहा कि एआई के पास नकार की शक्ति नहीं होती। यही मनुष्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच एक बुनियादी अंतर है। उन्होंने कहा कि यह संग्रह तकनीक और उससे प्रभावित होती मानवीय संवेदना को प्रभावशाली ढंग से दर्ज करता है। ऐसी रचनात्मक कृति का स्वागत किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन करते हुए डॉ. आदित्य विक्रम सिंह ने काव्य-संग्रह को हिंदी कविता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। अंत में आकांक्षा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। परिचर्चा ने इस प्रश्न को भी रेखांकित किया कि तकनीक के निरंतर विस्तार के दौर में साहित्य मनुष्य की संवेदना और मानवीय मूल्यों को किस तरह जीवित रख सकता है।

 

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I