पाँच दिन अवैध हिरासत में रखने पर यूपी पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार, चंदन राजभर को मिलेगा 1.25 लाख रुपये मुआवजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया में चंदन राजभर को पाँच दिन अवैध हिरासत में रखने पर यूपी सरकार को 1.25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। विवेचक के आचरण को सत्ता का अहंकार बताते हुए दोषी पुलिसकर्मियों से वसूली और कठोर विभागीय कार्रवाई की बात कही।
विवेचक के आचरण को बताया ‘सत्ता का अहंकार’, दोषी पुलिसकर्मियों से मुआवजे की रकम वसूलने की छूट; विभागीय जाँच में कठोरतम दंड पर विचार करने का निर्देश
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है। देवरिया जिले के सलेमपुर थाने में चंदन राजभर को पाँच दिनों तक बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए हिरासत में रखने के मामले में अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को पीड़ित को 1.25 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने संबंधित विवेचक के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे ‘सत्ता का अहंकार’ करार दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि विभागीय जाँच में दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों से मुआवजे की राशि वसूल की जा सकती है। यह आदेश 29 अक्तूबर 2026 को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Writ Petition No. 1449 of 2026) पर सुनवाई करते हुए दिया। यह याचिका चंदन राजभर की मां ज्ञानती देवी और दो अन्य की ओर से दाखिल की गई थी। मामले में राज्य सरकार की ओर से पुलिस की आंतरिक जाँच रिपोर्ट अदालत के सामने रखी गई, जिसमें पाँच दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने की बात स्वीकार की गई थी।
बिहार में शादी के बाद पुणे में रह रहा था दंपती
मामले के अनुसार, चंदन राजभर पर आरोप था कि वह एक युवती को अपने साथ लेकर चला गया था। इस संबंध में युवती की मां की शिकायत पर 18 जुलाई 2026 को देवरिया जिले के सलेमपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
याचिका में बताया गया कि चंदन राजभर और युवती ने बिहार के सिवान जिले में एक दुर्गा मंदिर में विवाह कर लिया था। इसके बाद दोनों पुणे में पति-पत्नी के रूप में रहने लगे। आरोप है कि 24 और 25 अगस्त की मध्यरात्रि के दौरान सलेमपुर पुलिस की एक टीम युवती के पिता के साथ पुणे स्थित उनके आवास पर पहुँची और दोनों को अपने साथ ले गई। पुलिस उन्हें 27 और 28 अगस्त की मध्यरात्रि के दौरान देवरिया लेकर पहुँची। चंदन राजभर का आरोप था कि पुलिस ने उसे 28 अगस्त से 2 सितंबर तक थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा। इस दौरान उसकी गिरफ्तारी की कोई विधिवत प्रविष्टि नहीं की गई। बाद में 2 सितंबर को उसकी गिरफ्तारी दर्शाई गई और उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया।
पुलिस की आंतरिक जाँच में सामने आई अवैध हिरासत
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 9 अक्तूबर 2026 को सलेमपुर थाने की 27 अगस्त शाम 6 बजे से 2 सितंबर रात 10 बजे तक की सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, अगली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि देवरिया के पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर के हलफनामे और पुलिस की आंतरिक जाँच रिपोर्ट में ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो चुकी है। क्षेत्राधिकारी राजेश चतुर्वेदी ने 21 अक्तूबर 2026 को अपनी जाँच रिपोर्ट में स्वीकार किया कि विवेचक दीप नारायण यादव ने चंदन राजभर को 28 अगस्त से 2 सितंबर तक अवैध रूप से हिरासत में रखा था। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2 सितंबर को उसकी गिरफ्तारी दर्शाई गई, जबकि उसे इससे पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था। जाँच में विवेचक के आचरण को कर्तव्य के प्रति गंभीर लापरवाही और जिम्मेदारियों के उल्लंघन का मामला माना गया। इस रिपोर्ट के आधार पर देवरिया के पुलिस अधीक्षक ने 21 अक्तूबर को संबंधित विवेचक के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया।
‘सत्ता का अहंकार’ बताकर अदालत ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने विवेचक के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को पाँच दिनों तक बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए हिरासत में रखना सत्ता के अहंकार को प्रदर्शित करता है। अदालत के अनुसार, संबंधित अधिकारी ने मानो इसे सामान्य प्रशासनिक कार्यवाही समझ लिया था।
खंडपीठ ने कहा कि यदि विभागीय जाँच में विवेचक दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कठोरतम दंड देने पर विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने क्षेत्राधिकारी राजेश चतुर्वेदी और पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर की सराहना भी की। अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने मामले की वास्तविकता को छिपाने के बजाय पूरी ईमानदारी से सामने रखा और आवश्यक विभागीय कार्रवाई शुरू की।
पाँच दिनों की अवैध हिरासत के लिए 1.25 लाख रुपये मुआवजा
मुआवजे के प्रश्न पर अदालत ने पाँच दिनों की अवैध हिरासत के लिए प्रतिदिन 25 हजार रुपये की दर से कुल 1 लाख 25 हजार रुपये देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा चंदन राजभर को अवैध हिरासत में रखने के कारण हुए नुकसान के लिए है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा मिलने से पीड़ित का पुलिस विभाग के विरुद्ध क्षतिपूर्ति के लिए अलग से दीवानी दावा दाखिल करने का अधिकार समाप्त नहीं होगा। विभागीय जाँच के बाद जिन पुलिसकर्मियों को अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार पाया जाएगा, उनसे मुआवजे की राशि वसूलने का अधिकार राज्य सरकार को होगा। अदालत ने चंदन राजभर को तत्काल रिहा करने का भी निर्देश दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक न हो।
पुलिस की जवाबदेही और मौलिक अधिकारों पर फिर बहस
यह फैसला केवल एक व्यक्ति को मुआवजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस की शक्तियों और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन को भी रेखांकित करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
कानून के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना और उसे निर्धारित समय-सीमा में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना आवश्यक है। किसी व्यक्ति को बिना विधिक प्रक्रिया के थाने में बंद रखना इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों के उद्देश्य के विपरीत है। इस मामले में विशेष बात यह रही कि अवैध हिरासत का तथ्य केवल याचिकाकर्ता के आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस की अपनी जाँच रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया। अदालत ने इसी आधार पर मुआवजे और विभागीय जवाबदेही के संबंध में निर्देश दिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में की गई टिप्पणियों का चंदन राजभर के विरुद्ध लंबित आपराधिक मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। निचली अदालत मामले का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करेगी और आरोपी को कानून के तहत निर्दोष माने जाने की धारणा का लाभ प्राप्त रहेगा।
इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि पुलिस को कानून लागू करने की शक्ति अवश्य प्राप्त है, लेकिन वह शक्ति कानून से ऊपर नहीं है। किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन करने पर पुलिस अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जा सकता है।
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