'सम्मान देने के लिए नहीं, गलती पर बुलाया जाता है'— DM को लेकर जस्टिस अजीत कुमार की कथित टिप्पणी चर्चा में
इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अजय भनोट की अदालत में वकीलों के हंगामे के बाद CCTV जाँच के आदेश दिए गए। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने न्यायिक कार्यवाही बाधित करने पर सख्त रुख अपनाया। वहीं DM रविन्द्र कुमार मंदार को लेकर जस्टिस अजीत कुमार की कथित टिप्पणी भी चर्चा में है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अफसरशाही के VVIP व्यवहार पर जस्टिस अजीत कुमार की सख्त टिप्पणी, AAG को भी लगाई फटकार
30 अक्तूबर 2026 | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | गाजियाबाद के जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार मंदार को किसी न्यायिक मामले में अदालत के समक्ष उपस्थित होना पड़ा। इस दौरान एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) महेश चंद्र चतुर्वेदी ने जिलाधिकारी को बैठने के लिए कुर्सी देने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि इस पर न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सरकारी पक्ष के अधिवक्ता को रोकते हुए कहा: "इन्हें गलती पर समन करके बुलाया जाता है, सम्मान देने के लिए नहीं बुलाया जाता AAG साहब।" साथ ही कथित तौर पर उन्होंने कहा कि जो भी चर्चा करनी है, वह कॉरिडोर में जाकर करें। अदालत के भीतर किसी अधिकारी को विशेष या VVIP व्यवहार देने की आवश्यकता नहीं है। इससे यह संदेश स्पष्ट है कि न्यायालय में किसी प्रशासनिक अधिकारी का पद उसे सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से ऊपर नहीं रखता। अदालत में जिलाधिकारी और आम नागरिक, दोनों को न्यायिक अनुशासन के अधीन रहना होता है।
जस्टिस अजय भनोट की अदालत में हंगामा: क्या हुआ था?
इलाहाबाद हाईकोर्ट में 27 अक्तूबर 2026 को शुरू हुआ विवाद अगले दिन गंभीर रूप ले गया। विवाद की शुरुआत कोर्ट रूम नंबर 49 में बैठने की व्यवस्था को लेकर हुई। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के आरोप के मुताबिक, एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस अधीक्षक (SP) के वकीलों के लिए निर्धारित पंक्ति में बैठने पर एक अधिवक्ता ने आपत्ति जताई थी। बार एसोसिएशन का आरोप था कि इस घटना के बाद न्यायमूर्ति अजय भनोट ने संबंधित अधिवक्ता को कड़ी फटकार लगाई, जेल भेजने की बात कही और पुलिस अधिकारी से माफी माँगने को कहा। वरिष्ठ अधिवक्ता के साथ कथित व्यवहार को लेकर भी बार एसोसिएशन ने आपत्ति जताई। 28 अक्तूबर को विरोध ने हिंसक रूप ले लिया। वकीलों ने जस्टिस अजय भनोट की अदालत में नारेबाजी की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट रूम में कुर्सियां, मेज और अन्य सामान फेंके गए तथा तोड़फोड़ हुई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका और अधिवक्ता समुदाय के बीच संबंधों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल का CCTV पर सख्त रुख
इस पूरे घटनाक्रम में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 28 अक्तूबर को उनके समक्ष एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अजय भनोट की अदालत के बाहर हो रही नारेबाजी और हंगामे का मामला सामने आया। न्यायमूर्ति देशवाल ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को कोर्ट नंबर 66 के बाहर लगे CCTV कैमरों की फुटेज प्राप्त करके घटना में शामिल अधिवक्ताओं की पहचान करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि किसी विशेष अदालत या न्यायाधीश से नाराजगी होने का अर्थ यह नहीं है कि अधिवक्ता दूसरी अदालतों की कार्यवाही बाधित करें, नारेबाजी करें या न्यायालय को डराने का प्रयास करें। अदालत ने इस आचरण को अवमाननापूर्ण बताते हुए संबंधित लोगों के विरूद्ध अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना भी दर्ज की। पहचान संबंधी रिपोर्ट के लिए 19 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की गई।
29 और 30 अक्तूबर को क्या हुआ?
29 अक्तूबर को विरोध-प्रदर्शन जारी रहने की खबरें सामने आईं। Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लोगों ने अदालत के प्रवेश द्वार पर बाहर से ताला लगा दिया, जिससे अन्य अधिवक्ताओं को न्यायमूर्ति देशवाल की अदालत में प्रवेश करने में परेशानी हुई। न्यायमूर्ति देशवाल ने कहा कि हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिकांश अधिवक्ता गंभीर और अनुशासित हैं, लेकिन कुछ लोगों द्वारा बिना बार एसोसिएशन के आधिकारिक आह्वान के दूसरे अधिवक्ताओं को अदालत में प्रवेश से रोकना चिंताजनक है। उन्होंने बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से मामले को देखने और अदालतों की गरिमा बनाए रखने का अनुरोध किया। 30 अक्तूबर को प्रकाशित The Indian Express की रिपोर्ट भी बताती है कि 29 अक्तूबर को कुछ लोगों द्वारा अधिवक्ताओं को अदालत में प्रवेश से रोकने का मामला न्यायमूर्ति देशवाल के संज्ञान में आया था।
पूरे घटनाक्रम से उठते महत्वपूर्ण सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट में सामने आए इन घटनाक्रमों को केवल न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के बीच विवाद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनके भीतर न्यायिक संस्थाओं की गरिमा, प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और अदालतों में समान व्यवहार के सिद्धांत जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं।
इस घटनाक्रम से कुछ प्रमुख सवाल सामने आते हैं:
1. क्या किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को अदालत में सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग व्यवहार दिया जाना चाहिए?
2. क्या सरकारी अधिकारियों को न्यायालय में विशेष सुविधाएं या VVIP व्यवहार मिलना उचित है?
न्यायपालिका की गरिमा और अधिवक्ताओं के सम्मान को एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ा नहीं किया जा सकता। न्यायाधीशों को भी न्यायिक मर्यादा का पालन करना होता है और अधिवक्ताओं को भी अदालत की गरिमा बनाए रखनी होती है। इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों को भी न्यायालय के समक्ष अपनी जवाबदेही समझनी चाहिए।
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