गौर बंगा विश्वविद्यालय में प्रो. नंदिनी साहू का व्याख्यान

गौर बंगा विश्वविद्यालय, मालदा में आयोजित विशेष व्याख्यान में हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति एवं इग्नू की अंग्रेजी की प्रोफेसर प्रो. नंदिनी साहू ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के पारंपरिक मौखिक स्वरूप से डिजिटल युग तक के विकास पर विस्तार से विचार रखा। ‘श्रुति से डिजिटैलिटी तक: भारतीय ज्ञान प्रणाली की पुनर्कल्पना, स्मृति की वाणी से एल्गोरिदम के अभिलेखागार तक’ विषय पर उन्होंने कहा कि तकनीक भारतीय ज्ञान-परंपरा के विकास की बाहरी अवस्था मात्र नहीं, बल्कि ज्ञान के संचरण की निरंतर बदलती प्रक्रिया का हिस्सा रही है।

Sep 29, 2026 - 22:33
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गौर बंगा विश्वविद्यालय में प्रो. नंदिनी साहू का व्याख्यान
गौर बंगा विश्वविद्यालय में प्रो. नंदिनी साहू का व्याख्यान

मालदा। गौर बंगा विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान प्रणाली, डिजिटल मानविकी और ज्ञान के बदलते स्वरूप पर केंद्रित एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति एवं इग्नू में अंग्रेजी की प्रोफेसर प्रो. नंदिनी साहू ने ‘श्रुति से डिजिटैलिटी तक: भारतीय ज्ञान प्रणाली की पुनर्कल्पना, स्मृति की वाणी से एल्गोरिदम के अभिलेखागार तक’ विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता गौर बंगा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आशीष भट्टाचार्य ने की। कार्यक्रम का संयोजन विश्वविद्यालय के IQAC के निदेशक प्रो. जितेंद्र साहू ने किया।

तकनीक को ज्ञान-परंपरा के अंतिम पड़ाव के रूप में देखने पर सवाल

अपने व्याख्यान में प्रो. नंदिनी साहू ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को केवल परंपरा से आधुनिकता और फिर तकनीक तक पहुंचने वाली एक रैखिक यात्रा के रूप में देखने की धारणा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-व्यवस्था में ज्ञान के निर्माण और संचरण की प्रक्रिया हमेशा विभिन्न माध्यमों के साथ विकसित होती रही है। उन्होंने वाणी और स्मृति से लेकर पांडुलिपि, मुद्रण, मीडिया, डेटाबेस और अब एल्गोरिदम तक ज्ञान के संचरण के बदलते माध्यमों को एक व्यापक ऐतिहासिक सातत्य के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. साहू के अनुसार, महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली डिजिटल माध्यम में जीवित रह सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि जब ज्ञान के संचरण का माध्यम बदलता है, तब स्वयं ज्ञान के स्वरूप, अर्थ और प्रामाणिकता में क्या परिवर्तन आता है।

श्रुति से डिजिटल डेटा तक ज्ञानमीमांसा का प्रश्न

व्याख्यान में प्रो. साहू ने विशेष रूप से ‘श्रुति’ जैसे मौखिक ज्ञान को डिजिटल डेटा में परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया से उत्पन्न ज्ञानमीमांसीय प्रश्नों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात की पड़ताल की कि मौखिक परंपरा को लिखित रूप देने और फिर उसे डिजिटल स्वरूप में संग्रहित करने के दौरान उसके अर्थ, संदर्भ और जीवंतता पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने ज्ञान, लोककथा और परंपरा के बीच मौजूद अंतर्संबंधों और सीमाओं को भी रेखांकित किया। उनके विचार में लेखन और अभिलेखीकरण को केवल संरक्षण की प्रक्रिया मानना पर्याप्त नहीं है; यह प्रक्रिया मौखिक ज्ञान को नए संदर्भ और संरचना में रूपांतरित भी कर सकती है।

ज्ञान के अधिकार में जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा की भूमिका

प्रो. साहू ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने के लिए सामाजिक संदर्भों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा जैसे कारकों की भूमिका पर विचार करते हुए यह प्रश्न उठाया कि किसी समाज में कौन ज्ञान का संचार कर सकता है, किसके ज्ञान को मान्यता मिलती है और किसे ज्ञान के प्राधिकरण का अधिकार प्राप्त होता है। इस संदर्भ में डिजिटल माध्यमों के विस्तार को उन्होंने केवल तकनीकी परिवर्तन के रूप में देखने के बजाय ज्ञान के लोकतंत्रीकरण और प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों के साथ जोड़कर देखने की आवश्यकता पर बल दिया।

डिजिटल अभिलेखागार: संरक्षण के साथ जीवंतता भी जरूरी

प्रो. नंदिनी साहू ने डिजिटल अभिलेखागार के निर्माण से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान की जीवंत परंपराओं को केवल डिजिटल संग्रहों में स्थिर वस्तुओं की तरह संरक्षित करने से उनके जीवंत सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ कमजोर पड़ सकते हैं। उनके अनुसार, डिजिटल अभिलेखागार का उद्देश्य केवल अतीत को सुरक्षित रखना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन परंपराओं की जीवंतता, बहुलता और निरंतर परिवर्तनशीलता को भी समझना और संरक्षित करना होना चाहिए।

श्रुति, स्मृति से डिजिटैलिटी तक एक व्यापक सातत्य

व्याख्यान के अंत में प्रो. साहू ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने के लिए एक व्यापक सातत्य की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें श्रुति, स्मृति, जीवंत व्यवहार, पाठ्यपरकता और डिजिटैलिटी को ज्ञान के परस्पर जुड़े हुए रूपों के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस दृष्टिकोण से भारतीय ज्ञान प्रणाली के अध्ययन को डिजिटल मानविकी और समकालीन विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों से जोड़ने की नई संभावनाएं सामने आती हैं। इससे भारतीय ज्ञान परंपराओं को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय वर्तमान और भविष्य के ज्ञान-विमर्श से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। गौर बंगा विश्वविद्यालय में आयोजित यह व्याख्यान भारतीय ज्ञान प्रणाली के पारंपरिक स्रोतों, आधुनिक अकादमिक विमर्श और डिजिटल तकनीक के बीच संबंधों पर गंभीर चिंतन का अवसर बना। कार्यक्रम ने इस प्रश्न को भी केंद्र में रखा कि डिजिटल युग में भारतीय ज्ञान को संरक्षित करने के साथ-साथ उसकी बहुलता, संदर्भ और जीवंत परंपरा को किस प्रकार बनाए रखा जा सकता है।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I