भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 साल: गौहर जान की स्मृति में ‘तवायफनामा’

कोलकाता में भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 वर्ष पूरे होने की यात्रा के अवसर पर गौहर जान की स्मृति में ‘तवायफनामा’ डांस ड्रामा प्रस्तुत किया गया। 33 भूली-बिसरी गायिकाओं के जीवन, संघर्ष, संगीत और राष्ट्र निर्माण में योगदान को नृत्य एवं कविता के माध्यम से मंच पर जीवंत किया गया।

Oct 2, 2026 - 22:32
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भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 साल: गौहर जान की स्मृति में ‘तवायफनामा’
‘स्त्री लेखा’ के नए अंक और स्मारिका का विमोचन

भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 साल: गौहर जान की स्मृति में ‘तवायफनामा’ ने जीवंत की भूली-बिसरी गायिकाओं की गाथा

कोलकाता, 1 अक्तूबर। भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 वर्ष पूरे होने की यात्रा की शुरुआत कोलकाता से हुई थी। इसी ऐतिहासिक संगीत विरासत और देश की पहली ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कलाकार गौहर जान की स्मृति को समर्पित एक अनोखी नृत्य-नाटिका ‘तवायफनामा’ का मंचन सत्यजीत राय सभागार में किया गया।

‘सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन’, कोलकाता और गुरुग्राम की संस्था ‘द परफॉर्मिंग आर्ट ट्राइब’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में संगीत और नृत्य के माध्यम से उन भूली-बिसरी गायिकाओं के जीवन, संघर्ष और सांस्कृतिक योगदान को सामने लाया गया, जिन्होंने भारतीय संगीत परंपरा को समृद्ध करने के साथ-साथ स्त्री सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

11 नवंबर 1902 को कोलकाता में हुई थी पहली रिकॉर्डिंग

आयोजकों के अनुसार भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग की शुरुआत 11 नवंबर 1902 को कोलकाता में गौहर जान की आवाज के रिकॉर्ड होने के साथ हुई थी। इस ऐतिहासिक घटना के 125वें वर्ष की शुरुआत के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने कोलकाता की उस सांस्कृतिक भूमिका को भी रेखांकित किया, जब यह शहर हिंदुस्तानी संगीत, साहित्य और कला का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

इस अवसर पर ‘भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 साल’ विषय पर एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।

33 भूली-बिसरी गायिकाओं की कहानी पर आधारित है ‘तवायफनामा’

दिल्ली के रज़ा फाउंडेशन, भारतीय विद्या भवन, कोलकाता तथा ‘स्त्री दर्पण’ के सहयोग से हिंदी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार अरविंद कुमार उर्फ विमल कुमार की कविताओं की पुस्तक ‘तवायफनामा’ पर आधारित यह नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की गई। ‘तवायफनामा’ में 33 ऐसी गायिकाओं के जीवन और संघर्ष को कविताओं के माध्यम से दर्ज किया गया है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। नृत्य-नाटिका में गौहर जान, जद्दन बाई, बेगम अख्तर, रसूलन बाई, विद्याधरी, असगरी बाई सहित अनेक गायिकाओं के जीवन और योगदान को मंच पर अभिव्यक्त किया गया।

पुस्तक के लेखक अरविंद कुमार ने कहा कि इन गायिकाओं ने हिंदुस्तानी मौसिकी के इतिहास को गढ़ने और उसकी विरासत को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार, इन कलाकारों के जीवन में संघर्ष और पीड़ा के साथ-साथ कला, सामाजिक सरोकार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े योगदान के भी अनेक अध्याय हैं।

संगीत से राष्ट्र निर्माण तक का सफर

‘तवायफनामा’ के मंचन में केवल संगीत और नृत्य की परंपरा को ही नहीं, बल्कि इन गायिकाओं के सामाजिक और राष्ट्रीय योगदान को भी रेखांकित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि गौहर जान, जद्दन बाई और अख्तरी बाई जैसी कलाकारों ने अपने समय में स्त्री की सामाजिक भूमिका की पारंपरिक सीमाओं को चुनौती देते हुए कला के क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि कोलकाता, बनारस और लखनऊ जैसे शहरों ने भारतीय संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नई पीढ़ी को इस विरासत से परिचित कराना आज की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

सोमा बनर्जी के निर्देशन में 12 महिला कलाकारों ने दी प्रस्तुति

मशहूर अभिनेत्री मधुबाला की समकालीन अभिनेत्री वनमाला की शिष्या सोमा बनर्जी के निर्देशन में लगभग एक घंटे की इस नृत्य-नाटिका का मंचन किया गया। इसमें 12 महिला कलाकारों ने भाग लिया। सोमा बनर्जी ने कहा कि उनका उद्देश्य इतिहास में भुला दी गई इन नायिकाओं के राष्ट्र निर्माण और भारतीय संस्कृति के निर्माण में योगदान से नई पीढ़ी को परिचित कराना है। उन्होंने बताया कि इस प्रस्तुति के दिल्ली में दो और गुरुग्राम में एक शो पहले ही हो चुके हैं, जिन्हें दर्शकों की सराहना मिली। उन्होंने कहा कि नृत्य के माध्यम से इन गायिकाओं का इतिहास लिखने का प्रयास किया जा रहा है।

गौहर जान की भूमिका में गुंजन अजहर

नृत्य-नाटिका में मुख्य पात्र गौहर जान की भूमिका ‘द लिटिल थेस्पियन’ की प्रमुख उमा झुंझुनवाला की रंगकर्मी पुत्री गुंजन अजहर ने निभाई। कोलकाता की सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पारमिता मैत्रा की पुत्री और पंडित बिरजू महाराज की शिष्या निलोपा मोइत्रा ने अपने नृत्य से ‘तवायफनामा’ की प्रस्तुति का शुभारंभ किया। अन्य कलाकारों ने बेगम अख्तर, रसूलन बाई, जद्दन बाई, विद्याधरी और असगरी बाई सहित कई ऐतिहासिक गायिकाओं की भूमिकाएं निभाईं।

गौहर जान से जुड़ा था संगीत की कई पीढ़ियों का सफर

गौहर जान का जन्म आजमगढ़ में हुआ था। बाद में वे बनारस से होते हुए कोलकाता में आ बसीं और यहां के संगीत जगत में महत्वपूर्ण पहचान बनाई।

जद्दन बाई, जो आगे चलकर प्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां के रूप में भी जानी गईं, गौहर जान की संगत और संगीत की दुनिया से जुड़ने के लिए बनारस से कोलकाता आई थीं। इसी तरह बेगम अख्तर की मां मशरूती बाई भी अपनी बेटी को गौहर जान से संगीत की शिक्षा दिलाने के लिए कोलकाता आई थीं।

इस प्रकार गौहर जान का जीवन केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के कोलकाता की संगीत-सांस्कृतिक भूमिका का भी महत्वपूर्ण अध्याय है।

‘स्त्री लेखा’ के नए अंक और स्मारिका का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान ‘स्त्री लेखा’ पत्रिका के गौहर जान को समर्पित नए अंक का लोकार्पण भी किया गया। साथ ही भारत में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125 वर्ष पूरे होने के अवसर पर तैयार की गई विशेष स्मारिका का विमोचन हुआ।

कार्यक्रम में भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं प्रसिद्ध आलोचक शंभुनाथ, भारतीय रेलवे के महाप्रबंधक एवं चर्चित लेखक यतीश कुमार, आलोचक गीता दूबे और अल्पना नायक सहित साहित्य, संस्कृति और कला जगत से जुड़े लोगों ने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि भारतीय संगीत के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली अनेक महिला कलाकारों को इतिहास लेखन में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे हकदार थीं। ‘तवायफनामा’ की प्रस्तुति ने इसी विस्मृत सांस्कृतिक विरासत को नृत्य, संगीत और कविता के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया।

 

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I