कविता की पुकार: देशप्रेम, असहमति और प्रतिरोध का साहस

मृत्युंजय श्रीवास्तव का विचारोत्तेजक लेख: कवि राजकिशोर की कविता के माध्यम से देशप्रेम, लोकतंत्र, नागरिक असहमति और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के अर्थ की पड़ताल।

Oct 13, 2026 - 05:57
Oct 13, 2026 - 06:01
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कविता की पुकार: देशप्रेम, असहमति और प्रतिरोध का साहस
कवि राजकिशोर

एक कवि की कामना थी कि मेरा देश बुश के देश जैसा न हो, जिसके पास दूसरों को देने के लिए डर है या डॉलर। वह यह भी नहीं चाहता था कि उसका देश स्वर्गीय स्टालिन के देश जैसा हो, जहाँ सबसे खूंखार विरोधी अपने ही नागरिक दिखाई देते हैं। आज यदि कवि जीवित होता और 10 अक्तूबर 2026 को दिल्ली सल्तनत की करतूतें देखता, तो क्या कहता? शायद अपनी ही लिखी पंक्ति दोहराता—

“जब संघर्ष की जरूरत हो / कविता लिखना अपराध है।”

इस पंक्ति के आगे कवि ने जो कहा था, उसे आज समझ लें, तो देशप्रेम का अर्थ समझने में देर नहीं लगेगी। उसने लिखा था—

“इतना जरूर है कि यह अभी जैसा है / उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेना / देशद्रोह से कम नहीं जान पड़ता।”

हर जोखिम झेलते हुए नई पीढ़ी ने जिस तरह अपने ‘अस्वीकार’ को अभिव्यक्त किया, वह देशप्रेम का एक बेमिसाल नजारा था। यहाँ देशप्रेम सत्ता के प्रति समर्पण में नहीं, बल्कि उसके सामने असहमति दर्ज करने के साहस में प्रकट हुआ। कवि इन्हीं नौजवानों को अपनी दुनिया मानकर कहता है— “उम्मीद तो तुम्हीं से है।”

आज भारत का हर अदना-सा, टूटा-फूटा नागरिक उम्मीद से लबरेज इन देशप्रेमियों की ओर देख रहा है। इस उम्मीद के पीछे कवि का वह अनुभव भी है, जिसे वह लगातार अपनी कविता में दर्ज करता आया है—

“यह देश मेरा नहीं है / इसे तरह-तरह के गुंडों ने / आपस में बाँट रखा है।”

कवि अपने समय की विडंबना को और स्पष्ट करता है—

“अन्याय है अविचार है / हर आदमी लाचार है / जनतंत्र होना था जहां / बाजार ही बाजार है।”

आप ‘बाजार’ को ‘अत्याचार’ भी पढ़ सकते हैं। यह महज व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अपने मूल उद्देश्यों से भटक जाने की पहचान भी है। जब जनतंत्र में नागरिक की आवाज कमजोर पड़ने लगे और सार्वजनिक जीवन पर स्वार्थों का वर्चस्व बढ़ने लगे, तब लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लेकिन कवि नागरिक की लाचारी को अंतिम सच मानकर नहीं बैठ जाता। वह उसे चुप्पी तोड़ने और प्रतिरोध के लिए प्रेरित करता है। उसका आह्वान है—

“आओ थोड़ा कम सहें / जो दिल में हैं खुलकर कहें।”

यही वह आवाज है, जहाँ देशप्रेम सत्ता की भक्ति से मुक्त होकर नागरिक विवेक और प्रतिरोध का साहस बन जाता है। अन्याय को सहना नियति नहीं और न ही चुप्पी कोई नागरिक धर्म है। अन्याय का विरोध करना ही नागरिक विवेक की कसौटी है।

देश से प्रेम करना है, तो उसे सत्ता के हवाले नहीं, बल्कि सत्ता के एकाधिकार से मुक्त करना होगा। देश सत्ता से बड़ा है और नागरिक की असहमति देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

यही कवि राजकिशोर की कविता की पुकार है।

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