विद्यासागर विश्वविद्यालय ने 29.4 किलोमीटर की ऊँचाई तक भेजा GPS रेडियोसोंडे, मौसम अनुसंधान में बड़ी उपलब्धि

विद्यासागर विश्वविद्यालय ने NRSC-ISRO के सहयोग से GPS रेडियोसोंडे सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन से मौसम अनुसंधान, INSAT डेटा सत्यापन और तूफान पूर्वानुमान को मदद मिलेगी। यह Google परिणाम का अनुमानित प्रारूप है। वास्तविक शीर्षक और विवरण Google द्वारा बदले जा सकते हैं।

Oct 12, 2026 - 09:03
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विद्यासागर विश्वविद्यालय ने 29.4 किलोमीटर की ऊँचाई तक भेजा GPS रेडियोसोंडे, मौसम अनुसंधान में बड़ी उपलब्धि

NRSC-ISRO के सहयोग से सफल लॉन्च; सैटेलाइट डेटा के सत्यापन और भीषण तूफानों की भविष्यवाणी में मिलेगी मदद

मिदनापुर, 12 अक्तूबर 2026। पश्चिम बंगाल के विद्यासागर विश्वविद्यालय ने वायुमंडलीय अनुसंधान और उपग्रह डेटा के सत्यापन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय परिसर से 11 अक्तूबर 2026 को दोपहर 1:22 बजे GPS-युक्त उन्नत रेडियोसोंडे पेलोड सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के सहयोग से संपन्न हुआ। एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) से आवश्यक NOTAM जारी होने और कलाईकुंडा डिफेंस एविएशन से हवाई क्षेत्र की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद सभी निर्धारित सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए लॉन्च किया गया।

कुलपति और रजिस्ट्रार ने किया उद्घाटन

इस मिशन का उद्घाटन विद्यासागर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीपक कुमार कर और रजिस्ट्रार डॉ. जयंत किशोर नंदी ने किया। इस अवसर पर डॉ. काकोली कर भी उपस्थित थीं। कुलपति ने कहा कि NRSC-ISRO जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान के साथ यह संयुक्त पहल पर्यावरण और वायुमंडलीय विज्ञान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक अवलोकन मौसम संबंधी अनुसंधान, खराब मौसम की बेहतर भविष्यवाणी और उपग्रह डेटा के कैलिब्रेशन में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे प्राप्त वैज्ञानिक जानकारियां अंततः जनकल्याण में योगदान देंगी।

शोधार्थियों ने संभाली तकनीकी जिम्मेदारी

पूरे मिशन की योजना, समन्वय और निगरानी पर्यावरण अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. जतिशंकर बंद्योपाध्याय ने की। ग्राउंड स्टेशन के एकीकरण, सेंसर कैलिब्रेशन, रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) लिंक सिंक्रोनाइजेशन, प्री-फ्लाइट परीक्षण और बैलून लॉन्चिंग सहित तकनीकी कार्यों को विश्वविद्यालय के शोधार्थियों सौम्यकांती पांडा, अविक साहा, चिन्मय खारा, राली हंसदा, शंभूनाथ जाना और प्रतीक दे ने पूरा किया। मिशन के दौरान टीम ने वास्तविक समय में टेलीमेट्री डेटा प्राप्त किया। इससे उड़ान के दौरान वायुमंडलीय स्थितियों और पेलोड की स्थिति से संबंधित आंकड़े एकत्र किए गए।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षक एवं कर्मचारी भी उपस्थित थे। इनमें पर्यावरण अध्ययन विभाग के सहायक प्राध्यापक कार्तिक बेरा, रिमोट सेंसिंग एवं GIS विभाग के सहायक प्राध्यापक अमृत कमिलिया और अनिमेष माज़ी शामिल थे।

29.4 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचा पेलोड

मिशन में 200 ग्राम से कम वजन वाले हल्के सेंसर और टेलीमेट्री पैकेज का इस्तेमाल किया गया। इसे 800 ग्राम के लेटेक्स मौसम गुब्बारे की सहायता से वायुमंडल में भेजा गया। पेलोड ट्रोपोस्फीयर को पार करते हुए स्ट्रेटोस्फीयर तक पहुँचा और लगभग 29.4 किलोमीटर की अधिकतम ऊँचाई दर्ज की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पेलोड ने लगभग 44.09 किलोमीटर की क्षैतिज दूरी तय की और पैराशूट की सहायता से ईश्वरीपुर के निकट सुरक्षित रूप से उतरा।

वायुमंडल के कई महत्वपूर्ण मानकों का होगा अध्ययन

रेडियोसोंडे प्रणाली के माध्यम से वायुमंडलीय दबाव, तेज प्रतिक्रिया वाले थर्मिस्टर से हवा का तापमान, सेंसर की मदद से सापेक्ष आर्द्रता तथा GPS ट्रैकिंग के जरिए हवा की त्रि-आयामी गति और दिशा जैसे महत्वपूर्ण मानकों का मापन किया गया। इन आंकड़ों से विभिन्न ऊंचाइयों पर वायुमंडलीय परिस्थितियों को समझने में मदद मिलेगी। यह जानकारी मौसम प्रणालियों के व्यवहार और वायुमंडल की संरचना के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।

INSAT उपग्रहों के डेटा के सत्यापन में मिलेगी मदद

भविष्य में इस प्रकार के अवलोकनों से INSAT-3D और INSAT-3DR उपग्रहों के 19-चैनल साउंडर से प्राप्त डेटा के सत्यापन और कैलिब्रेशन में सहायता मिलने की संभावना है। इसके अतिरिक्त, दक्षिण बंगाल में आने वाले कालबैसाखी जैसे भीषण तूफानों की भविष्यवाणी के लिए वायुमंडलीय अस्थिरता और विंड शियर का विश्लेषण किया जा सकेगा। इन आंकड़ों का उपयोग WRF और GFS जैसे मौसम पूर्वानुमान मॉडलों के प्रदर्शन तथा पूर्वानुमान की सटीकता में सुधार के प्रयासों में भी किया जा सकता है।

सुरक्षित है रेडियोसोंडे प्रणाली

विश्वविद्यालय अधिकारियों ने पुष्टि की है कि रेडियोसोंडे प्रणाली सुरक्षित है और इसमें कोई खतरनाक रासायनिक पदार्थ या विस्फोटक सामग्री नहीं है। विद्यासागर विश्वविद्यालय की यह पहल क्षेत्रीय स्तर पर उच्च-वायुमंडलीय आंकड़ों के संग्रह, मौसम विज्ञान संबंधी अनुसंधान और उपग्रह अवलोकनों के सत्यापन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे पूर्वी भारत में मौसम संबंधी वैज्ञानिक अध्ययन को आगे बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I