चिनार की छाँव में साहित्य का संवाद

श्रीनगर चिंतन शिविर 2026 में हिंदी व्यंग्य, युवा रचनात्मकता, लोकभाषाओं और व्यंग्य आलोचना पर तीन दिवसीय साहित्यिक विमर्श हुआ। पढ़ें स्मिता सिन्हा की रिपोर्टिंग आलेख।

Oct 17, 2026 - 13:40
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चिनार की छाँव में साहित्य का संवाद
प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र देते वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय

श्रीनगर चिंतन शिविर में हिंदी व्यंग्य, लोकभाषाओं और युवा रचनात्मकता पर मंथन

रिपोर्ट: स्मिता सिन्हा 

कश्मीर: प्रकृति, स्मृतियों और संवेदनाओं का प्रदेश

कश्मीर को केवल पहाड़ों, झीलों, बर्फ और चिनार के बदलते रंगों में देखना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देना है। कश्मीर जितना एक सुंदर दृश्य है, उतना ही स्मृतियों, भाषाओं, अनुभवों और संवेदनाओं का प्रदेश भी है। यहाँ की हवा में इतिहास की कई परतें हैं, लोकजीवन की अनेक आवाजें हैं और प्रकृति के साथ गहरा जुड़ा हुआ एक सांस्कृतिक संसार है। 28 से 30 सितंबर 2026 तक श्रीनगर में आयोजित ‘श्रीनगर चिंतन शिविर’ ने इसी बहुआयामी कश्मीर से साहित्य के माध्यम से संवाद की एक अर्थपूर्ण पहल की। व्यंग्य यात्रा और जम्मू-कश्मीर हिंदी अकादेमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस तीन दिवसीय शिविर में देश के विभिन्न हिस्सों से लगभग चालीस साहित्यकारों, व्यंग्यकारों और रचनाकारों ने सहभागिता की।

इस आयोजन को केवल व्यंग्य पर केंद्रित एक साहित्यिक कार्यक्रम कहना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। तीन दिनों तक चले इस शिविर में व्यंग्य की वर्तमान स्थिति, उसकी रचनात्मक संभावनाओं, युवा व्यंग्य के बदलते स्वर, लोकभाषाओं में व्यंग्य की शक्ति, रचना पाठ और व्यंग्य आलोचना के वर्तमान स्वरूप जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर बातचीत हुई। पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। वरिष्ठ रचनाकारों का सम्मान किया गया। युवा रचनाकारों ने अपनी बात रखी। अलग-अलग भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए साहित्यकारों ने एक-दूसरे को सुना। इस पूरे आयोजन में साहित्य का एक बड़ा सवाल लगातार उपस्थित रहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है या वह अलग-अलग समाजों और संस्कृतियों के बीच पुल भी बन सकती है।

जम्मूतवी से शुरू हुआ भाषाओं और संस्कृतियों का आत्मीय संवाद

श्रीनगर पहुँचने से पहले ही इस साहित्यिक संवाद की शुरुआत जम्मूतवी रेलवे स्टेशन पर हो गई थी। देश के विभिन्न हिस्सों से जम्मू पहुँचे साहित्यकारों और प्रतिभागियों का आत्मीय स्वागत किया गया। व्यंग्य यात्रा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. लालित्य ललित और व्यंग्य यात्रा पत्रिका के संपादक एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय को डोगरी भाषा की पुस्तकें भेंट की गईं और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। अन्य साहित्यकारों और प्रतिभागियों का भी स्वागत किया गया।

देखने में यह एक सामान्य स्वागत समारोह था, लेकिन उसके भीतर एक गहरा सांस्कृतिक अर्थ छिपा था। किसी अतिथि के हाथ में स्थानीय भाषा की पुस्तक रखना केवल पुस्तक भेंट करना नहीं होता। वह उस प्रदेश की भाषा, स्मृति और संवेदना से परिचय कराने का एक आत्मीय तरीका भी है। डोगरी की पुस्तक मानो श्रीनगर की यात्रा शुरू होने से पहले ही जम्मू-कश्मीर की एक स्थानीय आवाज को यात्रियों के हाथ में रख रही थी। साहित्य का यही स्वभाव है। वह किसी स्थान को केवल देखने की वस्तु नहीं रहने देता। वह उसे पढ़े, सुने और महसूस किए जाने वाले अनुभव में बदल देता है।

उद्घाटन सत्र: कश्मीर में हिंदी व्यंग्य को नई जमीन देने की पहल

28 सितंबर को श्रीनगर में चिंतन शिविर का उद्घाटन हुआ। डॉ. प्रेम जनमेजय ने सत्र की अध्यक्षता की। डॉ. रमेश सैनी मुख्य अतिथि और यशपाल निर्मल विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. लालित्य ललित ने बीज वक्तव्य दिया। डॉ. रफीक मसूदी, केवल कुमार केवल और आशा कुंद्रा की उपस्थिति ने आयोजन को स्थानीय साहित्यिक संदर्भ से जोड़ा। आशा कुंद्रा के वंदना गायन और स्वागत के बीच संचालन स्मिता सिन्हा ने किया।

उद्घाटन के अवसर पर कही गई बातों में इस आयोजन की मूल भावना स्पष्ट दिखाई दी। डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि इस चिंतन शिविर के माध्यम से हिंदी व्यंग्य को कश्मीर में एक ठोस जमीन मिलेगी। यह जमीन केवल भौगोलिक अर्थ में नहीं थी। किसी साहित्यिक विधा को किसी प्रदेश में वास्तविक जमीन तब मिलती है, जब वह वहाँ के जीवन, अनुभवों और स्थानीय संवेदनाओं से जुड़ती है। जब वह वहाँ के पाठकों और रचनाकारों से संवाद करती है और जब वह किसी आयोजन की सीमा से बाहर जाकर निरंतर साहित्यिक संबंध बनाती है।

डॉ. लालित्य ललित ने वर्ष 2005 से आरंभ हुई व्यंग्य संबंधी कार्यशालाओं और गतिविधियों की यात्रा का उल्लेख किया। उनके वक्तव्य से यह स्पष्ट हुआ कि व्यंग्य यात्रा के पीछे लंबे समय से चल रही एक रचनात्मक और संगठनात्मक प्रक्रिया है। यशपाल निर्मल ने व्यंग्य को समय की विसंगतियों को पहचानने वाली सजग रचनात्मक दृष्टि के रूप में रेखांकित किया। उद्घाटन सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि यहाँ व्यंग्य को केवल हँसी या मनोरंजन की विधा के रूप में देखने की कोशिश नहीं थी। व्यंग्य को अपने समय से मुठभेड़ करने वाली साहित्यिक दृष्टि के रूप में समझने का प्रयास था।

व्यंग्य: हँसी के भीतर छिपे गंभीर सवाल

व्यंग्य की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि वह गंभीर बात को हमेशा गंभीर मुद्रा में कहने के बजाय कई बार मुस्कान के रास्ते हमारे भीतर पहुँचाता है। लेकिन व्यंग्य को केवल हास्य मान लेना उसकी साहित्यिक शक्ति को सीमित करना है। उसका वास्तविक क्षेत्र वह विसंगति है, जिसे हम रोज देखते हैं और फिर भी देखने से चूक जाते हैं। वह समाज की उस सामान्यता को सामने लाता है, जिसे हम लंबे समय से स्वीकार करते आए हैं। वह सवाल करता है कि जो कुछ सामान्य दिखाई देता है, क्या वह सचमुच सामान्य है।

एक सफल व्यंग्य पाठक को केवल हँसाकर आगे नहीं बढ़ाता। हँसी के बाद उसके भीतर कोई प्रश्न छोड़ देता है। कभी वह प्रश्न असुविधाजनक होता है और कभी आत्ममंथन की ओर ले जाता है। शायद यही व्यंग्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

शिविर के दौरान हिंदी व्यंग्य की वर्तमान स्थिति और उसकी रचनात्मक संभावनाओं पर भी गंभीर चर्चा हुई। फारूक अफरीदी, जाकिर अली, चंद्रकांता सहित अनेक रचनाकारों ने अपने विचार रखे। रचना पाठ में रणविजय राव, चंद्रकांता और डॉ. गंगाराम राजी सहित अनेक रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। वरिष्ठ लेखक बलराम ने सत्र की अध्यक्षता की। गोपी बबूना और डॉ. सूरत ठाकुर की उपस्थिति ने संवाद को और विस्तार दिया।

बातचीत में यह बात बार-बार सामने आई कि व्यंग्य अपने समय से जितना जुड़ा होगा, उतना ही प्रभावी होगा। समय बदलता है तो विसंगतियाँ भी बदलती हैं। इसलिए व्यंग्यकार को केवल भाषा का कुशल उपयोग करने वाला लेखक नहीं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को सजगता से देखने वाला व्यक्ति भी होना पड़ता है।

समकालीन युवा व्यंग्य: बदलते समय की नई संवेदनाएँ

इसी क्रम में ‘हिंदी व्यंग्य का समकालीन युवा स्वर’ विषय पर हुई चर्चा ने आयोजन को भविष्य की ओर देखने का अवसर दिया। रामकिशोर उपाध्याय मुख्य अतिथि, फारूक अफरीदी अध्यक्ष और सूर्यकांत शर्मा विशिष्ट अतिथि रहे। रणजीत राव ने बीज वक्तव्य दिया। डॉ. जाकिर अली, रजनीश और चंद्रकांता ने विषय पर विचार रखे तथा प्रियंका सैनी ने संचालन किया।

इस चर्चा में यह महत्वपूर्ण बात सामने आई कि युवा व्यंग्य केवल युवा लेखकों द्वारा लिखा गया व्यंग्य नहीं है। वह बदलते समय की नई संवेदनाओं और नई विडंबनाओं का नाम भी है। आज की युवा पीढ़ी जिस सामाजिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संसार में जी रही है, उसके अनुभव पिछली पीढ़ियों से अलग हैं। सोशल मीडिया, बदलती पारिवारिक संरचनाएँ, उपभोक्तावाद, तकनीक और तेजी से बदलती सामाजिक प्राथमिकताएँ उसके जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए उसकी बेचैनियाँ भी अलग हैं और उन बेचैनियों को व्यक्त करने की भाषा भी अलग है।

किसी साहित्यिक विधा का भविष्य तभी सुरक्षित रहता है, जब नई पीढ़ी उसमें अपने समय की आवाज पहचान सके। परंपरा यदि नए प्रश्नों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दे तो वह धीरे-धीरे स्मृति बन जाती है। लेकिन जब परंपरा नई संवेदनाओं को अपने भीतर जगह देती है तो वह जीवित रहती है और आगे बढ़ती है। इस अर्थ में युवा व्यंग्य पर बातचीत केवल युवा लेखकों की चर्चा नहीं थी। वह व्यंग्य के भविष्य और उसकी बदलती भाषा पर बातचीत भी थी।

लोकभाषाओं में व्यंग्य: लोकजीवन से उपजती रचनात्मक शक्ति

29 सितंबर का विमर्श लोकभाषाओं की ओर मुड़ा। डॉ. राकेश पाण्डेय ने भारतीय लोकभाषाओं की व्यंग्यात्मक समृद्धि पर बल दिया। कश्मीर जैसे बहुभाषी प्रदेश में यह विषय विशेष अर्थ ग्रहण करता है। डोगरी, कश्मीरी, पहाड़ी, गोजरी, पंजाबी और अन्य भाषाई परंपराएँ अपने भीतर जीवन के असंख्य अनुभव सँजोए हुए हैं।

लोकभाषा का व्यंग्य किसी सैद्धांतिक प्रस्ताव से पहले जीवन में जन्म लेता है। खेत, बाजार, परिवार, गाँव, चौपाल, लोकगीत, कहावत और रोजमर्रा की बोलचाल उसके स्रोत हो सकते हैं। उसकी ताकत उसकी जीवन-सन्निकटता में होती है। वह जीवन को बाहर से देखकर टिप्पणी नहीं करता। वह उसी जीवन के भीतर से अपनी भाषा खोजता है।

लोकभाषाओं के व्यंग्य को हिंदी की मुख्यधारा से जोड़ना केवल अनुवाद का प्रश्न नहीं है। यह साहित्यिक दृष्टि के विस्तार का प्रश्न भी है। किसी भाषा के मुहावरे में केवल शब्द नहीं होते। उनके पीछे एक जीवन-पद्धति, स्मृति, सामाजिक अनुभव और सांस्कृतिक इतिहास होता है। जब एक भाषा दूसरी भाषा को सुनती है तो केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता। दोनों का संसार थोड़ा और विस्तृत होता है। इस संदर्भ में कश्मीर में हुआ यह संवाद विशेष महत्व रखता है। यहाँ साहित्य ने भाषा की सीमाओं को पार करते हुए अलग-अलग अनुभवों को एक साझा मंच दिया।

साहित्यिक परंपरा का सम्मान और व्यंग्य रचना-पाठ

डॉ. सुनीता ने मुख्यधारा की प्रमुख रचनाओं में व्यंग्य की उपस्थिति और उसके उद्देश्यों पर चर्चा की। रणविजय राव ने समकालीन व्यंग्य लेखन के परिदृश्य की समीक्षा की। डॉ. गंगाराम राजी ने रचनाकार की सजग दृष्टि की आवश्यकता पर बल दिया। वह दृष्टि, जो सामान्य परिस्थितियों में भी रचना की सामग्री पहचान सके।

इसी दिन वरिष्ठ व्यंग्यकार बलराम के 75 वर्ष पूर्ण होने पर व्यंग्य यात्रा की ओर से उनका सम्मान किया गया। यह सम्मान केवल एक वरिष्ठ रचनाकार का अभिनंदन नहीं था। यह उस साहित्यिक परंपरा के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भी क्षण था, जिसने हिंदी व्यंग्य को लगातार समृद्ध किया है।

इसी क्रम में कश्मीर में आयोजित साहित्यिक आयोजन के तृतीय सत्र में ‘व्यंग्य रचना पाठ’ का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता बलराम ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. गंगाराम राजी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत श्रीमती आशा कुंद्रा की सुमधुर सरस्वती वंदना से हुई। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय और साहित्यिक रंग से भर दिया।

इसके बाद सूरत ठाकुर, लालित्य ललित, प्रेम जनमेजय, रमेश सैनी, फारूक अफरीदी, रामकिशोर उपाध्याय, रणविजय राव, प्रियंका सैनी, आशा कुंद्रा और चंद्रकांता ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया।

रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों, विडंबनाओं और बदलते जीवन-सरोकारों को व्यंग्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया। अलग-अलग रचनाकारों की भाषा, शैली और विषय भले ही अलग रहे हों, लेकिन उनके केंद्र में अपने समय को समझने और उसकी विसंगतियों को सामने लाने की कोशिश थी। सत्र का संचालन स्मिता सिन्हा ने किया। व्यंग्य की विविध शैलियों और प्रभावी प्रस्तुतियों ने सत्र को रोचक, सार्थक और जीवंत बना दिया।

जब लिखित व्यंग्य आवाज बनकर श्रोताओं तक पहुँचा

रचना पाठ के दौरान यह भी महसूस हुआ कि जब व्यंग्य लिखित शब्द से निकलकर आवाज में आता है तो उसका प्रभाव और व्यापक हो जाता है। पाठक की जगह सामने बैठे श्रोता होते हैं और रचनाकार तथा श्रोता के बीच एक प्रत्यक्ष संवाद बनता है।

शिविर के विभिन्न रचना पाठ सत्रों में पौमिला ठाकुर, कृष्ण चंद्र महादेविया, फारूक अफरीदी, रवींद्र शर्मा और कृष्णा ठाकुर सहित अनेक रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। कवि एवं गीतकार दीपक सरीन ने ग़ज़लों और गीतों से वातावरण में अलग रंग जोड़ा। रवींद्र कुमार ठाकुर ने रचना पाठ सत्र की अध्यक्षता की। पवन चौहान ने नशे को केंद्र में रखकर सामाजिक चेतना से जुड़ी व्यंग्य रचना प्रस्तुत की, जबकि गोपी बबूना ने तनाव और व्यंग्य के अंतर्संबंधों पर विचार किया। इस तरह रचना पाठ केवल रचनाओं के प्रस्तुत किए जाने तक सीमित नहीं रहा। उसने साहित्य को प्रत्यक्ष अनुभव में बदल दिया।

कागज पर लिखा व्यंग्य जब आवाज में आता है तो उसके अर्थ की एक दूसरी परत खुलती है। शब्दों के बीच का विराम, आवाज का उतार-चढ़ाव और श्रोताओं की प्रतिक्रिया मिलकर रचना को नया जीवन देते हैं। कई बार किसी रचना का कोई छोटा-सा वाक्य श्रोताओं के बीच ऐसी प्रतिक्रिया पैदा करता है, जो लिखित पाठ में दिखाई नहीं देती। यही प्रत्यक्षता रचना पाठ को विशेष बनाती है। वह रचनाकार और पाठक के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करता है।

व्यंग्य आलोचना का वर्तमान: रचना से आगे उसके अर्थों की पड़ताल

30 सितंबर को चिंतन शिविर ने व्यंग्य के आलोचनात्मक पक्ष को केंद्र में लिया। डॉ. लालित्य ललित की तीन पुस्तकों ‘दिल और दिल्ली की गर्मी’, ‘पांडेय जी और उनके साहित्यिक लोचे’ तथा ‘पांडेय जी और कोचिंग क्लासेस’ का लोकार्पण हुआ। ‘अनवरत’ पत्रिका के लालित्य ललित पर केंद्रित विशेषांक का विमोचन भी किया गया।

‘व्यंग्य आलोचना का वर्तमान’ विषय पर डॉ. रमेश सैनी ने व्यंग्य आलोचना की चुनौतियों पर विचार रखा। डॉ. प्रेम जनमेजय ने व्यंग्य आलोचना की परंपरा और वर्तमान स्वरूप पर चर्चा की। डॉ. रणविजय राव ने विस्तृत शोधपत्र प्रस्तुत किया।

आलोचना का यह सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि उसने व्यंग्य को केवल हँसी की कसौटी पर देखने से आगे बढ़ने का अवसर दिया। किसी व्यंग्य की साहित्यिकता को समझने के लिए उसकी भाषा, संरचना, अंतर्वस्तु, सामाजिक संदर्भ और सौंदर्यबोध को पढ़ना आवश्यक है। आलोचना का काम केवल यह बताना नहीं है कि रचना अच्छी है या खराब। उसका काम रचना के भीतर छिपी परतों को खोलना भी है।

वह पूछती है कि रचना हमें हँसाती क्यों है, असहज क्यों करती है और अंततः हमारे समय के बारे में क्या कहती है। इस अर्थ में व्यंग्य आलोचना साहित्य को अधिक गंभीरता से पढ़ने की दृष्टि देती है।

समापन के बाद भी जारी रहती है साहित्य की यात्रा

समापन सत्र तक पहुँचते-पहुँचते तीन दिनों की गतिविधियाँ एक साझा साहित्यिक अनुभव में बदल चुकी थीं। डॉ. रमेश सैनी की अध्यक्षता में हुए समापन में यशपाल निर्मल, डॉ. प्रेम जनमेजय और डॉ. लालित्य ललित की उपस्थिति रही। हिमाचल प्रदेश से आए लेखकों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। डॉ. गंगाराम राजी ने सत्र की अध्यक्षता की। प्रतिभागी साहित्यकारों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। लेकिन किसी चिंतन शिविर का वास्तविक समापन प्रमाणपत्रों के वितरण के साथ नहीं होता। असली यात्रा उसके बाद शुरू होती है।

किसी भी साहित्यिक आयोजन की सार्थकता इस बात से तय होती है कि उसके समाप्त होने के बाद क्या बचता है। क्या संवाद आगे बढ़ता है? क्या लेखक एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं? क्या स्थानीय रचनाकारों की आवाज राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य तक पहुँचती है? क्या लोकभाषाओं में लिखे जा रहे व्यंग्य को नए पाठक मिलते हैं? क्या युवा रचनाकारों को नए मंच मिलते हैं? क्या आलोचना रचना के साथ आगे भी चलती रहती है? इन प्रश्नों के उत्तर ही किसी आयोजन की वास्तविक सफलता तय करते हैं।

चिनार, स्मृतियाँ और साहित्य का लोकतंत्र

श्रीनगर चिंतन शिविर के बाद कश्मीर की स्मृति केवल पहाड़ों, झीलों और चिनारों की सुंदरता तक सीमित नहीं रह जाती। उसमें किताबें हैं। आवाजें हैं। भाषाएँ हैं। रचनाएँ हैं। विमर्श हैं और उन लोगों के चेहरे हैं, जो साहित्य को लेकर दूर-दूर से यहाँ आए। साहित्य किसी स्थान को इसी तरह बदलता है। वह दृश्य को अनुभव में और अनुभव को स्मृति में बदल देता है।

चिनार के पत्ते मौसम के साथ रंग बदलते हैं। झील आकाश के बदलते रंगों को अपने भीतर उतारती है। पहाड़ समय की अनेक परतों के साक्षी बने रहते हैं। साहित्य भी अपने समय के रंगों और विरोधाभासों को दर्ज करता चलता है। व्यंग्य इस दर्ज समय को एक खास दृष्टि से पढ़ता है। वह मुस्कान के भीतर प्रश्न रखता है और विनोद के भीतर गंभीरता।

श्रीनगर चिंतन शिविर की सार्थकता इसी में है कि उसने व्यंग्य को उसके व्यापक साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखने का अवसर दिया। यह व्यंग्यकारों का मिलन भर नहीं था। यह भाषा और अनुभव के बीच पुल बनाने की कोशिश थी। यह वरिष्ठ परंपरा और युवा ऊर्जा के बीच संवाद था। यह लोकभाषाओं की जीवित शक्ति को पहचानने का अवसर था। यह रचना और आलोचना के बीच संबंध को नए सिरे से देखने की पहल थी।

अंततः साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह सीमाएँ पार करता है। एक भाषा दूसरी भाषा को सुनती है। एक प्रदेश दूसरे प्रदेश से संवाद करता है और एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से अपने समय के बारे में सवाल करती है। जम्मूतवी पर भेंट की गई डोगरी की पुस्तक से लेकर श्रीनगर के सभागार में उठे आलोचनात्मक प्रश्नों तक यह पूरी यात्रा दूसरे को सुनने और समझने की यात्रा रही। साहित्य का लोकतंत्र इसी सुनने से बनता है।

यदि यह संवाद आगे बढ़ता है, स्थानीय रचनाकार और राष्ट्रीय साहित्यिक संसार एक-दूसरे को पढ़ते रहते हैं, लोकभाषाओं के अनुभव व्यापक हिंदी संसार तक पहुँचते हैं और युवा रचनाकार अपने समय की विसंगतियों को अपनी भाषा में दर्ज करते हैं, तो यह शिविर अपनी तिथि से बहुत आगे जाएगा। तब चिनार की छाँव में हुआ यह साहित्यिक संवाद केवल तीन दिनों की स्मृति नहीं रहेगा। वह उन शब्दों की यात्रा बन जाएगा, जो एक स्थान से दूसरे स्थान, एक भाषा से दूसरी भाषा और एक मन से दूसरे मन तक जाते हैं।

शायद किसी साहित्यिक आयोजन का सबसे सुंदर अर्थ यही है— वह समाप्त होकर भी समाप्त न हो।

 

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I