डीजे की आवाज कितनी ऊँची हो सकती है, यह आस्था तय करेगी या कानून?

बलरामपुर में 7 वर्षीय छात्रा वैष्णवी तिवारी की मृत्यु के मामले ने एक बार फिर सार्वजनिक आयोजनों में तेज ध्वनि, डीजे संस्कृति और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध समाचार के अनुसार छात्रा की तबीयत गणेश विसर्जन शोभायात्रा के दौरान बज रहे तेज डीजे के बीच बिगड़ी और पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की है। अभी यह चिकित्सकीय रूप से अंतिम रूप से स्थापित नहीं है कि मृत्यु का कारण डीजे ही था। लेकिन घटना एक बड़ा सवाल अवश्य छोड़ती है— जब कानून ने ध्वनि की सीमा तय कर रखी है, तो उसका पालन कौन कराएगा?

Sep 27, 2026 - 23:41
Sep 27, 2026 - 23:43
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डीजे की आवाज कितनी ऊँची हो सकती है, यह आस्था तय करेगी या कानून?

उत्सव की खुशी किसी बच्चे के जीवन, किसी बुजुर्ग की नींद, किसी मरीज की शांति या किसी विद्यार्थी की पढ़ाई से बड़ी हो सकती है?

समाचार के अनुसार, बलरामपुर के एक विद्यालय में कक्षा 2 की 7 वर्षीय छात्रा वैष्णवी तिवारी उस समय गंभीर रूप से अस्वस्थ हुई, जब पास से गणेश विसर्जन शोभायात्रा गुजर रही थी और तेज आवाज में डीजे बज रहा था। समाचार में परिजनों के हवाले से कहा गया कि बच्ची को तीन बार हार्ट अटैक आया और अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हालांकि स्वयं दैनिक जागरण ने उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है। पुलिस ने भी जाँच  शुरू की है और बिना चिकित्सकीय जाँच  के मृत्यु के कारण को अंतिम रूप से डीजे से जोड़ना उचित नहीं होगा।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है...

अगर जाँच  यह स्थापित करती है कि अत्यधिक ध्वनि इस त्रासदी का कारण या महत्वपूर्ण कारक थी, तो जिम्मेदारी केवल उस बच्ची की किस्मत पर डालकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। तब यह पूछना होगा कि जिस मार्ग से जुलूस निकल रहा था, वहाँ ध्वनि की निगरानी कौन कर रहा था? निर्धारित सीमा से अधिक आवाज होने पर डीजे क्यों नहीं रोका गया? आयोजन की अनुमति किन शर्तों पर दी गई थी? और यदि नियम टूट रहे थे तो प्रशासन ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

कानून पहले से मौजूद है

यह भी भूलना नहीं चाहिए कि भारत में ध्वनि प्रदूषण के संबंध में कोई कानून-विहीन स्थिति नहीं है। Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की अधिकतम परिवेशीय सीमाएं निर्धारित हैं। आवासीय क्षेत्र में दिन के समय सीमा 55 dB(A) Leq और रात में 45 dB(A) Leq है; दिन का समय सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक तथा रात का समय रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक माना गया है।  अर्थात समस्या यह नहीं है कि नियम नहीं हैं। समस्या यह है कि नियमों का पालन कितना हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी बहुत पहले स्पष्ट कर चुका है कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी ध्वनि नहीं पैदा की जा सकती जिससे आसपास रहने वाले लोगों की शांति भंग हो। Church of God (Full Gospel) in India v. K.K.R. Majestic Colony Welfare Association में न्यायालय ने कहा था कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर बच्चों, विद्यार्थियों, वृद्धों और बीमार लोगों को अनावश्यक ध्वनि से परेशान नहीं किया जा सकता। बाद के न्यायिक विमर्श में भी यह बात सामने आई कि कृत्रिम साधनों से किसी अनिच्छुक व्यक्ति को अत्यधिक और अप्रिय ध्वनि सुनने के लिए मजबूर करना शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार से टकरा सकता है।  तो फिर सवाल सीधा है— कानून किताब में रहेगा या सड़क पर भी दिखाई देगा?

आस्था को आवाज की जरूरत है या मर्यादा की?

किसी धार्मिक आयोजन का विरोध करना इस बहस का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। भारत की सामाजिक विविधता में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन धर्म और ध्वनि प्रदूषण एक ही चीज नहीं हैं। भक्ति के लिए संगीत हो सकता है, लेकिन भक्ति का अर्थ यह नहीं कि ध्वनि इतनी बढ़ा दी जाए कि आसपास के घरों की खिड़कियाँ कांपने लगें, बच्चे डर जाएँ, मरीज परेशान हों और विद्यार्थी पढ़ाई न कर सकें। बलरामपुर की घटना के संदर्भ में दैनिक जागरण की रिपोर्ट में चिकित्सकीय राय भी प्रकाशित हुई है कि अत्यधिक ध्वनि शरीर में तनाव संबंधी प्रतिक्रियाएं बढ़ा सकती है और कुछ परिस्थितियों में हृदय पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही चिकित्सक ने यह सावधानी भी बताई कि बिना पोस्टमार्टम के सीधे तौर पर मृत्यु का कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता।  इस सावधानी को गंभीरता से लेना जरूरी है। किसी घटना को सनसनी में बदलना भी गलत है और उससे उठने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रश्न को दबा देना भी।

जुलूस की अनुमति सिर्फ कागज पर क्यों?

यहाँ प्रशासनिक व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। किसी भी बड़े सार्वजनिक जुलूस या आयोजन के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि आयोजन शांतिपूर्ण रहेगा या नहीं। यह भी देखा जाना चाहिए कि जुलूस का मार्ग क्या होगा? विद्यालय, अस्पताल और आवासीय क्षेत्र कितनी दूरी पर हैं? ध्वनि विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किस सीमा तक होगा? डीजे की ध्वनि की वास्तविक समय में निगरानी कौन करेगा? नियम टूटने पर तत्काल कार्रवाई कौन करेगा? आयोजक की जिम्मेदारी क्या होगी? शिकायत मिलने पर पुलिस की प्रतिक्रिया कितनी शीघ्र होगी?

उत्तर प्रदेश पुलिस की सार्वजनिक सूचनाओं में भी विभिन्न त्योहारों और जुलूसों के संदर्भ में मार्ग निरीक्षण, सुरक्षा व्यवस्था और संबंधित अधिकारियों द्वारा निगरानी की गतिविधियाँ दिखाई देती हैं। इसलिए सवाल केवल आयोजन की अनुमति का नहीं है। सवाल अनुमति के साथ लगाए गए नियमों के अनुपालन का है।

क्या हर नया जुलूस रोक दिया जाना चाहिए?

यहाँ एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी भी आवश्यक है। यह कहना कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज न होने वाला हर नया जुलूस स्वतः अवैध है, बिना संबंधित राज्य कानून, स्थानीय आदेश और प्रशासनिक प्रक्रिया देखे एक सार्वभौमिक कानूनी निष्कर्ष नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल उचित प्रश्न है कि नए या बड़े पैमाने के आयोजनों के लिए प्रशासन के पास पूर्व सूचना, मार्ग-योजना, सुरक्षा मूल्यांकन और ध्वनि-नियंत्रण की व्यवस्था क्यों न हो? त्योहार या धार्मिक परंपरा पुरानी हो सकती है, लेकिन डीजे की शक्ति और आधुनिक साउंड सिस्टम का विस्तार अपेक्षाकृत नया है। इसलिए परंपरा की निरंतरता का अर्थ ध्वनि की असीमित तीव्रता की अनुमति नहीं हो सकता।

सबसे बड़ा प्रश्न: कानून किसके लिए है?

हमारे समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति विकसित हो रही है। जब कोई गरीब व्यक्ति नियम तोड़ता है, तो कानून तुरंत दिखाई देता है। जब कोई कमजोर नागरिक शिकायत करता है, तो उससे कागज माँगे जाते हैं। लेकिन जब भीड़ के रूप में नियमों का उल्लंघन होता है, तो कभी-कभी प्रशासनिक तंत्र का व्यवहार अधिक सतर्क और संकोची दिखाई देता है। यही वह बिंदु है जहाँ कानून के शासन की वास्तविक परीक्षा होती है। कानून की प्रतिष्ठा इस बात से तय नहीं होती कि किताब में कितने नियम लिखे हैं। उसकी प्रतिष्ठा इस बात से तय होती है कि वे नियम किस पर लागू होते हैं। यदि किसी डीजे को निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक आवाज में बजाया जा रहा है और अधिकारी उसे रोकने के बजाय देखते रहते हैं, तो समस्या केवल डीजे की नहीं है। वह प्रशासनिक निष्क्रियता की समस्या है। और यदि किसी आयोजन पर कार्रवाई केवल इसलिए नहीं होती कि उससे राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक विवाद पैदा हो सकता है, तो यह और भी गंभीर प्रश्न है।

युवाओं को शोर नहीं, अवसर चाहिए

यह कहना कि सरकार जानबूझकर युवाओं को धार्मिक जुलूसों और ऐसे आयोजनों में उलझाकर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य या भ्रष्टाचार जैसे सवालों से दूर रखना चाहती है— एक राजनीतिक आरोप है, जिसे प्रमाण के बिना तथ्य की तरह नहीं लिखा जा सकता। लेकिन इस आरोप के पीछे उठने वाले सामाजिक प्रश्न को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। देश के युवाओं के सामने वास्तविक प्रश्न हैं— शिक्षा कैसी हो? रोजगार कहाँ है? स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी सुलभ है? भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कैसे हो? स्थानीय अर्थव्यवस्था कैसे मजबूत हो? और सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह हो?

इन सवालों के बीच हमें ऐसी सार्वजनिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें उत्सव हो, लेकिन उन्माद न हो; संगीत हो, लेकिन प्रदूषण न हो; जुलूस हो, लेकिन किसी दूसरे नागरिक के अधिकारों का अतिक्रमण न हो।

वैष्णवी की मृत्यु का सबसे बड़ा सबक

अगर जाँच  में यह सामने आता है कि वैष्णवी की मृत्यु में अत्यधिक ध्वनि की भूमिका थी, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होगी। यह प्रशासन के लिए चेतावनी होगी कि ध्वनि भी प्रदूषण है और प्रदूषण भी सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। और अगर जाँच  यह साबित नहीं करती कि डीजे मृत्यु का कारण था, तब भी घटना व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। क्योंकि तब भी एक सवाल हमारे सामने रहेगा— क्या हमें किसी दूसरी वैष्णवी के साथ ऐसी घटना होने का इंतजार करना चाहिए, तब जाकर हम ध्वनि-नियमों को गंभीरता से लागू करेंगे? शायद नहीं। किसी लोकतांत्रिक समाज में सरकार का काम केवल उत्सवों को अनुमति देना नहीं है। उसका काम यह सुनिश्चित करना भी है कि एक नागरिक की खुशी दूसरे नागरिक के जीवन और स्वास्थ्य पर अत्याचार न बन जाए। आस्था रहे। उत्सव रहे। संगीत रहे। पर कानून भी रहे। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे ऊँची आवाज डीजे की नहीं, कानून की होनी चाहिए। और बलरामपुर की यह घटना हमसे शायद यही पूछ रही है— “अगली बार आवाज बढ़ने से पहले क्या प्रशासन जागेगा?”

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I