कविता खुशफहम नहीं होती
प्रकाश देवकुलिश की कविता में सत्ता, जनमानस, कॉरपोरेट शक्ति और ‘राष्ट्रीय मानव’ के व्यंग्य को मृत्युंजय श्रीवास्तव ने साहित्य संवाद में विश्लेषित किया है। पढ़ें...
कवि वह होता है, जो हवा को पढ़ता है, सुनता है और यहाँ तक कि सूँघ भी लेता है। वह उन संकेतों को पकड़ लेता है, जो आमतौर पर आँखों से ओझल और कानों से अनसुने रह जाते हैं। इन सबके साथ उसकी कलम में कला भी हो, तो उसकी कविता आस्वाद में भले ही नीम चढ़ा करेला लगे, उसे थू-थू करके उगल देना आसान नहीं होता। उसकी कड़वाहट भीतर उतरती है और देर तक बेचैन करती रहती है। कवि की एक पंक्ति है—
सिपहसालार चिंतित नहीं
तब तक
जब तक नशे में है प्रजा।
यह कवि अपने समय का सचेत नागरिक होता है। यह कवि जनता के नशे में होने का साक्षी है। यहां नशा एक मानसिक अवस्था का रूपक है। नशे में जनता अपने बुनियादी सवालों, अधिकारों और वास्तविक हितों को भुलाकर भावनात्मक उन्माद में जीने लगती है। धर्म, जाति, सांप्रदायिक पहचान, आक्रामक राष्ट्रवाद, नेता-पूजा, शत्रु-निर्माण और घृणा का निरंतर प्रसार इसके अलग-अलग रूप हैं। इन सबका हासिल एक है : नागरिक अपने जीवन से जुड़े असल सवालों से कट जाएं और उन मुद्दों में उलझे रहें, जिन्हें सत्ता उनके सामने खड़ा करती है। जनता का ध्यान जितना अधिक भटकेगा, सत्ता उतनी ही निश्चिंत रहेगी। उसके सिपहसालारों के मजे में खलल पड़ने की आशंका नहीं होगी। 'राजा खुशफहम' है।
सत्ता की निश्चिंतता और ऑक्टोपस की फैलती ताकत
राजा और मंत्री क्यों आश्वस्त हैं? इसलिए कि वे भी खुश हैं, जिनके हाथ उनकी पीठ पर हैं। ये ‘वे’ कौन हैं? आज के संदर्भ में इन्हें कॉरपोरेट शक्ति के रूप में पहचाना जा सकता है। कविता का ‘ऑक्टोपस’ इसी शक्ति का रूपक बनकर सामने आता है। उसकी आवाज सुनिए—
मैं ऑक्टोपस हूँ
आक्रमण के लिए हैं कई-कई हाथ मेरे
जो तंत्र मेरे नहीं हैं
मैं उन्हें भी अपना बना लेता हूँ
नियम की किताब की चिंता नहीं
इससे नहीं तो उससे जकडूँगा
मैं नए भी रच सकता हूँ।
लेकिन कवि के ‘वे’ केवल कॉरपोरेट शक्ति तक सीमित नहीं हैं। उसे नैपथ्य में रहने वाला वह सेनापति भी दिखाई देता है, जिसकी प्रेरणा और आशीर्वाद से राजा, मंत्री, सिपहसालार और कॉरपोरेट टीम बनाकर खेलते हैं। इस खेल में न्यायपालिका, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। इनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सत्ता पर अंकुश लगाएं, नागरिक अधिकारों की रक्षा करें और जवाबदेही सुनिश्चित करें। जब वे इस भूमिका से विमुख होते दिखाई देते हैं, तब लोकतंत्र का संकट गहरा जाता है।
कवि ने नोटिस किया है कि ऐसे हालात में ‘वे हंस रहे होते हैं।’ इस हंसी में उस व्यवस्था का आत्मविश्वास छिपा है, जिसमें सत्ता को चुनौती देने वाली आवाजें कमजोर पड़ती जाती हैं। स्वतंत्रता और निष्पक्षता का गिरवी रखा जाना कवि सूंघ लेता है। इस हंसी के पीछे छिपे कुटिल राज को कवि पढ़ता है।
‘राष्ट्रीय मानव’: पहचान, नागरिकता और एक गहरा व्यंग्य
कवि की पीड़ा इन पंक्तियों में व्यक्त होती है—
बदल दिया जाना था राष्ट्र, राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय मानव।
नाम बदलने का खेल देश देख रहा है। राष्ट्रीय पशु का उल्लेख प्रतीकों की दुनिया में होने वाले फेरबदल की ओर संकेत करता है, लेकिन ‘राष्ट्रीय मानव’ का उल्लेख कविता को कहीं गहरे व्यंग्य तक ले जाता है। क्या नागरिक और मनुष्य होने की नई शर्तें लिखी जा रही हैं? क्या नागरिकता का अर्थ संविधान के प्रति निष्ठा और समान अधिकारों के बजाय किसी खास विचार, पहचान अथवा राजनीतिक आस्था की स्वीकृति बनता जा रहा है?
कवि इन सवालों का तैयार जवाब नहीं देता। वह उन्हें कविता में दर्ज करता है, ताकि पाठक उनसे मुंह न मोड़ सके। ‘राष्ट्रीय मानव’ की विडंबना यही है कि राष्ट्र के नाम पर मनुष्य की पहचान और नागरिकता को ही कसौटी पर रखा जाने लगता है।
व्यंग्य की कड़वाहट में छिपी परिवर्तन की आकांक्षा
व्यंग्य में परिवर्तन की कामना निहित होती है। वह विसंगतियों पर हंसने भर के बजाय उनके पीछे सक्रिय सत्ता-संबंधों को उजागर करता है। प्रकाश देवकुलिश का व्यंग्य इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है। उनकी कविता प्रजा के नशे, ऑक्टोपस की फैलती ताकत और ‘राष्ट्रीय मानव’ की विडंबना के जरिए हमारे समय के उन अंतर्विरोधों को सामने लाती है, जिन्हें सत्ता की चमक-दमक अक्सर ढक देती है।
कविता सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा होती है, इसलिए वह खुशफहम नहीं हो सकती। वह यथास्थिति से टकराती है और बेहतर समाज की संभावना तलाशती है। देवकुलिश की कविता की कड़वाहट निराशा पैदा करने के लिए नहीं, चेतना जगाने के लिए है। वह पाठक को बेचैन करने के साथ उससे अपने समय के कठिन सवालों का सामना करने की अपेक्षा भी करती है। खुशफहमी सत्ता को निश्चिंत रख सकती है, मगर कविता का काम उस निश्चिंतता में दरार डालना है।
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