बतरस 2026 की साहित्यिक यात्रा और महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं रघुनंदन प्रसाद शर्मा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

बतरस 2026 के दूसरे दिन दौलतपुर और छिंटीखेड़ा में साहित्यिक यात्रा आयोजित हुई। सैदापुर में राष्ट्रीय संगोष्ठी में दोनों साहित्यकारों के योगदान पर चर्चा हुई।

Oct 24, 2026 - 20:38
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बतरस 2026 की साहित्यिक यात्रा और महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं रघुनंदन प्रसाद शर्मा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
राष्ट्रीय संगोष्ठी के वक्ता प्रोफेसर (डॉ.) संजय जायसवाल

महावीर प्रसाद द्विवेदी और रघुनंदन प्रसाद शर्मा के पैतृक गाँवों में साहित्यिक विरासत की तलाश

रायबरेली, 24 अक्तूबर। बतरस 2026 के त्रिदिवसीय आयोजन के दूसरे दिन साहित्यिक यात्रा का आयोजन किया गया। अपने साहित्यकारों की स्मृतियों और उनकी रचनात्मक विरासत को सहेजने के उद्देश्य से आयोजित यह यात्रा मधुकरपुर से प्रारंभ हुई। यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने हिंदी भाषा के परिमार्जन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा अक्षर विज्ञान के प्रणेता पंडित रघुनंदन प्रसाद शर्मा के पैतृक गाँवों का भ्रमण किया। इस अवसर पर दोनों साहित्यकारों के जीवन, साहित्य और बौद्धिक योगदान पर चर्चा के साथ उनकी स्मृतियों को जीवंत करने का प्रयास किया गया।

साहित्यिक यात्रा का पहला पड़ाव आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का पैतृक आवास दौलतपुर रहा। यहां कार्यक्रम संयोजक सुनील सरगम के नेतृत्व में कंपोजिट विद्यालय, दौलतपुर के बच्चों ने स्वागत गीत प्रस्तुत कर साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों का अभिनंदन किया। इसके बाद पुस्तकालय में आयोजित स्मरण-संवाद सत्र में महेंद्र मिश्र, आकांक्षा आदित्य, संकल्प श्रोत्रिय, नवीन चंद्र सिंह और दिनेश प्रियमन ने भाग लिया। संवाद के दौरान आचार्य द्विवेदी के साहित्यिक अवदान और हिंदी भाषा को व्यवस्थित एवं परिमार्जित स्वरूप प्रदान करने में उनकी भूमिका को याद किया गया।

यात्रा का अगला पड़ाव पंडित रघुनंदन प्रसाद शर्मा का पैतृक आवास छिंटीखेड़ा रहा। यहां उनके परिजनों ने शर्मा जी से जुड़ी ऐतिहासिक वस्तुओं और स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने उनके संदूक, वाद्य यंत्र और ढोलक आदि का अवलोकन कराया तथा उनके जीवन से जुड़े संस्मरण सुनाए। इस पड़ाव ने प्रतिभागियों को साहित्यकार के निजी जीवन, रचनात्मक व्यक्तित्व और पारिवारिक स्मृतियों से परिचित होने का अवसर प्रदान किया।

इसके बाद बतरस परिवार सैदापुर स्थित एबीएस पब्लिक स्कूल पहुंचा, जहां ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं रघुनंदन प्रसाद शर्मा : विविध आयाम’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी की अध्यक्षता रमेश सिंह ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने बैसवाड़े की भाषा, उसकी विशिष्टता और क्षेत्र की रचनाधर्मिता पर प्रकाश डाला।

संगोष्ठी में वक्ता के रूप में डॉ. रामनरेश, डॉ. आदित्य अभिनव, डॉ. संजय जायसवाल, डॉ. पूजा गुप्ता, डॉ. प्रीति सिंह, दीप अमन और रुद्रकांत झा ने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने दोनों साहित्यकारों के साहित्यिक योगदान, वैचारिक दृष्टि और ज्ञान-परंपरा में उनकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।

वक्ताओं ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी की खड़ी बोली के परिमार्जन, व्याकरणिक अनुशासन और साहित्यिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर ज्ञान, संवेदना, नैतिकता और आधुनिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य किया। उनके संपादकीय दृष्टिकोण और साहित्यिक प्रयासों ने हिंदी साहित्य के आधुनिक विकास को दिशा प्रदान की।

इसी क्रम में पंडित रघुनंदन प्रसाद शर्मा के योगदान को रेखांकित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि अक्षर विज्ञान और वैदिक साहित्य के क्षेत्र में उनका लेखन विशेष महत्व रखता है। उनके कार्यों का अध्ययन भारतीय ज्ञान-परंपरा तथा भाषा और अक्षर संबंधी विमर्श को समझने की दृष्टि से उपयोगी है। संगोष्ठी में इस बात पर भी बल दिया गया कि ऐसे साहित्यकारों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उनके साहित्य का अध्ययन, दस्तावेजीकरण और व्यापक प्रचार-प्रसार आवश्यक है।

कार्यक्रम का संचालन सुरेश सिंह ने किया। वरिष्ठ गायक सतीश कुमार सिंह ने मधुर गीत प्रस्तुत कर वातावरण को साहित्यिक और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया। विद्यालय के प्रधानाचार्य अरुण कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

इस अवसर पर बतरस परिवार के डॉ. शैलेश प्रताप सिंह, डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, शिवेंद्र सिंह, राजकुमार श्रीवास्तव, दिलीप श्रीवास्तव, अभिषेक सिंह अंकुर, भूपेंद्र सिंह, डॉ. स्वाती सिन्हा, आकांक्षा आदित्य, अनुराग शुक्ल, अरुण कुमार, पूजा पाठक, अशोक सिंह, कृति बरनवाल, अंकुश, असित पांडेय, मंटू दास और हंसराज सहित सैकड़ों साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

बतरस 2026 के दूसरे दिन आयोजित इस साहित्यिक यात्रा और राष्ट्रीय संगोष्ठी ने क्षेत्रीय साहित्यिक विरासत को याद करने, साहित्यकारों के योगदान पर संवाद स्थापित करने तथा नई पीढ़ी को अपनी भाषा और साहित्यिक परंपरा से जोड़ने का संदेश दिया।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I