श्रावस्ती एनकाउंटर पर HC सख्त: ‘आरोपी के पैर में ही गोली कैसे?’ CBI जाँच के आदेश

श्रावस्ती एनकाउंटर पर इलाहाबाद HC सख्त। 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी, 15 मीटर से दोनों पैरों में गोली और FIR की विसंगतियों पर CBI जाँच के आदेश।

Aug 21, 2026 - 07:57
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श्रावस्ती एनकाउंटर पर HC सख्त: ‘आरोपी के पैर में ही गोली कैसे?’ CBI जाँच के आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच (फाइल फोटो)

पुलिस की गोली ठीक घुटने के नीचे कैसे लगती है? हाफ एनकाउंटर पर हाईकोर्ट हैरान, CBI जाँच के आदेश

लखनऊ/श्रावस्ती, 21 अगस्त 2026: उत्तर प्रदेश में कथित पुलिस मुठभेड़ों में आरोपियों के पैरों में गोली लगने की घटनाओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद गंभीर टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने श्रावस्ती में मई 2025 में हुए छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के कथित पुलिस एनकाउंटर की स्वतंत्र जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने पुलिस की कहानी में कई गंभीर विसंगतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर ऐसी एफआईआर सामने आती हैं, जिनमें पुलिस का दावा होता है कि गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की, लेकिन पुलिसकर्मियों को कोई चोट नहीं लगती और जवाबी कार्रवाई में पुलिस की गोली आरोपी के घुटने या उसके नीचे लग जाती है। अदालत ने इस प्रवृत्ति को गंभीर बताते हुए कहा कि सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं। मामले में हाईकोर्ट ने CBI को जाँच पूरी कर यथासंभव तीन माह के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार आदेश 13 अगस्त 2026 को छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में पारित हुआ।

पुलिस को एक छर्रा भी नहीं लगता, आरोपी के पैर में गोली कैसे लगती है?’

हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों के उस कथित पैटर्न पर चिंता जताई जिसमें पुलिसकर्मियों पर फायरिंग का दावा किया जाता है, लेकिन पुलिस टीम के किसी सदस्य को चोट नहीं लगती।

अदालत के अनुसार, कई मामलों में पुलिस की कहानी में यह सामने आता है कि आरोपी ने पुलिस टीम पर फायरिंग की, लेकिन पुलिसकर्मियों की वर्दी तक को एक छर्रा नहीं छूता। इसके बाद पुलिस की ओर से चलाई गई गोली आरोपी के घुटने या उससे नीचे लगती है। न्यायालय ने इस तरह की घटनाओं को महज संयोग मानने के बजाय स्वतंत्र जाँच की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने, आउट ऑफ टर्न प्रमोशन हासिल करने अथवा सोशल मीडिया पर प्रशंसा पाने के लिए आरोपियों के पैरों में गोली मारने की प्रवृत्ति यदि बढ़ रही है तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं

हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उसने पुलिस कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं को रेखांकित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी मानकर उसे सजा देना न्यायपालिका का अधिकार है। पुलिस का काम कानून के अनुसार गिरफ्तारी, जाँच और अभियोजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। यही कारण है कि न्यायालय ने कथित हाफ एनकाउंटरकी संस्कृति पर सवाल उठाते हुए मामले की जाँच उसी पुलिस तंत्र से हटाकर CBI को सौंपना उचित समझा।

12 मई 2025 की मुठभेड़ पर उठे सवाल

मामले की शुरुआत 9 मई 2025 को थाना इकौना में दर्ज उस FIR से हुई थी, जिसमें सात वर्षीय बच्ची के अपहरण का आरोप शफीक नामक व्यक्ति और दो अज्ञात लोगों पर लगाया गया था। शिकायतकर्ता ने शफीक को पकड़कर पुलिस के हवाले किए जाने की बात कही थी। इसके बाद पुलिस ने 12 मई 2025 को छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को मामले का मुख्य आरोपी बताते हुए उसे कथित मुठभेड़ में गिरफ्तार किए जाने की कहानी दर्ज की। पुलिस के अनुसार मुठभेड़ के दौरान आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी। उस मुठभेड़ को लेकर पुलिस की ओर से अलग FIR दर्ज की गई थी। इसी FIR और पुलिस की कार्रवाई की विश्वसनीयता को लेकर बाद में न्यायिक सवाल उठे।

एक सरकारी गाड़ी में 13 पुलिसकर्मी कोर्ट ने उठाया सवाल

मुठभेड़ से संबंधित FIR में तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे सहित पाँच उपनिरीक्षक, एक मुख्य आरक्षी और छह आरक्षियों कुल 13 पुलिसकर्मियों को एक ही सरकारी वाहन से गश्त पर दिखाया गया था। अदालत ने इस विवरण पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने व्यावहारिक दृष्टि से टिप्पणी की कि यदि वाहन कोई मिनी बस नहीं है तो सामान्य जीप या SUV में 13 पुलिसकर्मियों का बैठना मुश्किल है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुठभेड़ की पूरी पुलिस कहानी में घटनास्थल तक पुलिस टीम के पहुंचने और वहां मौजूद बल की भूमिका का विवरण महत्वपूर्ण साक्ष्य बन जाता है।

23 पुलिसकर्मी मौजूद, फिर भी किसी को चोट नहीं?

पुलिस के अनुसार सूचना मिलने के बाद SWAT टीम के 10 अन्य सदस्य भी आरोपी को घेरने में शामिल हुए। यानी पुलिस की कहानी के मुताबिक घटनास्थल पर कुल लगभग 23 पुलिसकर्मी मौजूद थे। हाईकोर्ट ने इसी तथ्य को लेकर सवाल उठाया कि यदि इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों ने एक ऐसे आरोपी को घेर रखा था, जिसके पास कथित रूप से केवल एक देसी तमंचा और दो कारतूस थे, तो पुलिस टीम को जवाबी फायरिंग करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और पुलिसकर्मियों में से किसी को चोट क्यों नहीं लगी।

अदालत ने पुलिस की कहानी के इस हिस्से की स्वतंत्र जाँच आवश्यक मानी।

15 मीटर की दूरी से दोनों पैरों में दो गोलियाँ!

अदालत के समक्ष पेश हुए तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे ने बताया कि उन्होंने करीब 15 मीटर की दूरी से 9 एमएम सर्विस पिस्टल से दो गोलियां चलाई थीं।

पुलिस अधिकारी के अनुसार दोनों गोलियां सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगीं।

यही दावा अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक बन गया। कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट तथा गोली के आकार से जुड़े विवरण में भी विसंगतियां पाईं और थाना प्रभारी की ओर से दी गई सफाई को विश्वसनीय नहीं माना। मामले की रिपोर्टिंग के अनुसार हाईकोर्ट ने विशेष रूप से CBI को यह जाँचने का निर्देश दिया है कि क्या थाना प्रभारी रात के अंधेरे में लगभग 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज के आधार पर 9 एमएम सर्विस पिस्टल से सटीक निशाना लगा सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट से बरी हो चुका था आरोपी

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन का पुराना आपराधिक मुकदमा है।

उसे पूर्व में छह वर्षीय बच्ची की हत्या और दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत से मृत्युदंड मिला था। हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस पृष्ठभूमि को भी गंभीरता से देखा और यह संभावना जताई कि कहीं पूर्व मामले में सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत के कारण पुलिस ने उसके खिलाफ कोई कहानी तो नहीं गढ़ी। हालांकि, यह केवल न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई आशंका है; इसकी वास्तविकता CBI जाँच के बाद ही सामने आएगी। उपलब्ध रिपोर्टों में सुप्रीम कोर्ट से बरी किए जाने की तारीख को लेकर अलग-अलग विवरण प्रकाशित हुए हैं, इसलिए अंतिम रिपोर्ट में इसे केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व मामले में बरीके रूप में रखना अधिक सुरक्षित है।

एनकाउंटर के बाद 23 पुलिसकर्मी हुए थे पुरस्कृत

अदालत ने इस तथ्य पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि कथित मुठभेड़ के बाद इसमें शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था।

अब जब न्यायालय ने मुठभेड़ की कहानी में प्रथम दृष्टया कई विसंगतियां पाई हैं और जाँच CBI को सौंप दी है, तो उन पुरस्कारों और मुठभेड़ की आधिकारिक कहानी की भी जाँच महत्वपूर्ण हो सकती है।

CBI करेगी पुलिस अधिकारी की शूटिंग क्षमता की जाँच

हाईकोर्ट ने CBI जाँच को केवल घटनास्थल और FIR की सत्यता तक सीमित नहीं रखा है। जाँच एजेंसी को तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता की भी जाँच करने को कहा गया है।

विशेष रूप से यह देखा जाना है कि क्या वह रात में लगभग 15 मीटर की दूरी से निशाना लगा सकते थे? क्या केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज से वह आरोपी की स्थिति का अनुमान लगा सकते थे? क्या 9 एमएम सर्विस पिस्टल से दोनों पैरों पर इस तरह सटीक निशाना लगाना परिस्थितियों में संभव था? मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस की कहानी में गोली के आकार से संबंधित अंतर का वास्तविक कारण क्या था? मुठभेड़ से संबंधित FIR में दर्ज घटनाक्रम वास्तविक था या उसमें कोई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया अथवा बदला गया?

CBI को तीन महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने CBI निदेशक को सक्षम अधिकारियों की टीम गठित कर मामले की स्वतंत्र जाँच कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने जाँच यथासंभव तीन महीने में पूरी कर रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले में ट्रायल कोर्ट के 2 जुलाई 2026 के आदेश के संचालन पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगाई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।

अब CBI जाँच पर टिकी नजर

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। हालांकि अदालत ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि श्रावस्ती की घटना फर्जी मुठभेड़ थी, लेकिन पुलिस की कहानी में प्रथम दृष्टया सामने आई विसंगतियों को देखते हुए स्वतंत्र जाँच जरूरी मानी गई है। अब CBI की जाँच यह तय करेगी कि 12 मई 2025 की घटना वास्तव में पुलिस द्वारा बताए गए घटनाक्रम के अनुसार हुई थी या नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने जाँच को पुलिस विभाग से बाहर की स्वतंत्र एजेंसी को सौंपते हुए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि मुठभेड़ की वास्तविकता का परीक्षण उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल रिकॉर्ड, बैलिस्टिक तथ्यों, पुलिसकर्मियों के बयानों और घटनास्थल के वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर किया जाए।

न्यायालय की टिप्पणियाँ अभी न्यायिक जाँच की प्रक्रिया का हिस्सा हैं; CBI की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही मुठभेड़ की वास्तविक परिस्थितियों पर अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा।

 

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I