जो भी पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी के नियमों का उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को आगाह किया है कि गिरफ्तारी से जुड़े नियमों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं होगा। कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि कानून के अंतर्गत अपराधी को भी गरिमापूर्ण व्यवहार मिलना चाहिए; उल्लंघन करने वाले अधिकारी पर कड़ी कार्रवाई होगी।
सर्वोच्च न्यायालय, नयी दिल्ली: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह व जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि कानून के अनुसार अपराधी को भी गरिमापूर्ण व्यवहार मिलना चाहिए और आम आदमी अपनी सीमाएँ पार कर सकता है, लेकिन पुलिस ऐसा नहीं कर सकती। कोर्ट ने पुलिस को भविष्य में सतर्क रहने की हिदायत दी और कहा है कि वरिष्ठ अधिकारियों के पास अधीनस्थों की किसी भी अधिकार-उल्लंघन की स्थिति में ‘जीरो टॉलरेंस’ होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की प्रति सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (DGP) एवं दिल्ली के पुलिस आयुक्त को भेजने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि हिरासत में लिए गए लोगों के लिए उपलब्ध सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन सुनिश्चित हो सके। निर्देश में पुलिस चेकलिस्ट की ‘यांत्रिक’ पूर्ति पर भी आपत्ति जताई गई है और कहा गया है कि भविष्य में ऐसी त्रुटि फिर नहीं दोहराई जाएगी। अदालत ने बताया कि यदि फिर भी कोई उल्लंघन हुआ, तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ बहुत ‘सख्त’ नजरिया अपनाया जाएगा तथा कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
गिरफ्तारी से जुड़े नियम
नए आदेश में दिए गए परिवेश के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े प्रमुख नियमों की भी याद दिलाई है। अदालत ने विशेष रूप से अरनेश कुमार बनाम बिहार (2014) के दिशा-निर्देशों को लागू करने पर ज़ोर दिया है, जिसमें पुलिस को गैर-जमानती अपराधों (विशेषकर 7 साल तक की सजा वाले अपराधों) में ‘स्वतः गिरफ्तारी’ से बचने को कहा गया था।
अरनेश कुमार निर्देशों के तहत पुलिस अधिकारी निम्नलिखित बातों का पालन करेंगे:
गिरफ्तारी की आवश्यकता की समीक्षा: पुलिस को गिरफ्तारी करने से पहले स्वयं सुनिश्चित करना होगा कि अपराध के पर्याप्त सबूत या शिकायत मौजूद हैं। विशेष रूप से 498A जैसी धाराओं में पुलिस को स्वतः गिरफ्तारी नहीं करनी चाहिए, बल्कि धारा 41 CrPC के तहत गिरफ्तारी की वैधता की जाँच करना जरूरी है।
चेकलिस्ट भरना: पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी के समय एक चेक-लिस्ट भरनी होती है, जिसमें आरोपी की गिरफ्तारी के सभी कारण और औपचारिकताएँ अंकित की जाएँगी। यह चेक-लिस्ट आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करते समय पुलिस को सौंपनी होती है, ताकि अदालत यह तय कर सके कि गिरफ्तारी कानूनन उचित थी या नहीं।
41A नोटिस का प्रावधान: यदि पुलिस गिरफ्तारी नहीं करती है तो आरोपी को धारा 41A CrPC के तहत नोटिस जारी करना होगा। गिरफ्तारी न करने या नोटिस जारी करने का निर्णय दो सप्ताह के भीतर मजिस्ट्रेट को लिखित रूप में भेजना अनिवार्य है। इस दौरान अभियुक्त की जांच सहयोगी रही है या नहीं, इसका विवरण भी अदालत को देना होता है।
नियमों का उल्लंघन निषेध: अगर पुलिस अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो वे विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ अदालत में अवमानना (Contempt) का सामना कर सकते हैं। संबंधित मजिस्ट्रेट भी बिना उचित कारण रिमांड मंजूर करने पर उच्च न्यायालय द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि गिरफ्तारी को इच्छानुसार नहीं, बल्कि सख्त कानूनी मानदंडों के अनुसार ही अंजाम दिया जाना चाहिए। पुलिस के साथ-साथ अदालतों को भी चेक-लिस्ट और अन्य दस्तावेजों को औपचारिकता से भरने के बजाय संजीदगी से जाँचने की जिम्मेदारी दी गई है।
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