आगरा के पुलिस कमिश्नर की अनुपस्थिति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार की हाजिरी माफी खारिज की। अनभिज्ञ अधिकारियों को कोर्ट भेजने पर नाराजगी जताई और 8 सितंबर को व्यक्तिगत पेशी का आदेश दिया।

Aug 21, 2026 - 07:00
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आगरा के पुलिस कमिश्नर की अनुपस्थिति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त
आगरा के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार

प्रयागराज, 20 अगस्त 2026इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार की अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति से बचने के प्रयास पर कड़ा रुख अपनाते हुए उनकी हाजिरी माफी की अर्जी खारिज कर दी है। न्यायालय ने उन्हें एक और अवसर देते हुए अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने को कहा है कि अदालत के निर्देश के बावजूद संबंधित मामले में रिपोर्ट दाखिल करने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई और उनकी जगह ऐसे अधिकारियों को अदालत क्यों भेजा गया, जिन्हें मामले के तथ्यों की जानकारी ही नहीं थी। यह आदेश न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की पीठ ने श्याम बाबू एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से संबंधित मामले में 17 अगस्त 2026 को पारित किया। आदेश में अगली सुनवाई की तारीख 8 सितंबर 2026 निर्धारित की गई है।

लगभग एक वर्ष की देरी पर मांगा गया था स्पष्टीकरण

मामले में हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में रिपोर्ट दाखिल करने में लगभग एक वर्ष की देरी होने पर अदालत ने आगरा के पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने आचरण और देरी के संबंध में स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया था। हालांकि, पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने स्वयं अदालत में उपस्थित होने के बजाय एक पत्र के माध्यम से अपनी अनुपस्थिति का कारण बताते हुए हाजिरी माफी/Exemption Application प्रस्तुत की। अदालत ने इस आवेदन को इस स्तर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया और पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का एक और अवसर दिया।

कमिश्नर की जगह पहुंचे अधिकारी, लेकिन केस की जानकारी नहीं थी

पुलिस कमिश्नर की ओर से अदालत में सहायता के लिए अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर आगरा शचींद्र पटेल तथा एसीपी गौरव सिंह सहित अन्य पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी रही। अदालत ने जब अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर शचींद्र पटेल से पूछा कि क्या वह मामले के तथ्यों से पूरी तरह परिचित हैं अथवा कभी इस मामले से जुड़े रहे हैं, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि उन्हें मामले के तथ्यों की जानकारी नहीं है और आगरा में अपनी तैनाती के दौरान वह इस मामले से जुड़े भी नहीं रहे। इसी प्रकार एसीपी गौरव सिंह ने भी अदालत को बताया कि वह मामले के तथ्यों से पूरी तरह अवगत नहीं हैं और किसी भी समय इस मामले से जुड़े नहीं रहे।

अधिकारियों की पूरी फौजभेजने पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इन अधिकारियों के जवाब के बाद हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने सवाल उठाया कि जब अधिकारियों को मामले की जानकारी ही नहीं थी और वे कभी इस मामले से जुड़े भी नहीं रहे, तो इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों को अदालत में भेजने का औचित्य क्या था। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर, सहायक पुलिस कमिश्नर, इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर और अन्य कांस्टेबलों को अदालत में भेजना, जबकि वे मामले से पूरी तरह अनभिज्ञ हों, राज्य मशीनरी का अनुचित उपयोग और अनावश्यक कवायद है।

हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को प्रभावहीन बताते हुए कहा कि ऐसे अधिकारियों को अदालत भेजने से कोई उपयोगी परिणाम नहीं निकला और उन्होंने अदालत की कोई सहायता नहीं की।

प्रयागराज आने का TA/DA भी नहीं मिलेगा

अदालत ने इस मामले में एक असाधारण रूप से स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि जो अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए लेकिन अदालत को कोई सहायता प्रदान नहीं कर सके, वे प्रयागराज आने के लिए यात्रा भत्ता (T.A.), दैनिक भत्ता (D.A.) अथवा अन्य उपलब्ध सरकारी सुविधा का दावा नहीं कर सकेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रयागराज की यह यात्रा उनके लिए रूटीन ड्यूटी मानी जाएगी। यह टिप्पणी सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर अदालत की गंभीर चिंता को दर्शाती है। न्यायालय ने संकेत दिया कि केवल औपचारिक उपस्थिति के लिए बड़ी संख्या में अधिकारियों को अदालत भेजना उचित प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।

अगली बार भी अनुपस्थिति हुई तो DGP को बुला सकता है कोर्ट

हाईकोर्ट ने आगरा के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण देने का एक और अवसर दिया है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अगली सुनवाई पर भी पुलिस कमिश्नर आगरा उपस्थित नहीं होते हैं, तो न्यायालय को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को अदालत की सहायता के लिए बुलाने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है। इससे स्पष्ट है कि अदालत अब मामले में पुलिस प्रशासन की ओर से औपचारिक प्रतिनिधित्व के बजाय ऐसे अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही चाहती है, जो संबंधित मामले और अदालत के पूर्व निर्देशों से वास्तविक रूप से परिचित हो।

8 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

राज्य की ओर से उपस्थित अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने का विशेष अनुरोध किया था। इसके बाद न्यायालय ने मामले को 8 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई में मुख्य रूप से यह महत्वपूर्ण होगा कि आगरा के पुलिस कमिश्नर अदालत में उपस्थित होकर रिपोर्ट दाखिल करने में हुई देरी और अपने स्थान पर अन्य अधिकारियों को भेजे जाने के संबंध में क्या स्पष्टीकरण देते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायालय के समक्ष सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही, सरकारी संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और अदालत को प्रभावी सहायता उपलब्ध कराने की प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करता है। कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि केवल अधिकारियों की संख्या बढ़ाकर अदालत में उपस्थिति दर्ज कराना पर्याप्त नहीं है; संबंधित अधिकारी को मामले के तथ्यों की वास्तविक जानकारी और न्यायालय की सहायता करने की क्षमता भी होनी चाहिए।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I