बारात का शास्त्रार्थ: विवाह की खोती हुई सांस्कृतिक गरिमा
भारतीय विवाह में कभी शास्त्रार्थ और सांस्कृतिक संवाद की परंपरा थी। आज की त्वरित और उपभोक्तावादी शादियों के संदर्भ में उस खोती हुई सांस्कृतिक गरिमा पर एक गंभीर विचार।
भारतीय समाज में विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं रहा, वह एक सांस्कृतिक अनुष्ठान, एक बौद्धिक पर्व और सामुदायिक उत्सव था। आज जब शादियाँ कुछ घंटों के ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में सिमट चुकी हैं, तब यह स्मरण करना जरूरी है कि कभी बारातें केवल ढोल-ताशों और नाच-गाने की मंडलियाँ नहीं होती थीं; वे विचार, विद्या और संवाद की चलती-फिरती सभाएँ भी होती थीं।
शास्त्रार्थ: विवाह का बौद्धिक आयाम
विवाह में शिष्टाचार के बाद होने वाला शास्त्रार्थ केवल औपचारिक वाद-विवाद नहीं था, बल्कि दो पक्षों की विद्वत्ता और सांस्कृतिक चेतना का सार्वजनिक प्रदर्शन था। कन्या पक्ष के पुरोहित द्वारा संस्कृत के श्लोकों से बारात का स्वागत “पायसा कमलेन पयः...” केवल काव्यात्मक विनम्रता नहीं थी; वह यह उद्घोष था कि विवाह दो पक्षों के परस्पर सम्मान और बौद्धिक समता का उत्सव है। वर पक्ष का उत्तर “दूरे विश्रुत्वा भवदीय कीर्तिम्…” उस परंपरा की गरिमा को पुष्ट करता था, जिसमें संवाद प्रतिस्पर्धा नहीं, परस्पर प्रशंसा का माध्यम था। यह शास्त्रार्थ प्राचीन भारतीय परंपरा की उस धारा से जुड़ा था, जहाँ विद्वानों के बीच वाद-विवाद ज्ञान-विस्तार का साधन था। संस्कृत साहित्य में वर्णित कालिदास और विद्योत्तमा की कथा भले ही लोकगाथा हो, पर वह इस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है कि विवाह बौद्धिक समता और संवाद का क्षेत्र भी हो सकता है।
जनवासा: सामाजिक समागम का विश्वविद्यालय
जनवासा केवल ठहरने का स्थान नहीं था। वह अस्थायी 'लोक विश्वविद्यालय' था। वहाँ वर और कन्या पक्ष आमने-सामने बैठते, परिचय होता, फिर शिष्टाचार और शास्त्रार्थ की प्रक्रिया चलती। प्रश्न पूछे जाते “न्यायशास्त्रे कति पदार्थाः सन्ति?” और उत्तर दिए जाते। यह सब भले ही गिने-चुने विद्वानों को समझ में आता हो, पर उसका प्रतीकात्मक महत्व विशाल था। यह परंपरा हमें स्मरण कराती है कि भारतीय समाज में ज्ञान और उत्सव अलग-अलग खानों में विभाजित नहीं थे। यहाँ विवाह में भी शास्त्र था, और शास्त्र में भी उत्सव का भाव था।
मनोरंजन और लोक-संस्कृति का समावेश
शास्त्रार्थ के बाद मनोरंजन की बारी आती। नौटंकी, लोकनृत्य, जातीय संगीत हर समुदाय की अपनी विशिष्ट कला होती। यहाँ केवल ब्राह्मणिक शास्त्र नहीं, बल्कि लोकजीवन की विविधता भी उपस्थित रहती। प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी रचनाओं में धोबी के नृत्य का उल्लेख किया है। यह संकेत है कि विवाह में शास्त्र और लोक, दोनों का संतुलन था। यह संतुलन भारतीय समाज की विशेषता था, जहाँ संस्कृत के श्लोक और लोकगीत एक ही मंच पर सह-अस्तित्व में रहते थे।
आज का परिदृश्य: त्वरित विवाह, त्वरित संस्कृति
समय बदला। जीवन की गति तेज हुई। आर्थिक संरचनाएँ बदलीं। आज विवाह ‘इवेंट’ बन गया है- डेस्टिनेशन वेडिंग, थीम डेकोर, डीजे नाइट, और सोशल मीडिया रील्स। अब शिष्टाचार की जगह “रिसेप्शन लाइन” ने ले ली है। शास्त्रार्थ की जगह डीजे की धुन है। जनवासा की जगह होटल के कमरे हैं। दो रात और एक दिन का सामुदायिक ठहराव अब कुछ घंटों की औपचारिकता में बदल गया है।
सांस्कृतिक क्षरण या स्वाभाविक विकास?
यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या हर परिवर्तन को क्षरण कहा जाए? क्या आधुनिकता का अर्थ परंपराओं का अंत है? निश्चित ही समाज स्थिर नहीं रहता। परंतु प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी उन परंपराओं को बचा पा रहे हैं, जिनमें सामुदायिक संवाद, बौद्धिक विनम्रता और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान था? शास्त्रार्थ की परंपरा भले ही सीमित वर्ग तक रही हो, पर वह विवाह को केवल जैविक-सामाजिक घटना से ऊपर उठाकर बौद्धिक अनुष्ठान बनाती थी। आज उस आयाम का अभाव विवाह को अधिक उपभोगवादी और कम संवादपरक बना रहा है।
पुनर्स्मरण की आवश्यकता
हम अतीत में लौट नहीं सकते, पर उससे सीख अवश्य ले सकते हैं। क्यों न आधुनिक विवाहों में भी कोई सांस्कृतिक सत्र रखा जाए, जहाँ दोनों परिवारों के युवा अपने विचार, कविता या ज्ञान का आदान-प्रदान करें? क्यों न लोकनृत्य और शास्त्रीय प्रस्तुति को डीजे के साथ संतुलित किया जाए?
विवाह को केवल खर्च और प्रदर्शन का मंच न बनाकर, उसे पुनः संवाद और सांस्कृतिक साझेदारी का अवसर बनाया जा सकता है। बारात का शास्त्रार्थ केवल एक परंपरा नहीं था; वह भारतीय समाज की उस चेतना का प्रतीक था, जिसमें ज्ञान और उत्सव, दोनों का संगम था। आज जब विवाह का सांस्कृतिक स्वरूप सिकुड़ता जा रहा है, तब उस परंपरा को याद करना केवल अतीत का रोमान नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए चेतावनी है। यदि हम अपने उत्सवों से संवाद और बौद्धिकता को हटाते रहेंगे, तो वे केवल दृश्य-उत्सव बनकर रह जाएँगे- गहराई विहीन, स्मृति विहीन। विवाह फिर से वह मंच बन सकता है, जहाँ जल और कमल की तरह दोनों पक्ष एक-दूसरे की शोभा बनें। “भवता च सभा समया च भवान्…” यही भारतीय संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य है।
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