सूचना आयोग या सूचना का अवरोध? आरटीआई सुनवाई पर उठे सवालों के बीच मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा और आयुक्त राकेश कुमार कटघरे में

उत्तर प्रदेश सूचना आयोग, जिसे सूचना के अधिकार की अंतिम उम्मीद माना जाता है, आज खुद सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा और सूचना आयुक्त राकेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर कई शिकायतें सामने आई हैं। Jagotv पोर्टल पर प्रकाशित खबरों और दस्तावेजों में आरोप लगाया गया है कि आयोग में सुनवाई की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और शिकायतकर्ताओं की आपत्तियों को आदेशों में नजरअंदाज किया जा रहा है।

Mar 9, 2026 - 12:18
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सूचना आयोग या सूचना का अवरोध? आरटीआई सुनवाई पर उठे सवालों के बीच मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा और आयुक्त राकेश कुमार कटघरे में
मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा और आयुक्त राकेश कुमार

आदेशों में गायब आपत्तियाँ, सुनवाई प्रक्रिया पर विवाद और पारदर्शिता पर उठे प्रश्न -उत्तर प्रदेश सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर गहराते सवाल

लखनऊ / प्रयागराज। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता का सबसे शक्तिशाली औजार माना जाता है। लेकिन जब इसी कानून की रक्षा के लिए स्थापित संस्था सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर ही गंभीर सवाल उठने लगें, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में लंबित एक आरटीआई प्रकरण ने इसी प्रकार की बहस को जन्म दे दिया है। शिकायत संख्या S-10-391/C/2022 (पंजीकरण संख्या C-226455) से जुड़े दस्तावेजों और शिकायतकर्ता द्वारा आयोग को भेजे गए आपत्ति पत्रों में आरोप लगाया गया है कि सुनवाई के दौरान प्रस्तुत महत्वपूर्ण आपत्तियों और विधिक तर्कों को आयोग के आदेश में शामिल नहीं किया गया। यह मामला अब केवल एक आरटीआई विवाद नहीं, बल्कि सूचना आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी पारदर्शिता पर उठते सवालों का प्रतीक बनता जा रहा है।

आदेशों में गायब आपत्तियाँ

प्रयागराज निवासी शिकायतकर्ता रवि शंकर का आरोप है कि उन्होंने सुनवाई से पहले आयोग को ई-मेल के माध्यम से विस्तृत आपत्ति पत्र भेजा था, जिसमें कई तथ्यात्मक और विधिक बिंदु उठाए गए थे। लेकिन आयोग द्वारा पारित अंतरिम आदेश में इन बिंदुओं का समुचित उल्लेख तक नहीं किया गया। यह आरोप इसलिए गंभीर है क्योंकि सूचना आयोग एक अर्ध-न्यायिक संस्था है, जिसका दायित्व होता है कि वह पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत सभी तर्कों और साक्ष्यों का परीक्षण करे और फिर निर्णय दे। यदि आदेश में ही आपत्तियों का उल्लेख न हो, तो यह स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या सुनवाई वास्तव में निष्पक्ष और पूर्णत: पारदर्शी तरीके से हुई।

सुनवाई प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सुनवाई की प्रक्रिया से जुड़ा है। दस्तावेजों के अनुसार सुनवाई में व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर दिया गया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के बाद कई संस्थाओं में ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था भी अपनाई जा चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सूचना आयोग आधुनिक न्यायिक प्रक्रियाओं और तकनीकी विकल्पों को अपनाने में पीछे रह गया है या फिर यह व्यवस्था जानबूझकर सीमित रखी जा रही है।

आरटीआई कानून की भावना पर प्रश्न

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि आयोग के कुछ आदेशों में आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(d) के अनुरूप कारणों और तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। यह धारा प्रशासनिक निर्णयों के पीछे के कारणों को सार्वजनिक करने की बात करती है, ताकि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। यदि आदेशों में कारण और तथ्य स्पष्ट न हों, तो पारदर्शिता की मूल अवधारणा ही कमजोर पड़ जाती है।

दूसरे सुनवाई कक्ष में स्थानांतरण की माँग

लगातार उठ रही आपत्तियों के बीच शिकायतकर्ता रवि शंकर ने आयोग से यह माँग भी की है कि उनके मामलों को किसी अन्य सुनवाई कक्ष में स्थानांतरित किया जाए। उनका कहना है कि यदि उनकी आपत्तियों और साक्ष्यों को लगातार अनदेखा किया जा रहा है, तो निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद करना कठिन हो जाता है।

अब सीधे सवाल सूचना आयोग की शीर्ष कुर्सियों पर

इस पूरे विवाद ने अब सीधे उत्तर प्रदेश सूचना आयोग की शीर्ष नेतृत्व व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा, जो पूर्व डीजीपी रह चुके हैं, वर्तमान में आयोग के सर्वोच्च पद पर हैं। उनके साथ सूचना आयुक्त राकेश कुमार सहित अन्य आयुक्त आयोग की विभिन्न पीठों में मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। लेकिन हाल के समय में आयोग की सुनवाई और आदेशों को लेकर उठ रही शिकायतों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे अहम सवाल यह हैं:

·         क्या मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रभावी निगरानी रख पा रहे हैं?

·         क्या सूचना आयुक्त राकेश कुमार के कक्ष में होने वाली सुनवाई पूरी तरह पारदर्शी और न्यायसंगत है?

·         क्या शिकायतकर्ताओं की आपत्तियों और साक्ष्यों को व्यवस्थित तरीके से रिकॉर्ड कर उनका विश्लेषण किया जा रहा है?

यदि इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं मिलते, तो सूचना आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

आरटीआई कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की चिंता

आरटीआई कार्यकर्ता अजय कुमार, त्रिनेत्रकांत, तरुण वर्मा, राजसार्थक शर्मा और अभिषेक रावत का कहना है कि सूचना आयोग लोकतंत्र में नागरिकों का अंतिम मंच होता है।

प्रशासनिक कानून के जानकार सुशील कुमार पाण्डेय और विनीत रुइया का मानना है कि यदि आयोग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठने लगें, तो यह केवल एक संस्था का संकट नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों के कमजोर होने का संकेत भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना आयोग को पारदर्शिता और जवाबदेही का सर्वोच्च उदाहरण बनना चाहिए, क्योंकि वही संस्था नागरिकों को सूचना दिलाने की अंतिम संवैधानिक व्यवस्था है।

Jagotv की पड़ताल में उभरे सवाल

Jagotv की पड़ताल में सामने आया है कि सूचना आयोग से जुड़े कई मामलों में शिकायतकर्ताओं ने सुनवाई प्रक्रिया, आदेशों की पारदर्शिता और आपत्तियों के निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। यदि सूचना आयोग स्वयं ही पारदर्शिता के मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नागरिकों को सूचना दिलाने की जिम्मेदारी आखिर किस तरह निभाई जाएगी।

अब जवाबदेही का समय

उत्तर प्रदेश सूचना आयोग से जुड़ा यह विवाद अब केवल एक आरटीआई सुनवाई तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल बन गया है कि क्या सूचना आयोग वास्तव में सूचना के अधिकार की रक्षा कर रहा है या फिर खुद ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा और सूचना आयुक्त राकेश कुमार इन आरोपों और उठते सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सूचना केवल अधिकार नहीं, जवाबदेही का आधार भी होती है।

 

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