यूपी पुलिस की जाँच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 6 साल जेल में रहे व्यक्ति को 6 लाख मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की लापरवाहीपूर्ण जाँच पर गंभीर सवाल उठाते हुए अपहरण-हत्या के मामले में करीब छह वर्ष जेल में रहे और बाद में बरी हुए अरुण उर्फ दीपक को छह लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने सीसीटीवी, फॉरेंसिक साक्ष्य और अभियोजन की खामियों का उल्लेख करते हुए पुलिस अधिकारियों को उचित जाँच का प्रशिक्षण देने की सलाह दी।
यूपी पुलिस की जाँच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 6 साल जेल में रहे व्यक्ति को 6 लाख मुआवजा
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश पुलिस की विवेचना में गंभीर खामियों पर सख्त टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को एक ऐसे व्यक्ति को छह लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिसे अपहरण और हत्या के एक मामले में करीब छह वर्ष तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना पड़ा। मुकदमे की सुनवाई के बाद वह बरी हो गया था। अदालत ने कहा कि लापरवाहीपूर्ण जाँच और कमजोर अभियोजन किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन को गंभीर खतरे में डाल सकते हैं। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को जाँच की सही प्रक्रिया का प्रशिक्षण देने की भी सलाह दी है।
26 अक्तूबर 2026 को दिए गए फैसले में न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने राज्य की जाँच और अभियोजन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस और अभियोजन एजेंसियों का उद्देश्य किसी भी तरह दोषसिद्धि हासिल करना नहीं, बल्कि पीड़ित और आरोपी सहित सभी संबंधित पक्षों के लिए न्याय सुनिश्चित करना है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला आगरा जिले के अछनेरा थाने में अक्तूबर 2019 में दर्ज अपहरण और हत्या के मुकदमे से संबंधित है। याचिकाकर्ता अरुण उर्फ दीपक को 14 नवंबर 2019 से न्यायिक हिरासत में रखा गया था। वह प्रारंभिक एफआईआर में नामजद नहीं था और शिकायतकर्ता के शुरुआती पुलिस बयान में भी उसका नाम नहीं था। पुलिस ने बाद में सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के कथित इकबालिया बयान के आधार पर उसे मामले से जोड़ा। हालांकि, अभियोजन पक्ष मुकदमे के दौरान आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। अंततः विचारण अदालत ने उसे बरी कर दिया।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए विचारण अदालत को तीन महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा करने का निर्देश दिया था। मुकदमे में बरी होने के बाद शीर्ष अदालत ने विचारण अदालत के फैसले और अभियोजन के साक्ष्यों की समीक्षा की।
जाँच और साक्ष्यों में मिलीं गंभीर खामियाँ
विचारण अदालत के फैसले का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जाँच की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, अभियोजन ने जिन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने की कोशिश की, उन्हें प्रमाणित नहीं किया जा सका।
सीसीटीवी फुटेज की विश्वसनीयता पर सवाल: पुलिस ने आरोपी को कथित सीसीटीवी फुटेज के आधार पर मामले से जोड़ा था। अदालत ने पाया कि फुटेज स्पष्ट नहीं था और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड से संबंधित साक्ष्यों में भी वैधानिक प्रमाणन की कमी सामने आई।
बरामद हड्डियों की पहचान प्रमाणित नहीं: जाँच में जली हुई हड्डियाँ मिलने का दावा किया गया था, लेकिन यह निर्णायक रूप से साबित नहीं किया गया कि वे लापता व्यक्ति की ही थीं। अदालत के समक्ष मृतक के पिता के डीएनए नमूने से मिलान का विश्वसनीय परिणाम भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
कथित फिरौती के दावे पर भी सवाल: अभियोजन की कहानी में फिरौती मांगने का आरोप शामिल था, लेकिन अदालत ने इस दावे को साबित करने वाले विश्वसनीय साक्ष्यों की कमी पर सवाल उठाए। आरोपी की पहचान और कथित अपराध से उसके संबंध को स्थापित करने वाली परिस्थितियाँ भी पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं हुईं।
अदालत ने जाँच को लापरवाहीपूर्ण और अभियोजन को अव्यवस्थित बताते हुए कहा कि इस मामले में बुनियादी जाँच-पड़ताल तक उचित ढंग से नहीं की गई।
छह साल की कैद के लिए राज्य देगा छह लाख रुपये
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल अनुमानों और अप्रमाणित कहानी के आधार पर वर्षों तक जेल में रखना गंभीर अन्याय है। आरोपी को लगभग छह वर्ष तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना पड़ा, जबकि अभियोजन उसके विरुद्ध आरोपों को साबित नहीं कर सका।
डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा फैसले का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया। अदालत ने राज्य पुलिस को विवेचना की प्रक्रिया के संबंध में अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की सलाह दी, ताकि भविष्य में ऐसी गंभीर चूक की पुनरावृत्ति न हो।
शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष मानने का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। जाँच और अभियोजन एजेंसियों को केवल आरोपियों को सजा दिलाने पर केंद्रित रहने के बजाय निष्पक्षता, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
पुलिस जाँच की जवाबदेही पर बड़ा सवाल
यह फैसला केवल एक व्यक्ति को मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। यह पुलिस विवेचना की गुणवत्ता, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के वैधानिक प्रमाणीकरण, फॉरेंसिक जाँच और अभियोजन की जिम्मेदारी पर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तारी अपने आप में दोष का प्रमाण नहीं होती। जाँच में प्रत्येक आरोप को विश्वसनीय साक्ष्यों से जोड़ना और अदालत के समक्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक है। यदि विवेचना की खामियों के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रहना पड़े, तो उसके जीवन, परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ने वाले प्रभाव की भरपाई केवल आर्थिक मुआवजे से पूरी नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पुलिस व्यवस्था में पेशेवर प्रशिक्षण, निष्पक्ष जाँच और जवाबदेही को मजबूत करने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
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