शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में राहुल सांकृत्यायन के यायावर जीवन और समकालीन वैचारिक चुनौतियों पर गहन चर्चा

शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में राहुल सांकृत्यायन के यायावर जीवन, ज्ञान के लोकतंत्रीकरण और समकालीन वैचारिक चुनौतियों पर गहन चर्चा हुई।

Apr 11, 2026 - 15:14
Apr 11, 2026 - 15:51
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शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में राहुल सांकृत्यायन के यायावर जीवन और समकालीन वैचारिक चुनौतियों पर गहन चर्चा
शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी के वक्तागण

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की 133वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में विद्वानों ने यायावर ज्ञान-दर्शन, साहित्यिक चेतना और समकालीन समाज के अंतर्विरोधों पर किया मंथन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की 133वीं जयंती के उपलक्ष्य में शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा एक गरिमामयी राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आभासीय मंच जूम पर जुड़े विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह संगोष्ठी न केवल एक स्मरण-आयोजन थी, बल्कि विचार, विमर्श और बौद्धिक संवाद का एक सशक्त मंच भी सिद्ध हुई।

कार्यक्रम का संचालन गायत्री उपाध्याय (शोधार्थी, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर) द्वारा किया गया। उन्होंने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा प्रारंभ में सभी से तकनीकी अनुशासन माइक म्यूट रखने एवं वक्ताओं के लिए वीडियो ऑन रखने का अनुरोध किया।

शब्दभूमि प्रकाशन का परिचय और उद्देश्य

संचालिका ने अपने संबोधन में शब्दभूमि प्रकाशन का परिचय देते हुए कहा कि यह केवल एक व्यावसायिक प्रकाशन गृह नहीं, बल्कि साहित्यकारों का एक सहकारी मंच है, जहाँ रचनाकार अपनी कृतियों को गरिमा, गुणवत्ता और समयबद्धता के साथ प्रकाशित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह संस्था कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण, शोध एवं वैचारिक लेखन जैसी विविध विधाओं को प्रोत्साहित करती है और नए व स्थापित दोनों प्रकार के लेखकों को समान अवसर प्रदान करती है। भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा को संरक्षित और विकसित करना भी संस्था का प्रमुख लक्ष्य है। साथ ही, प्रकाशन से जुड़े तकनीकी पक्ष जैसे डिज़ाइन, टंकण और संपादन में दक्ष टीम द्वारा पुस्तक निर्माण को व्यवस्थित रूप से संपन्न किया जाता है।

संगोष्ठी का विषय और बौद्धिक परिप्रेक्ष्य

संगोष्ठी का मुख्य विषय था राहुल सांकृत्यायन का ‘बौद्धिक साहस’ और आज की वैचारिक ध्रुवीकरण की राजनीति’ यह विषय आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ समाज विभिन्न वैचारिक खांचों में विभाजित होता जा रहा है। ऐसे दौर में राहुल सांकृत्यायन का ज्ञान-दर्शन, तर्कशीलता और यायावर दृष्टि एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आती है।

राहुल सांकृत्यायन: जीवन, व्यक्तित्व और योगदान

राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल 1893 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जनपद के पंदहा गाँव में हुआ था। वे हिन्दी यात्रा साहित्य के पितामह, महान बहुभाषाविद, इतिहासविद, बौद्ध धर्म के शोधकर्ता और एक अद्भुत यायावर थे। उनका जीवन केवल भौगोलिक यात्राओं तक सीमित नहीं था, बल्कि वह ज्ञान, संस्कृति और चेतना की निरंतर खोज का जीवन था। उन्होंने तिब्बत, श्रीलंका, मध्य एशिया और यूरोप तक की यात्राएँ कीं और उन अनुभवों को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया। उनकी प्रमुख कृतियाँ तिब्बत में सवा वर्ष, लद्दाख यात्रा, मेरी यूरोप यात्रा आदि केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। राहुल सांकृत्यायन ने लगभग 150 से अधिक ग्रंथों की रचना की और हजारों लेखों एवं निबंधों के माध्यम से ज्ञान का विस्तार किया। उन्हें 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1963 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

वक्ताओं के विचार और विमर्श के प्रमुख बिंदु

संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों से जुड़े वक्ताओं ने अपने-अपने शोधपत्र और विचार प्रस्तुत किए:

  • अमन कुमार (झारखंड) ने यायावर ज्ञान-दर्शन के माध्यम से समकालीन मनुष्य की त्रासदी का विश्लेषण किया।
  • आशीष अम्बर (बिहार) ने राहुल सांकृत्यायन के ज्ञान के लोकतंत्रीकरण पर जोर दिया।
  • सेठी आशा दीनबंधु (गुजरात) ने उनके यायावरी दृष्टिकोण को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा।
  • राहुल भिवा हातागले (महाराष्ट्र) ने आधुनिक मनुष्य की विडंबनाओं को राहुल के दृष्टिकोण से देखा।

डॉ. सुमन रानी का विशेष वक्तव्य

डॉ. सुमन रानी (हरियाणा) ने अपने विचार रखते हुए कहा कि राहुल सांकृत्यायन का यात्रा साहित्य केवल पढ़ने का विषय नहीं, बल्कि ‘जीने’ का अनुभव है। उन्होंने कहा कि आज की सुविधाजनक यात्रा और राहुल जी की कठिन, संघर्षपूर्ण यात्राओं में जमीन-आसमान का अंतर है। राहुल जी का लेखन साहस, खोज और जीवन-संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने तिब्बत यात्रा के उदाहरण देते हुए बताया कि राहुल जी ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी लोकजीवन का सूक्ष्म और जीवंत चित्रण किया, जो आज भी पाठकों को प्रभावित करता है।

समकालीन संदर्भ में प्रासंगिकता

संगोष्ठी में यह बात विशेष रूप से उभरकर सामने आई कि राहुल सांकृत्यायन का ज्ञान-दर्शन आज के डिजिटल युग में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने ज्ञान को सीमित वर्ग से निकालकर जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। उनकी यायावर चेतना आज के ‘डिजिटल घुमक्कड़’ युग से संवाद स्थापित करती है। उनका तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज के वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है।

समापन और धन्यवाद ज्ञापन

कार्यक्रम के अंत में संचालिका गायत्री उपाध्याय ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से साहित्यिक संवाद और बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाया जा सकता है। धन्यवाद ज्ञापन के साथ संगोष्ठी का सफल समापन हुआ।

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पूजा अग्रहरि पूजा अग्रहरि ने 2020 में दैनिक विश्वमित्र से पत्रकारिता की शुरुआत की। युवा शक्ति और जागो देश यूट्यूब चैनलों से जुड़ने के बाद, वर्तमान में पिछले 1 वर्ष से ‘जागो टीवी’ वेब पोर्टल में कंटेंट राइटर हैं। ‘कोई और राकेश श्रीमाल’ पुस्तक की सह-संपादक रही हैं। आपने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है।