वापसी | हिंदी कविता | सुशील कुमार पाण्डेय ‘निर्वाक’ की कविता’
मनुष्य की प्रगति की दौड़ और उसकी जड़ों की ओर वापसी की मार्मिक कथा। जब स्वाद खो गया, मिट्टी भूली, और मशीनों ने पहचान छीन ली, तब आत्मा ने फिर वही मिट्टी, खादी और प्रकृति का स्पर्श खोजा।
वापसी
हम समझते रहे
कि हम आगे बढ़ रहे हैं
जब मिट्टी के कुल्हड़ से
प्लास्टिक के प्यालों तक पहुँचे
पर स्वाद खो गया
बीमारियाँ मिलीं
तो फिर लौट आए
उसी मिट्टी की गंध में
जहाँ जीवन का रस बसता है
हमने कहा
अब अँगूठा नहीं
कलम चलेगी
पर देखा
मशीन ने वही अँगूठा माँगा
जिसे कभी अपढ़ता का प्रतीक कहा गया था
अब वही
पहचान की मुहर बन गया
हमने कपड़े सहेजना सीखा
फिर फैशन की मिर्ची लगी
तो खुद ही
अपनी पैंटें फाड़ लीं
बुशर्टों और शमीजों में
सलवटें भर लीं
टैरीलीन के मोह में
सूती और खादी को छोड़ा
फिर पसीने से परेशान होकर
वापस
उन्हीं की गोद में लौट आए
हमने खेत छोड़े
मशीनें अपनाईं
डिग्रियाँ लीं
और फिर वही एम.बी.ए.
वही आई.आई.टी.एन.
हाथ जोड़कर
धरती से जुड़ने लगे
कुदरत से भागे
डिब्बे खोले
जूस पिया
फिर जब
दवा ही जीवन बन गई
तो नींबू और तुलसी
नानी-दादी के नुस्खे
डॉक्टर बन गए
ब्रांड के पीछे भागे
नामों में पहचान खोजी
और फिर
उन्हीं पुरानी चीजों को
‘एंटीक’ कहकर
पूजने लगे
बच्चों को मिट्टी से डराया
स्वच्छता का पाठ पढ़ाया
पर जब हड्डियाँ कमजोर पड़ीं
तो इम्युनिटी के नाम पर
फिर मिट्टी में लौटे
गाँव से शहर गए
शहर से जंगल की ओर भागे
और तब मन ने समझा
कि प्रकृति का हर चक्कर
वापसी के लिए ही होता है
हमने विज्ञान में
अमरत्व खोजा
मिला बस
अस्थिर सुख
प्रकृति मुस्कुराई और बोली
“मैं थी, हूँ, और रहूँगी
तुम बस
हर बार
मुझ तक लौटने के
नए बहाने खोजते रहो।”
मनुष्य
जब-जब आगे बढ़ा
वह केवल भटका
और अंततः
वहीं लौट आया
जहाँ से
वह चला था।
सुशील कुमार पाण्डेय ‘निर्वाक’
संपर्क: 25-26, रोज मेरी लेन, हावड़ा - 711101,
मो.: 88 20 40 60 80 / 9681 10 50 70
ई-मेल : aapkasusheel@gmail.com
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