रामनवमी पर शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
रामनवमी पर आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में रामराज्य, संविधान, सामाजिक न्याय और वैश्विक शांति पर देशभर के विद्वानों ने गहन विचार प्रस्तुत किए।
देशभर के विद्वानों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं एवं शोधार्थियों ने रामराज्य, संविधान, सामाजिक न्याय, स्त्री विमर्श और वैश्विक शांति पर प्रस्तुत किए विचार
रामनवमी के पावन अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा ‘राम से राष्ट्र की संकल्पना: समकालीन परिप्रेक्ष्य में एक चिंतन’ विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर की आभासीय संगोष्ठी का सफल एवं गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि से विद्वानों एवं प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी एवं पत्रकार गायत्री उपाध्याय (डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर) द्वारा अत्यंत सुसंगठित एवं प्रभावशाली ढंग से किया गया। उन्होंने प्रारंभ में सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए मंच की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
मंगलाचरण एवं भूमिका
संगोष्ठी का शुभारंभ मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के चरणों में वंदन के साथ हुआ। संचालिका ने एक प्रेरणादायी श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि राम के आदर्शों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारना ही वास्तविक ‘रामराज्य’ की स्थापना का आधार है। इसके उपरांत उन्होंने शब्दभूमि प्रकाशन का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह संस्था मात्र एक प्रकाशन गृह नहीं, बल्कि एक साहित्यिक सहकारिता मंच है, जहाँ रचनाकारों को अपनी कृतियों को प्रकाशित करने हेतु प्रोत्साहित और समर्थित किया जाता है। संस्था का उद्देश्य व्यावसायिक लाभ नहीं, बल्कि साहित्यिक चेतना का विस्तार, संवर्धन और संरक्षण है।
विषय की प्रासंगिकता
‘राम से राष्ट्र की संकल्पना’ विषय पर प्रकाश डालते हुए यह स्पष्ट किया गया कि राम केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आदर्शों के प्रतीक हैं। रामराज्य की अवधारणा एक ऐसे आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना करती है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को न्याय, सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि प्राप्त हो। समकालीन भारत के संदर्भ में यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के समय में शासन, सामाजिक समरसता, महिला सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना जैसे प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठे हैं।
वक्ताओं के विचार
डॉ. निहारिका कुमारी (जमशेदपुर) ने अपने वक्तव्य में राम के जीवन को एक आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राम का जीवन हमें सिखाता है कि किस प्रकार व्यक्ति अपने कर्तव्य, धैर्य और नैतिकता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकता है।
अधिवक्ता अंजू मनोत (कोलकाता) ने अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया ‘क्या रामराज्य संविधान के मूल्यों से सामंजस्य रखता है?’ उन्होंने बताया कि रामराज्य की अवधारणा में न्याय, समानता और लोककल्याण के जो तत्व हैं, वे भारतीय संविधान की मूल भावना से मेल खाते हैं।
डॉ. किरण कुमारी (भागलपुर) ने भारतीय संस्कृति और लोक कला में रामराज्य की उपस्थिति को रेखांकित किया। उनके अनुसार राम की कथा केवल धर्मग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि लोक जीवन, गीत, नृत्य और परंपराओं में गहराई से रची-बसी है।
डॉ. अनिता कुमारी (जमशेदपुर) ने रामराज्य और संविधान के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि आधुनिक शासन व्यवस्था में रामराज्य के आदर्शों को व्यावहारिक रूप से अपनाया जा सकता है।
मुकेश कुमार (अलवर, राजस्थान) ने ‘राम का वनवास और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता’ विषय पर विचार रखते हुए बताया कि राम का जीवन पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश देता है।
डॉ. शिखा देवगन (गुरुग्राम) ने ‘रामराज्य में स्त्री विमर्श’ पर गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए स्त्री के त्याग, शक्ति और मर्यादा के अंतर्संबंधों को समझाया।
अनिता मोदी (बेंगलुरु) ने आधुनिक भारत की चुनौतियों के संदर्भ में रामराज्य के मूल विचारों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
पारुल तोमर (मेरठ) ने वैश्विक शांति के संदर्भ में रामराज्य को एक आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि यह अवधारणा विश्व को नैतिक दिशा दे सकती है।
डॉ. सपना चंदेल (शिमला) ने वर्तमान समय में रामराज्य की अवधारणा को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
मनोज प्रभाकर ढोने (वर्धा) ने भारतीय ज्ञान प्रणाली में राम राज्य की महत्ता पर अपना सुव्यवस्थित व्याख्यान दिया।
किरण कुमारी (बिहार) ने राम पर स्वरचित कविता का पाठ किया। अन्य प्रतिभागियों ने भी विविध दृष्टिकोणों से विषय को समृद्ध किया।
समापन
संगोष्ठी ने यह स्थापित किया कि रामराज्य कोई काल्पनिक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सामाजिक-राजनीतिक मॉडल है, जिसे आधुनिक संदर्भों में समझकर लागू किया जा सकता है। यह केवल शासन की अवधारणा नहीं, बल्कि एक नैतिक और सांस्कृतिक दर्शन है, जो व्यक्ति से राष्ट्र तक की यात्रा को दिशा देता है। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, प्रिया श्रीवास्तव ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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