विद्यासागर विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में लोक, शास्त्र, कबीर और अनुवाद के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा पर गहन विमर्श हुआ।
मिदनापुर, 25 मार्च। हिंदी विभाग, विद्यासागर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा एवं अंतिम दिन अकादमिक गंभीरता, वैचारिक ऊष्मा और रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। इस संगोष्ठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के उस बहुस्तरीय स्वरूप को उजागर किया, जो न केवल शास्त्रीय ग्रंथों में, बल्कि लोकजीवन, भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक अनुभवों में समान रूप से विद्यमान है।
ज्ञान परंपरा और कबीर: स्थापित धारणाओं को चुनौती
तृतीय आलोचना सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रवि भूषण ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रचलित अवधारणाओं पर गहरा प्रश्नचिन्ह लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल संस्कृत और वैदिक परंपरा तक सीमित कर देना एक प्रकार की बौद्धिक संकीर्णता है। उन्होंने विशेष रूप से कबीर का उल्लेख करते हुए कहा कि कबीर उस दृष्टिकोण के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं, जो ज्ञान को केवल शास्त्रों में सीमित करता है। कबीर की वाणी लोक से उपजी है, और वह सीधे सामाजिक यथार्थ से संवाद करती है। प्रो. भूषण ने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान समय, जो तेजी से ज्ञान-विमुख होता जा रहा है, उसमें ज्ञान परंपरा पर इस प्रकार का विमर्श अपने आप में एक आश्चर्यजनक और स्वागतयोग्य पहल है।
लोक भाषा: ज्ञान का वास्तविक आधार
हावड़ा हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. दामोदर मिश्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ों को ‘लोक’ में स्थापित करते हुए एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संस्कृति को ज्ञान परंपरा का प्रारंभिक बिंदु मानना उचित नहीं है। उनके अनुसार, लोक भाषा ही वह मूल स्रोत है, जिससे शास्त्र और साहित्य की भाषा विकसित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब ज्ञान परंपरा लोक से कटकर केवल रूढ़ियों और परंपरागत संरचनाओं में सिमट जाती है, तो वह अंधविश्वास का रूप ले लेती है। इस प्रकार उन्होंने ज्ञान और लोक के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय ज्ञान परंपरा की बहुलता और समावेशिता
डॉ. सुभाष चंद्र गुप्ता ने भारतीय ज्ञान परंपरा की बहुलतावादी प्रकृति को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान की अनेक धाराएं एक साथ विकसित हुई हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए एकरेखीय दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए विविध परंपराओं दार्शनिक, लोक, धार्मिक, साहित्यिक को एक साथ देखने की आवश्यकता है।
अनुवाद और लोक-संकलन की भूमिका
सागर विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के डॉ. संजय नाइनवाड ने अपने वक्तव्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के विस्तार में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल वैदिक साहित्य तक सीमित करना एक अधूरा दृष्टिकोण है। इसके अतिरिक्त लोक साहित्य, क्षेत्रीय साहित्य और अन्य भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-संपदा भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोक में निहित ज्ञान को संकलित करना, उसका दस्तावेजीकरण करना और उसे व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराना आज की एक बड़ी बौद्धिक जिम्मेदारी है।
शोध पत्र वाचन: विविध विमर्शों का समागम
शोध पत्र वाचन सत्र की अध्यक्षता डॉ. पंकज साहा ने की। इस सत्र में विभिन्न शोधार्थियों और विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग पहलुओं पर अपने शोध प्रस्तुत किए। डॉ. रेणु गुप्ता, डॉ. सोनम सिंह, उष्मिता गौड़, मदन शाह, तेजेश्वर नोनिया, रिया श्रीवास्तव और नेहा शर्मा ने अपने आलेखों के माध्यम से ज्ञान परंपरा के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक आयामों को सामने रखा। इन प्रस्तुतियों ने संगोष्ठी को एक जीवंत संवाद में परिवर्तित कर दिया, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य भी था।
कविता कोलाज: रचनात्मकता का संवेदनात्मक आयाम
संगोष्ठी के अकादमिक स्वरूप के साथ-साथ उसके सांस्कृतिक आयाम को भी समान महत्त्व दिया गया। विभाग के विद्यार्थियों और शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत ‘कविता कोलाज’ ने कार्यक्रम को भावात्मक ऊँचाई प्रदान की। अनुराधा कुमारी, मौली मुखर्जी, रूथ कर, अंजलि शर्मा, निसार अहमद, उषा दुबे, रंभा कुमारी और काजल ठाकुर की प्रस्तुति ने साहित्यिक संवेदना को जीवंत कर दिया और श्रोताओं को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।
संचालन, सहभागिता और आयोजन की सफलता
कार्यक्रम का संचालन सुषमा कुमारी और रुपेश कुमार यादव ने प्रभावशाली ढंग से किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. श्रीकांत द्विवेदी और रिया श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर लेखक एवं समीक्षक मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. संजय पासवान, डॉ. प्रकाश अग्रवाल, चंदना मंडल सहित अनेक गणमान्य साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की सफलता में नसरीन बानो, अर्जुन शर्की, विवेक भोला, पिंकी बहादुर, अदिति शर्मा, इंदु शर्मा, प्रिया मिश्रा और अनिल साह का विशेष योगदान रहा।
नए विमर्शों की ओर एक महत्वपूर्ण कदम
यह संगोष्ठी केवल एक अकादमिक आयोजन भर नहीं रही, बल्कि इसने भारतीय ज्ञान परंपरा को नए दृष्टिकोण से देखने और समझने की दिशा में एक सशक्त पहल की। लोक और शास्त्र के बीच संवाद, ज्ञान की बहुलता, और अनुवाद की भूमिका जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर इस संगोष्ठी ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा एक जीवंत, गतिशील और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है।
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