क्या ‘सनातन धर्म’ नव-ब्राह्मणवादी वैष्णव धर्म है? | डॉ. विजय बहादुर सिंह
डॉ. विजय बहादुर सिंह का चर्चित वैचारिक लेख, जिसमें वैष्णव धर्म, ब्राह्मणवाद, बौद्ध-जैन प्रभाव और वर्तमान ‘सनातन धर्म’ विमर्श की ऐतिहासिक पड़ताल की गई है।
भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को लेकर आज जितनी बहसें हो रही हैं, उनमें ‘सनातन धर्म’ सबसे अधिक चर्चित और विवादास्पद शब्द बन चुका है। वर्तमान राजनीतिक सत्ता जिस आक्रामक आग्रह के साथ ‘सनातन धर्म’ को भारतीय पहचान का पर्याय बनाकर प्रस्तुत कर रही है, वह स्वाभाविक रूप से अनेक ऐतिहासिक और वैचारिक प्रश्न खड़े करता है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर वह कौन-सा धर्म है जिसे आज ‘सनातन’ कहकर प्रचारित किया जा रहा है? क्या वह वैदिक धर्म है? क्या वह उपनिषदों का दार्शनिक चिंतन है? क्या वह जैन और बौद्ध परंपराओं के समांतर विकसित कोई धारा है? अथवा वह बाद के काल में विकसित हुआ नव-ब्राह्मणवादी वैष्णव धर्म है, जिसके प्रमुख आराध्य राम और कृष्ण हैं?
आचार्य क्षितिमोहन सेन अपनी चर्चित पुस्तक ‘संस्कृति संगम’ में भागवत पुराण के दशम स्कन्ध की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि श्रीकृष्ण ने इन्द्र आदि देवताओं की उपासना का विरोध कर वैष्णव प्रेम-भक्ति की स्थापना का प्रयास किया था। यह संकेत केवल धार्मिक परिवर्तन का नहीं, बल्कि भारतीय समाज में चल रहे गहरे सांस्कृतिक संक्रमण का भी प्रतीक है।
कृष्ण से हमारा प्रारम्भिक परिचय महाभारत में होता है, किन्तु बाद के पुराण-काल में वे भागवत परंपरा के सर्वोच्च आराध्य के रूप में स्थापित दिखाई देते हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जिन कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों और प्रमुख उपनिषदों में नहीं मिलता, वे अचानक भारतीय धार्मिक चेतना के इतने केंद्रीय लोकदेवता कैसे बन गए? यह प्रश्न केवल धर्मशास्त्रियों को ही नहीं, बल्कि इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और संस्कृति-चिंतकों को भी लंबे समय से आकर्षित करता रहा है।
इतिहासकार सुवीरा जायसवाल अपनी चर्चित शोधकृति ‘वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास’ में इस ऐतिहासिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि को विस्तार से स्पष्ट करती हैं। उनके अनुसार, सम्राट अशोक के पश्चात के काल में वैदिक यज्ञ और कर्मकांड, विशेषकर पशुबलि से जुड़े अनुष्ठान, जनसाधारण में तेजी से अलोकप्रिय होते जा रहे थे। दूसरी ओर, बौद्ध और जैन धर्म जैसे श्रमण परंपराओं ने वैदिक ब्राह्मणवाद की सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभुत्व को गहरी चुनौती दी थी। परिणामस्वरूप समाज के बड़े हिस्से का झुकाव भक्ति-आधारित, मूर्तिपूजक और लोक-आधारित धार्मिक सम्प्रदायों की ओर बढ़ने लगा।
सुवीरा जायसवाल लिखती हैं, “इस परिस्थिति में जनता का ध्यान बहुत से जनजातीय एवं अवैदिक देवताओं की उपासना की ओर गया।” ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी तक का चार सौ वर्षों का यह कालखंड भारतीय समाज में गहरे परिवर्तन का काल था। शक, कुषाण और अन्य विदेशी जातियों के आगमन ने पारंपरिक वर्ण-व्यवस्था को कमजोर किया। निम्न वर्णों और उत्पीड़ित समुदायों का बड़ा हिस्सा बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुआ, क्योंकि वहाँ तुलनात्मक सामाजिक समानता और सम्मान की संभावना दिखाई देती थी।
यही वह ऐतिहासिक मोड़ था, जब ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने स्वयं को बचाने के लिए नई रणनीति अपनाई। जनसाधारण में लोकप्रिय लोकदेवताओं, जनजातीय आराध्यों और अवैदिक धार्मिक परंपराओं को अपने भीतर समाहित करना प्रारम्भ किया गया। इन देवताओं की पूजा-पद्धतियों में अहिंसा, भक्ति, समर्पण और प्रभुता के प्रति आज्ञाकारिता जैसे तत्वों का समावेश किया गया, किन्तु साथ ही वर्ण-आधारित सामाजिक संरचना को भी सुरक्षित बनाए रखा गया।
यहीं वैष्णव धर्म का वह नया रूप उभरता है, जिसमें कृष्ण और राम जैसे लोकनायक धीरे-धीरे ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के भीतर प्रतिष्ठित किए जाते हैं। स्त्रियों और निम्न वर्गों के प्रति सीमित उदारता का प्रदर्शन अवश्य किया गया, किन्तु सामाजिक विभाजन की मूल संरचना को चुनौती नहीं दी गई।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जैन और बौद्ध धर्मों ने वैदिक वर्ण-व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए समानता का संदेश दिया था। किन्तु ब्राह्मणवादी पुनर्गठन की इस नई प्रक्रिया में अवैदिक देवताओं को स्वीकार तो किया गया, परन्तु सामाजिक नियंत्रण और वर्णाधारित असमानता की संरचना को समाप्त नहीं होने दिया गया।
सुवीरा जायसवाल का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है, “वैष्णव धर्म का उसके निर्माण काल में अध्ययन करने से यह स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाता है कि इस धर्म का उद्भव लोकप्रिय देवताओं की उपासना के ब्राह्मणीकरण के प्रयास के क्रम में नारायण-विष्णु के साथ इन देवताओं के एकीकरण से हुआ। इस प्रकार वैष्णव धर्म ने उच्च वर्गों के वर्णगत आचार-नियमों का प्रचार करने तथा जनसाधारण को सामाजिक असमानता से समझौता करने में सहायता प्रदान की।”
यहाँ प्रश्न केवल धार्मिक इतिहास का नहीं, बल्कि सत्ता, समाज और संस्कृति के पारस्परिक संबंधों का भी है। आज जब ‘सनातन धर्म’ को भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अस्मिता के केंद्रीय प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, तब यह जानना आवश्यक हो जाता है कि यह ‘सनातन’ वास्तव में किस ऐतिहासिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
क्या यह वेदों का दार्शनिक धर्म है?
क्या यह उपनिषदों की आत्म-अन्वेषी चेतना है?
क्या यह बुद्ध और महावीर की समतावादी करुणा है?
या फिर यह वही नव-ब्राह्मणवादी वैष्णव धर्म है, जिसने लोकदेवताओं को आत्मसात कर सामाजिक असमानता को नए धार्मिक रूप में स्थिर किया?
यह बहस केवल अतीत की नहीं, वर्तमान भारत की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। क्योंकि इतिहास की व्याख्या ही वर्तमान राजनीति और भविष्य की सामाजिक दिशा तय करती है।
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