14 साल की कार्तिका: हाथों में पाना-रिंच, आँखों में सपने और पिता के गैराज से आत्मनिर्भरता की राह
केरल की 14 वर्षीय कार्तिका स्कूल की पढ़ाई के साथ पिता के गैराज में बाइक रिपेयरिंग और सर्विसिंग सीख रही हैं। उनकी मेहनत बेटियों की आत्मनिर्भरता और कौशल की प्रेरक कहानी है।
कार्तिका की कहानी केवल एक 14 वर्षीय बच्ची के गैराज में काम करने की कहानी नहीं है। यह उस सोच को बदलने वाली कहानी है, जो अब भी यह मानती है कि कुछ काम केवल लड़कों के लिए होते हैं।
स्कूल की पढ़ाई के साथ कार्तिका अपने पिता के गैराज में बाइकों की रिपेयरिंग और सर्विसिंग का काम सीख रही हैं। भारी-भरकम मोटरसाइकिलों के पुर्जों को समझना, औजारों का इस्तेमाल करना और मशीन की समस्या पहचानना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं, लेकिन उनकी लगन ने इस काम को उनके आत्मविश्वास का हिस्सा बना दिया है। कार्तिका के हाथों में किताबें भी हैं और पाना-रिंच भी। यही उनका सबसे खूबसूरत परिचय है। उनकी कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शिक्षा और कौशल के बीच किसी कृत्रिम विभाजन को स्वीकार नहीं करती। पढ़ाई के साथ व्यावहारिक कौशल सीखना युवा पीढ़ी को अधिक आत्मनिर्भर बना सकता है।
कार्तिका अपने पिता के काम में हाथ बँटाकर केवल आर्थिक या पारिवारिक सहयोग नहीं कर रहीं; वह यह संदेश भी दे रही हैं कि बेटियों को अवसर मिले तो वे परिवार की जिम्मेदारियों को मजबूती से संभाल सकती हैं और अपने लिए भी एक अलग पहचान बना सकती हैं। उनकी कहानी उन माता-पिता के लिए भी प्रेरणा है, जो बच्चों के भविष्य को केवल पारंपरिक करियर की सीमाओं में देखते हैं।
कार्तिका की सबसे बड़ी पहचान उनकी उम्र नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास, मेहनत और सीखने की इच्छा है।
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