जब IG स्तरीय पूर्व IPS भी असुरक्षित हो, तब आम नागरिक की क्या बिसात?
पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी और मीडिया तक उनकी पहुँच रोकने की घटनाएँ D.K. Basu निर्देश, अनुच्छेद 19/21 और पुलिस जवाबदेही के संदर्भ में गंभीर प्रश्न उठाती हैं, क्या सत्ता आलोचना को दबा रही है? संपादकीय पढ़ें।
अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी, उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और लोकतंत्र की गहरी चिंता
लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता; वह संस्थाओं के व्यवहार, कानून की निष्पक्षता और नागरिकों की गरिमा से साँस लेता है। कभी-कभी कोई एक घटना इस पूरे तंत्र का एक्स-रे बन जाती है। पूर्व आईपीएस अधिकारी, IG स्तर तक सेवा दे चुके अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी और उसके बाद अब तक की पुलिस कार्रवाइयाँ ऐसी ही घटना हैं। यह मामला किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं; यह सवाल उठाता है कि यदि व्यवस्था के भीतर शीर्ष पदों तक पहुँच चुका अधिकारी भी प्रक्रिया, गरिमा और अधिकारों की गारंटी नहीं पा रहा, तो आम नागरिक के साथ पुलिस का व्यवहार क्या होता होगा?
गिरफ्तारी: प्रक्रिया या प्रदर्शन?
कानून के राज में गिरफ्तारी एक संवैधानिक प्रक्रिया है, न कि शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन। लेकिन जिस तरह से इस प्रकरण में मीडिया-रोध, दृश्य नियंत्रण और अस्पष्ट औचित्य सामने आए, वे इस संदेह को जन्म देते हैं कि क्या यह ‘आवश्यक न्यूनतम कार्रवाई’ थी, या असहमति के प्रति राज्य की असहजता का संदेश। लोकतंत्र में पुलिस का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, विश्वास कायम करना होता है। जब कार्रवाई में संदेश हावी हो जाए, तो न्याय की छवि धुंधली पड़ती है।
कानून का अक्षर और उसकी आत्मा
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं, जिनका मूल भाव है मानवीय गरिमा, पारदर्शिता और न्यूनतम बल-प्रयोग। प्रश्न यह नहीं कि नियम मौजूद हैं; प्रश्न यह है कि क्या वे समान रूप से लागू होते हैं?
यदि कोई व्यक्ति न हिंसक है, न भागने का तात्कालिक खतरा तो शारीरिक बंधन क्यों?
यदि जाँच पर वास्तविक, तात्कालिक जोखिम नहीं, तो मीडिया से संवाद पर पूर्ण रोक क्यों?
यदि सब कुछ वैधानिक था, तो लिखित, सार्वजनिक स्पष्टीकरण में संकोच क्यों?
कानून की आत्मा गरिमा है; जब आत्मा खो जाती है, तो अक्षर औजार बन जाते हैं।
असहमति का अपराधीकरण: संस्थागत जोखिम
अमिताभ ठाकुर का सार्वजनिक जीवन पुलिस सुधार, भ्रष्टाचार के प्रश्न, नागरिक अधिकार सत्ता के लिए असुविधाजनक रहा है। लेकिन लोकतंत्र में असुविधा ही प्रगति का इंजन होती है। जब असुविधा कार्रवाई का मानदंड बन जाए, तो असहमति अपराध में बदल जाती है। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तियों को नहीं, संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाती है। पुलिस की साख भय से नहीं, निष्पक्षता से बनती है।
IG स्तर का अधिकारी और आम नागरिक: असमान मैदान
यहाँ सबसे गंभीर प्रश्न उभरता है: जो व्यक्ति नियम जानता है, नेटवर्क रखता है, अदालत तक पहुँच सकता है, और मीडिया तक अपनी बात पहुँचा सकता है यदि वह भी सुरक्षित नहीं, तो वह नागरिक, जो थाने की भाषा नहीं जानता, वकील वहन नहीं कर सकता, और मीडिया तक पहुँच नहीं रखता उसके अधिकार किस फाइल में सुरक्षित हैं?
क्या उनकी FIR ‘विवेक’ के नाम पर अटक जाती है?
क्या उनकी आवाज ‘कानून-व्यवस्था’ के नाम पर दबा दी जाती है?
जब ऊपर बैठे व्यक्ति के साथ भी प्रक्रिया संदिग्ध लगे, तो नीचे बैठे व्यक्ति की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं।
मीडिया-रोध और लोकतांत्रिक पारदर्शिता
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं, पर शून्य भी नहीं। मीडिया से संवाद रोकने के लिए ठोस, लिखित और तात्कालिक कारण होने चाहिए, जैसे जाँच पर वास्तविक खतरा, गवाहों की सुरक्षा, या सार्वजनिक शांति का आसन्न जोखिम। 'सुविधा’ या ‘असहजता’ कारण नहीं हो सकते। मीडिया-रोध जब कारणहीन दिखे, तो वह पारदर्शिता के विरूद्ध और सत्ता की असहजता के पक्ष में जाता है। लोकतंत्र में जवाबदेही का पहला कदम सूचना है; सूचना रोकी जाए, तो संदेह बढ़ता है।
शक्ति का संतुलन: पुलिस किसके लिए?
पुलिस राज्य की शक्ति का सबसे दृश्य चेहरा है। इसीलिए उस पर उच्चतम मानक लागू होते हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में यदि शक्ति असंतुलित हो जाए, तो वही शक्ति नागरिकों के अधिकारों पर भारी पड़ती है। प्रश्न यह नहीं कि पुलिस को अधिकार होने चाहिए या नहीं, निस्संदेह होने चाहिए। प्रश्न यह है कि उन अधिकारों पर नियंत्रण और जवाबदेही कितनी मजबूत है।
जवाबदेही के ठोस कदम
इस प्रकरण से निकलने का रास्ता शोर नहीं, संस्थागत सुधार है:
1. हर कदम का लिखित औचित्य: गिरफ्तारी, बंधन, मीडिया-रोध सबका।
2. स्वतंत्र जाँच: यदि दिशानिर्देशों के उल्लंघन का संदेह है।
3. पारदर्शिता: गिरफ्तारी मेमो, समय-रेखाएँ, आदेश सार्वजनिक हों।
4. प्रशिक्षण और संवेदनशीलता: पुलिस बल में मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों का सुदृढ़ प्रशिक्षण।
5. नागरिक-निरीक्षण तंत्र: शिकायतों पर समयबद्ध, स्वतंत्र समीक्षा।
लोकतंत्र की कसौटी
लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी शक्ति दिखाता है, बल्कि इससे कि वह कितनी शक्ति को नियंत्रित करता है। यदि IG स्तर के पूर्व IPS के साथ भी अधिकारों की गारंटी धुंधली हो सकती है, तो यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है। आज प्रश्न अमिताभ ठाकुर का है; कल यह हर नागरिक का हो सकता है।
पुलिस का भविष्य भय में नहीं, भरोसे में है और भरोसा केवल न्याय, गरिमा और जवाबदेही से लौटता है। सत्ता यदि आलोचना को शत्रु नहीं, सुधार का अवसर माने; यदि कानून का अक्षर नहीं, उसकी आत्मा लागू करे, तो न केवल एक व्यक्ति का अधिकार सुरक्षित होगा, बल्कि लोकतंत्र का आत्मविश्वास भी। यही समय है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में हम यह प्रश्न पूछें, कानून किसके लिए है, और शक्ति किस सीमा तक?
इस प्रश्न का उत्तर ही तय करेगा कि हमारा लोकतंत्र केवल कागज पर है, या जीवन में भी।
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