सिर्फ जश्न नहीं, जिम्मेदारी भी | नया साल 2026 और पर्यावरणीय संकल्प
नया साल 2026 केवल उत्सव का नहीं, धरती के प्रति जिम्मेदारी निभाने का अवसर है। पढ़िए यह प्रभावशाली संपादकीय, जो व्यक्तिगत संकल्पों से आगे सामूहिक भविष्य की बात करता है।
नया साल, नई सोच और धरती के प्रति नया नागरिक-संकल्प
हर नया साल हमारे जीवन में एक नई तारीख नहीं, बल्कि एक नया प्रश्न लेकर आता है। यह प्रश्न केवल इतना नहीं होता कि हमने बीते वर्ष क्या खोया या पाया, बल्कि यह भी होता है कि हम आने वाले समय को कैसा बनाना चाहते हैं। सामान्यतः नया साल आते ही हम व्यक्तिगत संकल्पों की सूची बना लेते हैं स्वस्थ रहना है, अधिक पढ़ना है, बेहतर कमाई करनी है, यात्राएँ करनी हैं। ये सभी संकल्प अपने स्थान पर उचित हैं, लेकिन वर्ष 2026 हमसे कुछ अधिक, कुछ गहरा और कुछ सामूहिक माँग रहा है। यह हमसे पूछ रहा है क्या हम केवल अपनी जिंदगी बदलेंगे या उस दुनिया की भी जिम्मेदारी लेंगे, जिसमें हम जी रहे हैं?
आज जब हम जश्न मनाने की तैयारियों में जुटे हैं, तब धरती एक गहरे संकट से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता का तेजी से होता क्षरण अब भविष्य की आशंकाएँ नहीं रह गई हैं। ये हमारे वर्तमान की सच्चाइयाँ हैं। बाढ़ और सूखे की मार, जंगलों की भीषण आग, पिघलते ग्लेशियर, जहरीली हवा और सूखती नदियाँ ये सब प्रकृति की वह भाषा हैं, जो हमें साफ-साफ चेतावनी दे रही हैं। प्रकृति अब चुप नहीं है। वह हमसे जवाब माँग रही है।
भारत जैसे देश में यह संकट और भी गंभीर रूप ले चुका है। एक ओर महानगरों में हवा साँस लेने लायक नहीं रही, दूसरी ओर गाँवों और कस्बों में पीने के पानी के लिए संघर्ष बढ़ता जा रहा है। किसान मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है, बच्चे प्रदूषण से बीमार पड़ रहे हैं और बुजुर्ग बदलते मौसम के प्रहार सह नहीं पा रहे हैं। ऐसे समय में नया साल केवल आतिशबाजी और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रह सकता। यह समय है नए नागरिक-बोध का, जहाँ उत्सव के साथ जिम्मेदारी भी बराबरी से चले।
प्लास्टिक से मुक्ति: सुविधा नहीं, विवेक चुनिए
यदि हमें सचमुच धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी है, तो सबसे पहला संकल्प होना चाहिए प्लास्टिक से मुक्ति। सिंगल-यूज प्लास्टिक आज पर्यावरण का सबसे खतरनाक शत्रु बन चुका है। यह न मिट्टी में घुलता है, न पानी में, बल्कि सदियों तक जहर की तरह बना रहता है। भारत में हर वर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा नदियों और समुद्रों में पहुँच रहा है। इसका दुष्परिणाम केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है मछलियाँ, पक्षी, पशु और अंततः मनुष्य स्वयं इसकी कीमत चुका रहे हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि सुविधा के नाम पर इस्तेमाल किया गया हर प्लास्टिक बैग, हर प्लास्टिक बोतल और हर डिस्पोजेबल सामान प्रकृति पर एक अतिरिक्त बोझ है। यह बोझ आने वाली पीढ़ियाँ उठाएँगी। इसलिए 2026 का पहला और सबसे प्रभावी संकल्प यही हो सकता है कि हम प्लास्टिक का विकल्प चुनेंगे-स्टील की बोतल, कपड़े का थैला, कागज या मिट्टी के बर्तन। बाजार में दुकानदार से आत्मविश्वास के साथ ‘प्लास्टिक नहीं चाहिए’ कहना भी एक छोटा लेकिन साहसी कदम है।
ऊर्जा बचत: नैतिक जिम्मेदारी का सवाल
आधुनिक जीवन में बिजली हमारी आवश्यकता बन चुकी है, लेकिन इसका अंधाधुंध उपयोग पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहा है। आज भी भारत में बिजली का बड़ा हिस्सा कोयले से उत्पन्न होता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और जलवायु असंतुलन गहराता है। हर जलता बल्ब, हर बेवजह चलता पंखा और हर अनावश्यक चालू उपकरण प्रकृति पर दबाव बढ़ाता है। ऊर्जा बचत का संकल्प कोई कठिन तपस्या नहीं है। एलईडी बल्ब का उपयोग, बिना जरूरत लाइट और पंखे बंद रखना, चार्जर को प्लग में न छोड़ना और सोलर ऊर्जा जैसे विकल्प अपनाना छोटे लेकिन असरदार कदम हैं। ऊर्जा बचत का सुंदर पहलू यह है कि इससे केवल पर्यावरण ही नहीं, हमारा जीवन भी बेहतर होता है। बिजली का बिल घटता है, संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है और सादगी का सुख अनुभव में आता है। यह समझ विकसित होती है कि कम में भी बेहतर जीवन जिया जा सकता है।
पेड़ों से दोस्ती: भविष्य में निवेश
धरती पर जीवन का आधार पेड़ हैं। वे ऑक्सीजन देते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं और असंख्य जीवों को आश्रय देते हैं। फिर भी विकास के नाम पर सबसे पहले उन्हीं को काटा जाता है। जंगल उजड़ते जा रहे हैं और हरियाली सिकुड़ती जा रही है। ऐसे में ‘एक व्यक्ति, दस पेड़’ जैसा संकल्प केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि क्रांतिकारी हो सकता है। नीम, पीपल, बरगद, आम जैसे देशी पेड़ स्थानीय जलवायु के अनुकूल होते हैं और लंबे समय तक लाभ देते हैं। अपने मोहल्ले, स्कूल, कॉलोनी या किसी खाली जमीन पर पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना नागरिक जिम्मेदारी का श्रेष्ठ उदाहरण है। बच्चों को इस प्रक्रिया में शामिल करना उन्हें प्रकृति से जोड़ता है और उनमें संवेदनशीलता विकसित करता है। वर्षों बाद जब वही पेड़ छाया देंगे, तब यह एहसास होगा कि हमने भविष्य को कुछ लौटाया है।
जल संरक्षण: हर बूँद की कीमत
पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, फिर भी हम इसे सबसे अधिक बर्बाद करते हैं। भारत के कई शहर और गाँव जल संकट की चपेट में हैं। कहीं भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है, तो कहीं नदियाँ सूखने की कगार पर हैं। ऐसे में जल संरक्षण को रोजमर्रा की आदत बनाना अनिवार्य है।
नल खुला न छोड़ना, बाल्टी से नहाना, सब्जी धोने का पानी पौधों में उपयोग करना और वॉशिंग मशीन को फुल लोड में चलाना जैसे छोटे कदम बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं। वर्षा जल संचयन अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है। छतों पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना भविष्य के लिए समझदारी भरा निवेश है। जल बचेगा, तो संघर्ष कम होंगे और जीवन अधिक सहज बनेगा।
स्थानीय भोजन और हरित परिवहन: जीवनशैली में बदलाव
आज हमारी थाली तक पहुँचने वाला भोजन हजारों किलोमीटर की यात्रा करता है, जिससे ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। इसके विपरीत, स्थानीय और मौसमी भोजन न केवल ताजा और स्वास्थ्यवर्धक होता है, बल्कि किसानों की आजीविका को भी मजबूत करता है। मिलेट्स और देसी अनाज पर्यावरण पर कम बोझ डालते हैं और शरीर के लिए लाभकारी हैं। इसी तरह हरित परिवहन को अपनाना भी समय की माँग है। छोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का उपयोग पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी वरदान है। सार्वजनिक परिवहन, कारपूल और इलेक्ट्रिक वाहन प्रदूषण कम करने में सहायक हैं। सुबह की साइकिल सवारी मन और शरीर दोनों को ताजगी देती है।
2026: परीक्षा का वर्ष
ये सभी संकल्प देखने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन इन्हीं से परिवर्तन की नींव रखी जाती है। वर्ष 2026 को हम चाहें तो केवल उत्सवों और आयोजनों का साल बना सकते हैं, या फिर इसे धरती के नाम समर्पित एक निर्णायक वर्ष में बदल सकते हैं। यह वर्ष हमसे परीक्षा ले रहा है हमारी संवेदनशीलता की, हमारी जिम्मेदारी की और हमारे सामूहिक विवेक की।
याद रखिए, हमारे पास रहने के लिए कोई दूसरा ग्रह नहीं है। यह धरती ही हमारा घर है। इसकी रक्षा करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारा नैतिक कर्तव्य है। यदि आज हमने जिम्मेदारी नहीं ली, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।
इस नए साल संकल्प लें, सिर्फ बेहतर जीवन का नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य का। सिर्फ जश्न नहीं, जिम्मेदारी का भी।
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