‘भाषा विमर्श में हिंदी’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता एवं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियन अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन। विद्वानों ने हिंदी की चुनौतियों, तकनीकी अनुकूलन और बहुभाषिकता पर गंभीर विचार साझा किए।
23 सितंबर, कोलकाता : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता एवं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियन अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का केंद्रीय विषय था - ‘भाषा विमर्श में हिंदी’। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. अजय प्रताप सिंह (महानिदेशक, राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता) ने की।
राकेश सिंह (प्रशासनिक एवं वित्त अधिकारी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियन अध्ययन केंद्र, कोलकाता) ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि हिंदी केवल राजभाषा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, पहचान और विरासत का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी कामकाज को आमजन तक सहज रूप से पहुँचाने के लिए हिंदी का प्रयोग आवश्यक है।
डॉ. अमित राय (एसोसिएट प्रोफेसर एवं प्रभारी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता) ने बीज भाषण के अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा विमर्श केवल दलित, आदिवासी या वर्गीय विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को समझने की आवश्यकता है। उन्होंने हिंदी पर पड़ रहे तकनीकी, बाज़ार और मीडिया दबावों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि "हिंदी लगातार अपने को समावेशित और परिष्कृत करती रही है।" उन्होंने यह भी बताया कि हिंदी के ऐतिहासिक भाषा संघर्ष उर्दू बनाम हिंदी, संस्कृत बनाम हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी के संबंध आज भी भाषा विमर्श के केंद्र में हैं। संविधान सभा की बहसों, गांधी जी के दृष्टिकोण और संयुक्त राष्ट्र की भाषा-नीति के संदर्भों के साथ हिंदी को विश्वभाषा का दर्जा दिलाने की चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की।
डॉ. राजेश साव (प्रबंधक, कोल इंडिया लिमिटेड एवं संपादक ‘कोल दर्पण’) ने अपने वक्तव्य में कहा कि “हिंदी का संघर्ष केवल संवैधानिक मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन में उसके प्रयोग और स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है। हिंदी को तकनीकी युग में नई चुनौतियाँ हैं। जब तक हम हिंदी को डिजिटल माध्यमों पर सहज नहीं बनाएँगे, तब तक यह विश्व भाषा बनने की दिशा में ठहर जाएगी।” उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हिंदी टाइपिंग और तकनीकी प्रयोग की समस्याएँ आज भी बड़ी चुनौती हैं। साथ ही उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि संविधान में अंग्रेज़ी को ऑफिशियल लैंग्वेज और हिंदी को राजभाषा क्यों कहा गया, जबकि दोनों का कार्यक्षेत्र लगभग समान था।
प्रो. अजय प्रताप सिंह (महानिदेशक, राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता) ने राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहा –“हिंदी की स्वीकार्यता पूरे देश में व्यापक है। यह केवल राजभाषा नहीं, बल्कि जनमानस की भाषा है। हिंदी का विस्तार तभी संभव है जब हम अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का सम्मान करते हुए इसे जोड़ने का प्रयास करें। अनेकता में एकता तभी सार्थक होगी जब सभी भाषाओं को समान आदर दिया जाए।” उन्होंने यह भी कहा कि फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति ने हिंदी को व्यापक पहुँच दी है, लेकिन साथ ही भाषा प्रदूषण का संकट भी खड़ा किया है। इसके लिए सेंसरशिप और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों आवश्यक हैं।
उद्घाटन सत्र में ही हिंदी और भारतीय भाषाओं की स्थिति, संस्कृति और समाज के संदर्भों पर व्यापक संवाद हुआ। इसके बाद प्रथम अकादमिक सत्र की चर्चा का विषय था –‘हिंदी की सांस्कृतिक पहचान और बहुभाषिकता’
डॉ. अभिजीत कुमार सिंह (अकादमिक सलाहकार, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियन अध्ययन केंद्र, कोलकाता) ने अपने संबोधन में एक तीखा प्रश्न उठाया कि “भारत जैसे बहुभाषी देश में हम अंग्रेज़ी को इतना अधिक महत्व क्यों देते हैं? क्या हम आज भी भाषाई दृष्टि से मानसिक गुलामी में जी रहे हैं?” उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के प्रति अंध-स्वीकार्यता हमारी औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम है। पुस्तकालयों में इंडेक्सिंग से लेकर शैक्षणिक लेखन तक में हम अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देते हैं, जबकि हमारी स्थानीय और राष्ट्रीय भाषाओं को गौण मान लिया जाता है। उन्होंने ज़ोर दिया कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को सम्मान और वास्तविक स्वीकृति दिए बिना सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न अधूरा रहेगा।
डॉ. अजीत कुमार तिवारी (प्राध्यापक, ऋषि बंकिमचंद्र कॉलेज, नैहाटी) ने अपने वक्तव्य में हिंदी के नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न को ऐतिहासिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में रखा। उन्होंने अर्नेस्ट रेनेन, स्टालिन और अन्य विचारकों के राष्ट्रवाद संबंधी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा - राष्ट्र एक स्थिर संज्ञा नहीं, बल्कि साझे मानवीय मूल्यों और निरंतर संवाद की प्रक्रिया है। भाषा, संस्कृति, साझा अर्थतंत्र और भौगोलिक एकता, राष्ट्र की बुनियादी शर्तें मानी जाती हैं। भारत का राष्ट्रवाद बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित है, किसी एक भाषा या धर्म पर नहीं। उन्होंने चेताया कि जब भी राष्ट्रवाद की परिकल्पना भाषा, नस्ल या धर्म पर आधारित होती है, तो उसका परिणाम विभाजन और संघर्ष के रूप में सामने आता है। इसके विपरीत नागरिक राष्ट्रवाद संवैधानिक मूल्यों और नागरिकता पर आधारित होता है, जो समावेशी और टिकाऊ है।
डॉ. विनय मिश्रा (प्राध्यापक, बंगवासी इवनिंग कॉलेज, कोलकाता) ने अपने व्याख्यान “हिंदी की सांस्कृतिक पहचान और बहुभाषिकता” में हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास और सांस्कृतिक आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भाषा और संस्कृति का गहरा रिश्ता है और आठवीं शताब्दी से हिंदी की स्वतंत्र पहचान रही है। उन्होंने राहुल सांकृत्यायन और धीरेंद्र वर्मा के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी कोई संकुचित भाषा नहीं है, बल्कि ब्रज, अवधी, मैथिली, भोजपुरी जैसी बोलियों से समृद्ध एक व्यापक भाषा है। डॉ. मिश्रा ने चिंता जताई कि आधुनिक हिंदी साहित्य में इन बोलियों का स्थान कम होता गया है। उन्होंने हिंदी की भूमिका शिक्षा, प्रशासन और संप्रेषण में रेखांकित की, साथ ही यह भी कहा कि हिंदीभाषियों को अन्य भारतीय भाषाएं सीखने का प्रयास करना चाहिए। बहुभाषिकता ही भारतीयता की असली पहचान है।
मृत्युंजय श्रीवास्तव (वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक) ने भाषा और धर्म को मानव जीवन की सबसे बड़ी संपदा बताया। उन्होंने दुख जताया कि आज इन दोनों को तोड़ने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा -“जब एक भाषा मरती है, तो उसकी मौत के साथ अन्य भाषाएं भी खतरे में आ जाती हैं।” श्री श्रीवास्तव ने तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं की कमजोर स्थिति को प्रमुख कारण माना। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले 10–15 वर्षों में हिंदी में रचनात्मक लेखन लगभग समाप्त हो जाएगा, क्योंकि नई पीढ़ी में लेखन की परंपरा क्षीण होती जा रही है। हिंदी पत्रिकाओं और संपादकों की संकीर्णता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए। अंत में उन्होंने कहा कि किसी एक भाषा को नहीं, बल्कि पूरी भाषा-संस्कृति को बचाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
विचार सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. वेद रमण पांडेय (एसोसिएट प्रोफेसर, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता) ने तुलसीदास की चौपाई से अपनी बात शुरू की और हिंदी विमर्श को जटिल तथा बहुस्तरीय करार दिया। उन्होंने ‘हिंदी’ और ‘हिंदू’ शब्दों के ऐतिहासिक प्रयोग का संदर्भ देते हुए राष्ट्रवाद की अवधारणा पर चर्चा की। डॉ. पांडेय ने स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उत्तर राष्ट्रवाद की भिन्नताओं को स्पष्ट किया और बताया कि हिंदी राष्ट्रवाद वास्तव में उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन से जुड़ा हुआ था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हिंदी के प्रसार और राष्ट्रीय आंदोलन में केवल हिंदीभाषी लोग ही नहीं, बल्कि बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि भाषाई समुदायों के नेता, साहित्यकार और समाज-सुधारक भी सक्रिय रूप से जुड़े थे। उन्होंने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर और राजगोपालाचारी जैसे लोगों का उदाहरण देकर यह बताया कि हिंदी की स्वीकार्यता एक अखिल भारतीय सांस्कृतिक परियोजना का हिस्सा थी।
यह संगोष्ठी हिंदी भाषा के ऐतिहासिक संघर्ष, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श का मंच बनी। इसमें यह विचार प्रबलता से उभरा कि हिंदी का उत्थान उसकी समावेशिता, तकनीकी अनुकूलन, सरलता और अन्य भारतीय भाषाओं से निरंतर संवाद में ही निहित है। वक्ताओं ने माना कि हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिक और नागरिक राष्ट्रवाद की जीवंत धारा है।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अभिलाष कुमार गोंड (प्राध्यापक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली (प्राध्यापक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) ने किया। वक्ताओं का सम्मान एवं स्वागत विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा इशिका, अंजलि एवं अपर्णा सिंह ने किया। डॉ. आलोक कुमार सिंह एवं सुखेन के सहयोग और समर्पण ने कार्यक्रम की तैयारी एवं सफलता को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। संगोष्ठी में गांधी एवं शांति अध्ययन के स्नातकोत्तर छात्र सुशील कुमार सहित अन्य लोगों ने भाग लिया।
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