कानून या दमन का औजार? शाहजहाँपुर में गुण्डा एक्ट पर उठे गंभीर सवाल, आजाद अधिकार सेना का प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान

शाहजहाँपुर में RTI कार्यकर्ता शैलेश कुमार पर गुण्डा एक्ट लगाने से विवाद बढ़ा। आजाद अधिकार सेना ने इसे दमनकारी कार्रवाई बताते हुए आदेश निरस्त करने और आंदोलन की चेतावनी दी।

Mar 23, 2026 - 08:28
Mar 23, 2026 - 16:50
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कानून या दमन का औजार? शाहजहाँपुर में गुण्डा एक्ट पर उठे गंभीर सवाल, आजाद अधिकार सेना का प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान
आजाद अधिकार सेना का प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान

शाहजहाँपुर में आरटीआई कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता शैलेश कुमार पर उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत की गई कार्रवाई ने प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आजाद अधिकार सेना ने इसे सुनियोजित उत्पीड़नबताते हुए उच्च अधिकारियों से आदेश निरस्त करने की माँग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि न्याय नहीं मिला तो प्रदेशभर में आंदोलन होगा।

प्रशासनिक कार्रवाई या सुनियोजित दमन?

दिनांक 23 मार्च 2026 को शाहजहाँपुर से उठी यह खबर अब केवल एक जिला स्तर का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश में कानूनों के उपयोग और दुरुपयोग के बीच की रेखा को लेकर एक व्यापक बहस का विषय बन गई है। आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री देवेंद्र सिंह राणा ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि प्रदेश अध्यक्ष  शैलेश कुमार के विरुद्ध गुण्डा एक्ट लगाना न केवल कानून की आत्मा के विपरीत है, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने का प्रयासभी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संदर्भ में मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन, पुलिस महानिदेशक (DGP), बरेली मंडल के आयुक्त, ADG, DIG, जिलाधिकारी शाहजहाँपुर, पुलिस अधीक्षक एवं अपर जिला मजिस्ट्रेट को विस्तृत शिकायत पत्र भेजा गया है।

कानूनी विरोधाभास: आदेश खुद अपने ही तर्कों में उलझा?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासनिक आदेश की अंतर्विरोधी प्रकृति को लेकर उठ रहा है। आदेश में स्वयं यह स्वीकार किया गया है कि शैलेश कुमार अभ्यस्त अपराधीनहीं हैं। इसके बावजूद उन पर गुण्डा एक्ट लगाया गया, ₹25,000 का बंधपत्र, दो जमानतें, 6 माह तक मासिक उपस्थिति की बाध्यता। यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब कानून की मूल शर्त (habitual offender होना) ही पूरी नहीं होती, तो क्या यह कार्रवाई वैधानिक कसौटी पर टिकती है?

आवाज उठाने की सजा? RTI एक्टिविस्ट पर कार्रवाई पर बहस

देवेंद्र सिंह राणा का आरोप है कि शैलेश कुमार लंबे समय से भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय रहे हैं और कई मामलों में प्रशासनिक अनियमितताओं को उजागर कर चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह कार्रवाई एक ‘retaliatory action’ (प्रतिशोधात्मक कार्रवाई) है? क्या RTI कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है?

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अधिकांश मामले विचाराधीन हों या जमानत पर हों, तो केवल उन आधारों पर कठोर कानून लागू करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध माना जा सकता है।

जनसमर्थन बनाम प्रशासनिक संदेह

शैलेश कुमार को स्थानीय स्तर पर व्यापक समर्थन प्राप्त है, उनके पक्ष में अनेक शपथ पत्र व चरित्र प्रमाण पत्र दिए गए हैं, उन्हें सज्जन, सामाजिक और जनहितैषीबताया गया है। यह विरोधाभास और गहरा हो जाता है जब एक ओर जनता उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता मानती है, दूसरी ओर प्रशासन उन्हें नियंत्रण योग्य तत्वघोषित करता है।

आजाद अधिकार सेना का अल्टीमेटम

संगठन ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि आदेश तत्काल निरस्त नहीं किया गया, तो प्रदेशभर में शांतिपूर्ण आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और विधिक लड़ाई शुरू की जाएगी।

बड़ा सवाल: क्या कठोर कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है?

उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970 का उद्देश्य समाज में भय और अपराध को नियंत्रित करना है।

लेकिन जब यही कानून सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लागू होने लगे और बिना ठोस आपराधिक पृष्ठभूमि के इस्तेमाल हो, तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरे का संकेत माना जाता है। यह मामला तीन बड़े सवाल उठाता है:

1.         क्या प्रशासनिक विवेक का दुरुपयोग हो रहा है?

2.         क्या कानून का इस्तेमाल संदेश देनेके लिए किया जा रहा है?

3.         क्या इससे अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं में भय का माहौल बनेगा?

संगठन की प्रमुख माँगें

गुण्डा एक्ट का आदेश तत्काल निरस्त किया जाए।

शैलेश कुमार को सुरक्षा व संरक्षण दिया जाए।

दोषी अधिकारियों पर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई हो।

यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक संगठन का नहीं है यह उस मूल प्रश्न का प्रतिनिधित्व करता है कि क्या कानून जनता की सुरक्षा के लिए है, या सत्ता के संरक्षण के लिए?”

यदि आरोपों में सचाई है, तो यह घटना न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह लोकतंत्र में असहमति की आवाजों के लिए खतरे की घंटी भी है।

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