कौन तय करेगा कौन हिन्दू है? | डॉ. विजय बहादुर सिंह का बड़ा सवाल
डॉ. विजय बहादुर सिंह का चर्चित वैचारिक लेख, जिसमें हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व, सनातन, वर्ण व्यवस्था और धार्मिक बहुलता पर तीखे सवाल उठाए गए हैं।
हिन्दू होकर जीने की आज़ादी
मुझमें इस बहस में पड़ने की हिम्मत नहीं है कि इस देश के लोग कब से ‘हिन्दू’ कहे जाने लगे और उनके जीने, रहने, खाने, पहनने और विश्वास करने के तमाम ढंग उनके धर्म की पहचान बन गए। आज शायद ही कोई हिन्दू इस पर गंभीरता से सोचने को तैयार हो कि उसी के घर-परिवार या रिश्तेदारी में जो लोग मांसाहारी हैं, वे हिन्दू हैं या नहीं। इससे भी बड़ी बात यह है कि जिस वैष्णव धर्म को आज की सत्ता-राजनीति ‘सनातन धर्म’ कहकर प्रचारित कर रही है, वह तो मूलतः शाकाहार की माँग करता है। वहाँ वैदिक यज्ञों जैसी परंपराओं के लिए जगह कहाँ है, जिनमें सैकड़ों पशुओं की बलि दी जाती थी? लेकिन अभी हाल के बंगाल चुनावों में इन्हीं वैष्णवधर्मी सत्तासेवी ‘सनातनियों’ को वोट के लिए सार्वजनिक रूप से माछ-भात खाते हुए सबने देखा। आश्चर्य यह कि अपने को कट्टर वैष्णव कहने वाले किसी हिन्दू को इसका विरोध करते या आपत्ति जताते नहीं देखा गया।
हिन्दू कौन?
इस देश में वर्ण-व्यवस्था के अनुसार स्वयं को ‘ब्रह्ममुख से उत्पन्न’ मानने वाले करोड़ों लोग उस भाषा के 'अकार' वर्ण तक से अपना नाता तोड़ चुके हैं, जिससे उनकी तथाकथित श्रेष्ठता जुड़ी थी। जीवन-शैली पूरी तरह बदल लेने के बाद भी वे स्वयं को पुराने अर्थों में ‘ब्रह्ममुखी’ और सर्वोच्च मानते हैं। जबकि पुराणों का कथन है कि लक्षण और गुण के अभाव में कोई भी व्यक्ति शूद्र ही माना जाएगा, चाहे वह ब्रह्ममुख से उत्पन्न होने का दावा करे या भुजमूल से। मज़े की बात यह है कि ऐसे लोग भी हिन्दू ही कहे जाते हैं। जो माछ-भात खाते हैं, वे भी हिन्दू हैं। जो केवल झालमुँड़ी से काम चला लेते हैं, वे भी हिन्दू हैं। सूर और तुलसी भी हिन्दू थे। सदना कसाई और रैदास भी हिन्दू थे। और हमारे समय के नास्तिक प्रेमचन्द भी हिन्दू ही थे।
विरोध भी हिन्दू, सुधार भी हिन्दू
बीच के इतिहास को याद करें तो जो लोग सती-प्रथा के घोर समर्थक थे, वे भी हिन्दू थे। लेकिन राजा राममोहन राय, जिन्होंने सती-प्रथा का विरोध किया, वे भी हिन्दू थे। स्वामी दयानन्द, जिन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और मूर्तिपूजा का विरोध किया, वे भी हिन्दू थे। और अगर अतीत में जाएँ, तो पुराणों ने जिन्हें अपने अवतारों में शामिल कर लिया, वे परम शाक्यमुनि बुद्ध भी हिन्दू ही माने गए। नहीं तो पुराण उन्हें विष्णु का अवतार क्यों मानते?
कौन तय करेगा कि कौन हिन्दू है?
आप सोच रहे होंगे कि आज यह सब मैं क्यों कह रहा हूँ। तो इसलिए कि यह तय करने का अधिकार आखिर किसे है कि कौन हिन्दू है और कौन नहीं? यदि हिन्दू धर्म एक विश्वास-बहुल, शैली-बहुल और व्यवहार-बहुल जीवन-प्रवाह है, तो आज जो लोग उसके ठेकेदार बन बैठे हैं और दूसरों से कहते फिरते हैं कि वे पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाएँ, क्या बहुविश्वासी हिन्दुत्व उन्हें ऐसा अधिकार देता है?
अभी हाल में ही एक हिन्दू न्यायमूर्ति ने यहाँ के बेरोजगार, किन्तु पढ़े-लिखे युवाओं को ‘काकरोच’, ‘परजीवी’ और न जाने क्या-क्या कहा। तो वे भी हिन्दू हैं और जिन्हें तिलचट्टा कहा गया, वे भी हिन्दू हैं। यानी हिन्दू धर्म यह आज़ादी भी देता है कि लोग अपनी-अपनी सभ्यताई समझ और भाषा के अनुसार एक-दूसरे के लिए जो चाहें कहें। याद होगा, कभी एक और हिन्दू ने सुप्रीम कोर्ट को ही “सुप्रीम कोठा” कह दिया था।
वेदों से पुराणों तक
अंततः मैं केवल यह याद दिलाना चाहता हूँ कि वेदों का परमब्रह्म, प्रजापति और ईश्वर पुराणों तक आते-आते अवतारी विष्णु में रूपांतरित हो गया। वैदिक और औपनिषदिक आत्मवाद, पुराणों के भक्तिवाद में बदल गया। लेकिन पौराणिकों ने बड़ी चतुराई से कहा, “हम तो वही कह रहे हैं जो वेद कह रहा है।”
यही तो कमाल है। लेकिन हिन्दू धर्म का कमाल केवल यही नहीं। यहाँ अकेले विष्णु नहीं हैं। सबसे अधिक तो शिव हैं। पुराणों में शिव की महिमा वाले पुराण सबसे अधिक हैं। मेरी जानकारी के अनुसार विष्णु केवल छह पुराणों में प्रमुख हैं, जबकि शिव लगभग दस पुराणों में। विडम्बना यह कि पुराण बार-बार शिव को ‘अनार्य देव’ भी कहते हैं। फिर भी महाभारत में जिस देवता की सबसे अधिक पूजा दिखाई देती है, वे शिव ही हैं।
गाँव की स्मृति और हिन्दू जीवन की बहुलता
बचपन में अपने गाँव में हम एक पंक्ति याद किया करते थे- सदा भवानी दाहिने, सन्मुख रहैं गणेश।/
पंच देव रक्षा करें, ब्रह्मा विष्णु महेश।। यानी यहाँ सब साथ हैं। विरोध भी, विविधता भी, असहमति भी।
हिन्दू होकर जीने की आज़ादी
तो कहना केवल इतना है कि हिन्दू होकर आपको यह आज़ादी तो है कि आप अपने ढंग से जीने का अधिकार लेकर पैदा होते हैं। आप चाहें तो शाकाहारी बनें या माँसाहारी। मदिरा पिएँ या भाँग-धतूरा लें। चाहें तो गिरिराज सिंह और कंगना रनौत की तरह जिएँ, या गांधी, नेहरू, पटेल और लालबहादुर शास्त्री की तरह। चाहें तो सावरकर और गोडसे होकर भी। हिन्दू होकर जीने की यही सबसे बड़ी आज़ादी है।
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