31वें हिंदी मेला में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक हिंदी साहित्य’ पर गहन राष्ट्रीय विमर्श
कोलकाता में 31वें हिंदी मेला के तीसरे दिन ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक हिंदी साहित्य’ पर राष्ट्रीय संवाद, जहाँ विद्वानों ने ज्ञान परंपरा की बहुलता, आलोचना और आधुनिक संदर्भों पर गहन विचार रखे।
भारतीय ज्ञान परंपरा विविधताओं और आदान-प्रदान की महान देन है
कोलकाता | 28 दिसंबर | सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन एवं भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 31वें हिंदी मेला के तीसरे दिन ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक हिंदी साहित्य’ विषय पर एक गहन और विचारोत्तेजक राष्ट्रीय संवाद संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिष्ठित विद्वानों, लेखकों, पत्रकारों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक निरंतरता, उसकी बहुलता, अंतर्विरोधों और आधुनिक हिंदी साहित्य से उसके जीवंत संबंध पर विस्तार से अपने विचार रखे।
‘सभी दिशाओं से विचारों को आने दो’ वैदिक चेतना का आधुनिक संदर्भ
संगोष्ठी में वक्ताओं ने ऋग्वेद के प्रसिद्ध सूत्र ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः संवाद, स्वीकार और आदान–प्रदान की परंपरा रही है। यह परंपरा किसी एक विचारधारा या कालखंड तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तन और समावेशन से समृद्ध होती रही है।
विषय प्रवर्तन और प्रथम सत्र
आरंभ में वरिष्ठ लेखक डॉ. शंभुनाथ ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल प्राचीन ग्रंथों तक सीमित कर देखने की प्रवृत्ति एक बड़ी भूल है। उन्होंने भक्ति आंदोलन, नवजागरण और आधुनिक हिंदी साहित्य को ज्ञान परंपरा की स्वाभाविक अगली कड़ियाँ बताते हुए कहा कि कबीर, तुलसी, भारतेंदु, प्रेमचंद से लेकर समकालीन साहित्य तक यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रही है।
विश्वभारती विश्वविद्यालय के प्रो. राहुल सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा को विरोधों के बीच सामंजस्य का इतिहास बताया। उन्होंने कहा कि यहाँ शास्त्र और लोक, परंपरा और परिवर्तन, आस्था और तर्क सभी के बीच सतत संवाद रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. गोपेश्वर सिंह ने कन्नड़ संत कवि बसवण्णा और मराठी कवयित्री जनाबाई के उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ें लोक जीवन, श्रम और अनुभव में हैं। यह परंपरा सत्ता केंद्रित नहीं, बल्कि जन-अनुभव केंद्रित रही है। उद्योगपति एवं विचारक आशीष झुनझुनवाला ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता में एकता है, जहाँ अनेक भाषाएँ, संस्कृतियाँ और दर्शन एक साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य
प्रथम सत्र के अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मोड़ों से गुजरते हुए विकसित हुई है। उपनिषदों से लेकर आधुनिक साहित्य तक इसका केंद्रीय तत्व सत्य की खोज रहा है, न कि किसी एक मत का आग्रह।
सम्मान सत्र
सम्मान समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का गहरा रिश्ता लोक भाषाओं, लोक स्मृति और जिज्ञासा से रहा है। सम्मानित शिक्षाविद प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः समावेशी है और उसमें हाशिए के समाजों की आवाज़ भी अंतर्निहित है। इस सत्र का संचालन प्रो. गीता दूबे ने किया।
द्वितीय सत्र: आलोचनात्मक दृष्टि
द्वितीय सत्र में राजस्थान की पत्रकार तसमीना ने कहा कि भारतीय समाज में स्त्रियों को हजारों वर्षों तक ज्ञान से वंचित रखा गया, इसलिए ज्ञान परंपरा की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या जरूरी है। शंकराचार्य विश्वविद्यालय के प्रो. अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा वास्तव में परंपराओं की टकराहट से बनी है, जहाँ बहस, मतभेद और पुनर्सृजन हमेशा मौजूद रहा है। वरिष्ठ पत्रकार किशन कालजयी ने नवजागरण काल में पत्रकारिता और साहित्य की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला। वहीं सदानंद शाही ने आगाह किया कि आज कई बार ज्ञान परंपरा के नाम पर अज्ञान और रूढ़ियाँ भी परोसी जा रही हैं, जिनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।
समापन अध्यक्षीय वक्तव्य
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि हमारी कलाओं, स्थापत्य, लोक परंपराओं और यहाँ तक कि अशोक स्तंभ जैसी राष्ट्रीय प्रतीकों में भी निहित है। उन्होंने इसे मूलतः उदार और लोकतांत्रिक परंपरा बताया।
सम्मान एवं लोकार्पण
इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए डॉ. गोपेश्वर सिंह और प्रो. दामोदर मिश्र को प्रो. कल्याणमल लोढ़ा-लिली लोढ़ा शिक्षा सम्मान प्रदान किया गया। पत्रकारिता के लिए किशन कालजयी को युगल किशोर सुकुल पत्रकारिता सम्मान तथा निर्मल वर्मा साहित्य सम्मान जयपुर की युवा कथाकार तसनीम खान को प्रदान किया गया। कार्यक्रम के दौरान छपते-छपते पत्रिका के उत्सव विशेषांक का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर सहित आमंत्रित विद्वानों द्वारा किया गया।
आयोजन एवं संचालन
राष्ट्रीय संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों का संचालन डॉ. गीता दूबे, डॉ. इतु सिंह, डॉ. आदित्य गिरी और डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने किया। मानपत्र वाचन मनीषा गुप्ता, रेखा शॉ, सूर्य देव राय और डॉ. श्रद्धांजलि सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. गुलनाज बेगम, प्रो. एन. चंद्रा राव, प्रो. पूजा गुप्ता एवं राजेश साव ने किया।
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