हार्ट रुकने पर समय मिल सकता है, ब्रेन पर नहीं: डॉ. नरेश त्रेहन की निर्णायक चेतावनियाँ
डॉ. नरेश त्रेहन की विस्तृत सलाहें, हार्ट बनाम ब्रेन आपातकाल, जेनेटिक जोखिम, डाइट, तेल, तंबाकू, शराब, BP, डायबिटीज़, जाँच और इलाज हर परिवार के लिए मार्गदर्शक हैं।
दिल, दिमाग और जिंदगी: डॉ. नरेश त्रेहन की चेतावनियाँ, वैज्ञानिक तथ्य और स्वस्थ जीवन का विस्तृत रोडमैप
क्यों जरूरी है यह चर्चा?
इक्कीसवीं सदी में भारत जिन बीमारियों से सबसे तेजी से जूझ रहा है, उनमें हृदय रोग शीर्ष पर है। शहरीकरण, बदलता खानपान, बढ़ता तनाव, प्रदूषण, तंबाकू-शराब और शारीरिक निष्क्रियता इन सबने मिलकर दिल की बीमारियों को ‘आम’ बना दिया है। इस पृष्ठभूमि में देश के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश त्रेहन, संस्थापक मेदांता - द मेडिसिटी, की सलाहें केवल चिकित्सकीय नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य का घोषणापत्र हैं। उनकी बातचीत से निकलने वाले निष्कर्ष दिल और दिमाग के आपातकाल, जेनेटिक्स का प्रभाव, जीवनशैली सुधार, जाँच-परीक्षण और इलाज हर परिवार के लिए प्रासंगिक हैं।
हार्ट बनाम ब्रेन: असली आपातकाल को समझिए
डॉ. त्रेहन का सबसे अहम संदेश यह है कि हार्ट रुकने पर भी कभी-कभी समय मिल जाता है, ब्रेन पर नहीं। हार्ट को कई स्थितियों में लंबे समय तक रिवाइव किया जा सकता है। लेकिन ब्रेन को 5-10 मिनट तक ऑक्सीजन न मिले तो स्थायी क्षति या ब्रेन डेड होने का खतरा बढ़ जाता है। निष्कर्ष: किसी भी आपात स्थिति में तुरंत CPR/Basic Life Support जीवन-रक्षक सिद्ध हो सकता है। कार्यालयों, स्कूलों, सोसायटियों और सार्वजनिक स्थानों पर BLS ट्रेनिंग का विस्तार आज की आवश्यकता है।
जेनेटिक्स: परिवार में बीमारी तो जोखिम क्यों बढ़ता है?
यदि पिता, दादा या माँ की ओर से हार्ट डिज़ीज़ का इतिहास रहा है, तो बच्चों में डबल रिस्क माना जाता है। भारत में यह जोखिम कई पश्चिमी आबादियों की तुलना में अधिक दिखता है। कारण स्पष्ट हैं:
जेनेटिक प्रवृत्ति (लिपिड मेटाबॉलिज़्म, इंसुलिन रेज़िस्टेंस आदि)
खानपान (अधिक फैट, जंक फूड, सोडियम)
जीवनशैली (कम गतिविधि, तनाव)
सलाह: जिन परिवारों में इतिहास है, वे 25-30 वर्ष से ही स्क्रीनिंग शुरू करें, ताकि जोखिम कारकों को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
क्या बच्चों और युवाओं में भी हार्ट प्रॉब्लम संभव है?
यह एक आम गलतफहमी है कि दिल की बीमारी ‘बुज़ुर्गों’ की समस्या है। डॉ. त्रेहन के अनुभव के अनुसार, इनबॉर्न/मेटाबॉलिक डिफेक्ट्स के कारण 9-11 वर्ष के बच्चों में भी हार्ट समस्याएँ मिलती हैं।
युवाओं में अचानक घटनाएँ अकसर तीन कारणों से जुड़ी होती हैं:
1. आर्टरी ब्लॉकेज
2. हार्ट मसल की कमजोरी/अरिदमिया
3. इलेक्ट्रिकल सिस्टम की गड़बड़ी
बचपन से अत्यधिक फैट (जैसे रोज़ बहुत ज़्यादा घी) भी जोखिम बढ़ा सकता है। निष्कर्ष: ‘कम उम्र’ सुरक्षा की गारंटी नहीं है; संतुलन ही सुरक्षा है।
‘टूटे दिल से मौत’ मिथक बनाम विज्ञान
लोकप्रिय संस्कृति में भावनात्मक सदमे से दिल रुकने की कहानियाँ प्रचलित हैं, पर चिकित्सा विज्ञान कहता है- आमतौर पर पहले से मौजूद ब्लॉकेज/अरिदमिया किसी तीव्र तनाव से ट्रिगर हो जाती है। भावनात्मक घटना बीमारी पैदा नहीं करती, बल्कि उजागर करती है। निष्कर्ष: भावनात्मक स्वास्थ्य का ध्यान रखना ज़रूरी है, पर बीमारी का कारण समझना उससे भी ज़्यादा।
जीवनशैली: दवा से पहले आदतें
(क) एक्सरसाइज सबसे सस्ती और प्रभावी दवा
रोज 30-40 मिनट ब्रिस्क वॉक/इनडोर कार्डियो। योग-प्राणायाम (अनुलोम-विलोम, कपालभाति) से ऑक्सीजन एक्सचेंज बेहतर होता है। उम्र के साथ मसल मास घटता है, इसलिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी। निष्कर्ष: जो शरीर को रोज़ चलाता है, वह बीमारी को दूर रखता है।
(ख) वज़न पर अनुशासन
आदर्श वज़न के ±10% के भीतर रहना सुरक्षित माना जाता है। घर में वेट-स्केल रखें नियमित निगरानी आत्म-नियंत्रण बढ़ाती है।
(ग) डाइट मॉडरेशन का सिद्धांत
समोसा/तला हुआ भोजन पूरी तरह वर्जित नहीं, पर मात्रा और आवृत्ति सीमित। फैट जरूरी है, अधिक फैट हानिकारक। नमक/सोडियम सीमित रखें; जंक फूड में सोडियम बहुत अधिक होता है। निष्कर्ष: ‘कम खाओ, सही खाओ’ यह मंत्र आज भी प्रासंगिक है।
तेल पर स्पष्ट चेतावनी और समाधान
एक ही तेल सालों न चलाएँ हर 6 महीने में रोटेशन करें। हाइड्रोजेनेटेड तेल (वनस्पति) से बचें। कुछ क्षेत्रों में मस्टर्ड ऑयल के लंबे उपयोग पर ऑब्ज़र्वेशनल चिंताएँ इसलिए रोटेशन सुरक्षित रणनीति। निष्कर्ष: विविधता + सीमित मात्रा = सुरक्षा।
तंबाकू और शराब: ‘सुरक्षित मात्रा’ का भ्रम
तंबाकू किसी भी रूप में हार्ट और कैंसर दोनों का जोखिम। शराब पर नवीनतम चेतावनियाँ किसी भी मात्रा में सुरक्षित नहीं। सामाजिक दबाव में ‘थोड़ा-सा’ अकसर ‘ज्यादा’ बन जाता है। निष्कर्ष: परहेज़ ही सबसे सुरक्षित विकल्प।
ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़: साइलेंट किलर्स
बड़ी आबादी को हाई BP का पता ही नहीं चलता। डायबिटीज़ में हार्ट डिज़ीज़/हार्ट फेल्योर का जोखिम अधिक; कई बार चेस्ट पेन महसूस नहीं होता। नियमित BP मॉनिटरिंग, ईको, स्ट्रेस टेस्ट आवश्यक। निष्कर्ष: जो दिखता नहीं, वही सबसे खतरनाक हो सकता है।
जाँच-परीक्षण: कब, क्या और क्यों?
25–30 वर्ष: फैमिली हिस्ट्री वालों की पहली स्क्रीनिंग।
30–35 वर्ष: सभी के लिए बेसिक चेकअप।
50+ वर्ष: हर साल।
ECG अतीत बताता है; भविष्य के जोखिम के लिए स्ट्रेस टेस्ट/स्ट्रेस ईको/CT एंजियो।
गोल्ड स्टैंडर्ड: एंजियोग्राफी (ज़रूरत पर)। निष्कर्ष: समय पर जाँच भविष्य बचाती है।
इलाज का चुनाव: स्टेंट या बायपास?
<50–60% ब्लॉकेज: लाइफस्टाइल + दवाएँ। सीमित/क्रिटिकल ब्लॉकेज: स्टेंट। डिफ्यूज़/मल्टीपल ब्लॉकेज: बायपास बेहतर। आधुनिक बायपास कम इनवेसिव, तेज रिकवरी अनावश्यक डर न पालें।
निष्कर्ष: सही रोगी के लिए सही इलाज।
यात्रा और विशेष परिस्थितियाँ
ऊँचाई, ठंड और कम ऑक्सीजन जोखिम बढ़ाते हैं। यात्रा से पहले पूर्ण चेकअप अनिवार्य।
निष्कर्ष: आस्था के साथ सावधानी।
महिलाओं में हार्ट डिज़ीज़: बदलता परिदृश्य
पहले माना जाता था कि मेनोपॉज़ से पहले महिलाओं में जोखिम कम होता है, पर अब लाइफस्टाइल और प्रदूषण के कारण अंतर घट रहा है। एक्सरसाइज़, वज़न नियंत्रण और तनाव प्रबंधन महिलाओं के लिए भी उतने ही आवश्यक हैं। निष्कर्ष: जागरूकता जरूरी।
समाज और परिवार की भूमिका
बच्चों को ‘प्यार’ के नाम पर अत्यधिक मिठाई/फैट देना भविष्य के लिए नुकसानदेह।
परिवार, स्कूल और समुदाय तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि स्वस्थ आदतें विकसित हों।
डर नहीं, जागरूकता
डॉ. त्रेहन का संदेश सीधा और मानवीय है डर से नहीं, समझ से बचाव होता है। जेनेटिक जोखिम पहचानें, समय पर जाँच कराएँ, जीवनशैली सुधारें और आपात स्थितियों के लिए तैयार रहें। सेहत में निवेश ही लंबी, सक्रिय और सम्मानजनक ज़िंदगी की कुंजी है।
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