धन नहीं, चरित्र ही असली संपत्ति है | स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानी
जानिए स्वामी विवेकानंद के अद्भुत त्याग और सादगी की कहानी, जिन्होंने दुनिया को ज्ञान से जीता, पर स्वयं भौतिक संपत्ति से दूर रहे।
वह संन्यासी, जिसने Parliament of the World's Religions 1893 में अपने ओजस्वी शब्दों से पश्चिमी जगत को चमत्कृत कर दिया, जिसने Chicago की धरती पर खड़े होकर भारत की आध्यात्मिक चेतना का शंखनाद किया, जब उसी महापुरुष का देहावसान हुआ, तो संसार स्तब्ध रह गया।
लोगों की जिज्ञासा थी "जिसने समूचे अमेरिका और यूरोप को विचारों से जीत लिया, उसकी अपनी ‘दौलत’ क्या थी?" पर जब उसकी कुटिया का द्वार खुला, तो वहाँ कोई खजाना नहीं मिला। न सोने के सिक्के, न ज़मीन-जायदाद के दस्तावेज। वहाँ केवल एक धुली हुई पुरानी धोती, एक गेरुआ चोला, एक कमंडल, लकड़ी की खड़ाऊँ, और कुछ जर्जर पुस्तकें व डायरी। बस, यही थी उस महान आत्मा की समस्त ‘संपत्ति’। वह थे स्वामी विवेकानंद।
वह उत्तर जो आज भी गूँजता है
विदेश प्रवास के दौरान एक धनी महिला ने उनके सादे वस्त्रों पर व्यंग्य किया "क्या आपके देश में अच्छे कपड़े नहीं मिलते?" स्वामी जी मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “मैडम, आपके देश में एक दर्जी इंसान को जेंटलमैन बनाता है, पर मेरे देश में इंसान का चरित्र उसे महान बनाता है।” यह उत्तर केवल शब्द नहीं था, यह उस सभ्यता का दर्पण था जो बाहरी चमक से नहीं, भीतर की आभा से मनुष्य को परिभाषित करती है।
त्याग की वह ऊँचाई
जब पश्चिम के धनी लोग उनके चरणों में धन अर्पित करने को तत्पर थे, तब भी इस संन्यासी ने भौतिक वैभव को ठुकरा दिया। उन्होंने न्यूयॉर्क की सड़कों पर घास पर सोकर रातें बिताईं, पर अपने देश की गरीबी का सौदा नहीं किया। जिसके एक संकेत पर तिजोरियाँ खुल सकती थीं, उसके पास अपनी माँ के लिए एक पक्का घर तक नहीं था। यह केवल त्याग नहीं, यह आत्मा की सर्वोच्च स्वतंत्रता थी।
आज के युग के लिए संदेश
आज जब हम ब्रांडेड वस्त्रों, महँगी घड़ियों और नवीनतम iPhone को अपनी सफलता का प्रतीक मानते हैं, वहाँ विवेकानंद हमें याद दिलाते हैं, “तुम शरीर नहीं हो, जिसे वस्त्रों से सजाया जाए; तुम आत्मा हो, जिसे ज्ञान से प्रकाशित किया जाए।”
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